प्रस्तुति : पुष्पा गैड़ा
17 साल बाद इस बार उत्तराखण्ड में पुनः अतिवृष्टि की आपदा आयी, जिसने ऐसा कहर ढाया कि कई सालों तक उससे उबर पाना मुश्किल है। अतिवृष्टि से सबसे प्रभावित क्षेत्रों में नैनीताल जिले का रामगढ़ ब्लॉक है। यहाँ नथुवाखान क्षेत्र के अन्तर्गत कई ऐसे गाँव हैं, जहाँ अभी तक कोई नेता तो दूर, पटवारी तक अपनी उपस्थिति दर्ज नहीं करा पाया है। सिर्फ उपस्थिति दर्ज कराते हुए आपदा राहत के नाम पर खानापूर्ति के लिए पैसा बाँटा गया है।
आपदा प्रभावितों के साथ हो रहे अन्याय को लेकर 17 नवम्बर 2010 को ‘महिला जागृति महासंघ’ ने नथुवाखान में एक बैठक रखी थी, जिससे उन लोगों से सीधा संवाद बन पाये जो इस आपदा से प्रभावित हुए हैं। संघ सभी ब्लॉकों में ऐसी बैठकें करा रहा है, जिससे कि उनकी बात उसी रूप में सरकार तक पहुँचायी जा सके। बैठक में नैनीताल से राजीव लोचन साह, डॉ. उमा भट्ट, विनोद पाण्डे व बीना तथा नथुवाखान संघ की मुन्नी तथा आपदा से प्रभावित लगभग 5-6 गाँवों के प्रभावित लोग उपस्थित थे। गाँव के लोगों का कहना था कि सरकार की ओर से राहत राशि के नाम पर मात्र खानापूर्ति की गयी है। क्षति की तुलना में मुआवजा कुछ भी नहीं है। राहत राशि के नाम पर कुछ लोगों मात्र 250 रु. दिये गये और कोरे कागज पर हस्ताक्षर करा लिये गये। उस पर भी फोटोग्राफर ने मौके का फायदा उठाया और 200 रु. फोटोग्राफी के ही ले लिए। बचे पचास रु.। यह हकीकत है कि जब आपदा आती है तो ऐसे लोगों को आधिकारिक रूप से इसलिए छोड़ देती है ताकि बचे हुओं को पता चले कि आपदा कितनी भयंकर होती है।
लोगों का दुःख सुनने वाला भी कोई नहीं था। जब एक-दूसरे के परिचय के साथ बैठक की औपचारिक शुरुआत हुई तो महिलायें व पुरुष खुद को रोक न सके और अपनी बात बताते हुए रो पड़े। मल्ला सिनौली गाँव की विधवा राधिका देवी का कहना था कि घर में वे और उनका एक छोटा बेटा है। अतिवृष्टि से जब उनके घर और आँगन में दरारें पड़ी तो वे कई दिन तक स्कूल में रहीं। मगर अब उसी घर में रहने को मजबूर हैं। सभी का यही हाल है। कोई अपनी रिश्तेदारी में रह रहा है। पर कब तक ? अब जाड़े का समय है। ऐसे में उन्हें भी अपना कोई ठिकाना चाहिए। लोगों का कहना था कि मौसम अच्छा है तो ठीक है, परन्तु जैसे ही आसमान में बादल घिरते हैं वे भयभीत हो जाते हैं। कई के घरों की ऐसी स्थिति है कि अभी भी रात को ढंग से सो नहीं पाते।
हम लोग मल्ला सिनौली गाँव देखने गये। नथुवाखान-प्यूड़ा मोटर रोड के नीचे ही जंगल शुरू होता है और उसके नीचे वलयाकार घाटी में बसा है यह गाँव। जिस जंगल से हम सभी नीचे गाँव की ओर उतरे वह उसी गाँव के रहने वाले कृष्णपाल ने व्यक्तिगत रूप से संरक्षित और संवर्द्धित किया है। यह घना जंगल ही बहुत कुछ बता रहा था। जगह-जगह बड़ी-बड़ी दरारें पड़ी थीं। कई जगह जमीन का टुकड़ा ही खिसक गया है। यदि एक बार जोर की वर्षा हुई तो शायद उसके नीचे के गाँव का अस्तित्व ही न रहे। साथ ही यह जंगल मूक संदेश भी दे रहा था कि जिन गाँव वालों ने मुझे संरक्षित किया है, मैंने उन्हें इस भयंकर आपदा में भी सुरक्षित रखा।
जंगल से निकलकर कृष्णपाल जी का मकान है। इससे मुश्किल से दस कदम आगे की ओर भयंकर भूस्खलन हुआ है। उनका कहना था कि वर्षा के दौरान उनके आँगन से पानी के फव्वारे फूट रहे थे। वे इतने भयभीत हैं कि गाँव से विस्थापन चाहते हैं। उन्हें डर अपने मकान से नहीं, अपितु मकान के ऊपर अपने ही द्वारा संरक्षित उस जंगल से है जो कभी भी खिसक सकता है। इसके साथ क्षैतिज जाकर कुछ पाँच मिनट की दूरी पर राधिका देवी का मकान है। इसमें अन्दर-बाहर से दरारें आ गयी हैं। आँगन में भी दरारें हैं, जिन्हें लीप कर ढक दिया है कि दरारें न दिखने से भय थोड़ा कम लगे। उसके नीचे पशु चिकित्सालय हैं, जिसके पीछे की दीवार क्षतिग्रस्त हुयी है जिसका सरकार की ओर से पुनर्निमाण कार्य शुरू हो गया है। जबकि ऊपर वाला मकान नीचे वाले मकान की पीठ ताक रहा है और अपने सरकारी न होने पर पछता रहा है। इसी गैर सरकारी मकान के आँगन के एक कोने पर लाल कनेर का पौधा भय के साथ भी मुस्कराकर इस आपदा में जीवन में आस्था सिखा रहा है, जबकि उसे भी नहीं पता कि कब वह कोना बिना पानी के ही बह जाय। इसी कनेर की तरह गाँव वालों ने भी जीवन की आशा नहीं छोड़ी। पर उन्हें पता है कि एक जोर की बारिश और होती है तो …..
इस गाँव में आपदा प्रभावित लोगों को सरकार की ओर से जो राहत राशि मिली है, वह राधिका देवी 5000 रु., कृष्णपाल 3000 रु., पूरन चन्द्र, दीवान राम, हरीश चन्द्र, भुवन चन्द्र दुर्गापाल प्रत्येक 3000 रु. व आनसिंह 1500 रु. है। जबकि राजेन्द्र कुमार, हरीश पाण्डे, किशन राम, हेमन्त पाण्डे व राम दत्त के परिवार को अभी तक कोई मुआवजा नहीं मिला है।
हालाँकि प्रकृति की दया से अभी इस क्षेत्र में किसी घर की छत या दीवार पूर्ण क्षतिग्रस्त नहीं हुई है। परन्तु मकान की एक दरार को भी ठीक करने में कितना खर्चा आता है सभी जानते हैं। एक अन्य गाँव सुराल गाँव में नुकसान की मात्रा अधिक आँकी गयी है। परन्तु अभी तक कोई भी सहायता वहाँ नहीं पहुँची है। वहाँ की महिलाओं का कहना था कि उनके गाँव में न कोई नेता, न सरकारी आदमी और न ही पटवारी निरीक्षण के लिए आया। उनके हिसाब से उनके गाँव में अतिवृष्टि से नुकसान ही नहीं हुआ। ‘‘हम अपनी स्थिति बताने स्वयं ही डी.एम. कार्यालय तक जातीं, पर इतना खर्चा कहाँ से लायेंगी ? अभी तो इस बैठक के लिये यहाँ पर पैदल ही आयी हैं।’’ हम लोगों से उन्हें काफी उम्मीदें बँध गयी थीं कि शायद हम उनकी कुछ मदद कर सकें। मैं तो उन लोगों की बातें सुनकर कुछ बोल पाने की स्थिति में भी नहीं रही।