उत्तराखंड में बन रही जल विद्युत परियोजनाओं ने पर्यावरण को ही नहीं उत्तराखंड के आम जन जीवन को भी नारकीय बना दिया है। इसका लाभ सिर्फ राजनेता व ठेकेदारों को ही मिल रहा है। उत्तराखण्ड के आम आदमी के जीवन में खुशहाली तथा बड़े बाँधों का जबाव देने के लिये उत्तराखण्ड लोक वाहिनी व आजादी बचाओ आन्दोलन ने मिलकर सरयू नदी में अल्मोड़ा व पिथौरागढ़ की सीमा के पास रस्यूना गाँव के समीप 1 मेगावाट की विद्युत परियोजना बनाने का प्रयास आरम्भ किया था क्योंकि छोटी-छोटी विद्युत परियेाजना बनाकर संघर्ष व रचना का आरम्भ किया जा सकता है, जो आजादी के आन्दोलन में गाँधीजी की सबसे बड़ी शक्ति थी। लेकिन आजादी के 60 वर्ष बाद सरकारें गाँधीजी की इस शक्ति को अपना सबसे बड़ा दुश्मन मानती हैं। इसीलिये छत्तीसगढ़ में प्रसिद्ध गाँधीवादी हिमांशु कुमार के बनवासी चेतना केन्द्र को ऑपरेशन ग्रीन हंट का सबसे पहले शिकार बनना पडा, जो नक्सली आतंक को समाप्त करने के लिये बनाया गया है। बड़े बाँधों के पक्षधरों ने चिपको आन्दोलन से जुड़े नदी बचाओ आन्दोलनकारियों पर माओवादी होने का ठप्पा लगाने की राजनीति बनानी आरम्भ कर दी है, सरकार ने इतना आतंक पैदा कर दिया, जिस से जन आन्दोलन की भूमि रही उत्तराखण्ड में जन आन्दोलन की पृष्ठभूमि ही समाप्त कर दी जाये। किसी हद तक एन.जी.ओ. ने पहले ही जन आन्दोलन को जबरदस्त धक्का पहुँचाया है।
24 जनवरी को आजादी बचाओ आंदोलन द्वारा बनाये स्वराज विद्यापीठ, इलाहाबाद के समन्वयक डॉ. स्वप्निल श्रीवास्तव जो एक गणितज्ञ एवं समाजकर्मी हैं, अपने साथी सुनील के साथ अल्मोड़ा आये थे इनकों उत्तराखण्ड लोक वाहिनी द्वारा सेवॉय होटल अल्मोड़ा में आवास की व्यवस्था की गई थी। 25 जनवरी को वाहिनी के वरिष्ठ कार्यकर्ता तथा आजादी बचाओ के संयोजक बसन्त भट्ट जो ग्राम कनेड़ा, धौलादेवी के रहने वाले हैं, उनको साथ लेकर ये लघु बाँध स्थल रस्यूना गाँव गये। 26 जनवरी को इन्होंने गाँव के बीच बैठक की तथा उपभोक्ता कंपनी बनाने के लिये सदस्यों का चयन किया। अगली कार्यवाही करने के लिये वापस ये लोग रात में विश्राम करने के लिये 26 जनवरी को बसन्त भट्ट के गाँव कनेड़ा आ गये। बसन्त भट्ट ने डॉ. श्रीवास्तव व सुनील की रहने की व्यवस्था अपने घर के पास कहीं कर दी तथा अपना स्वयं रात को रुकने के लिए अपने परिवार के साथ आ गये।
लेकिन रात को ही अल्मोड़ा पुलिस अधीक्षक कृष्ष्ण कुमार के नेतृत्व में पुलिस की भारी फोर्स स्वप्निल, सुनील व बसन्त भट्ट को पकड़ कर अल्मोड़ा ले आई तथा पुलिस लाईन अल्मोड़ा में कड़ी पूछताछ करते रहे। पुलिस का लगातार यह प्रयास रहा कि कोई भी ऐसा सुराग मिल जाय जिससे इन लोगों पर माओवादी होने का आरोप लगाया जा सके। बसन्त भट्ट के साथ तो मारपीट भी की गई, उससे जबर्दस्ती माओवादी संगठनों से जुड़े लागों का नाम लेने के लिए कहा गया। इन लोगों को गिरफ्तार किया तो उन्होंने बस इतना कहा कि ऊपर के आदेश से यह गिरफ्तारी की गई है। जब कड़ी पूछताछ के बाद भी इन लोगों से माओवादी होने का प्रमाण नहीं मिला तो 16 घंटे के बाद रात 9. 30 बजे उत्तराखंड लोक वाहिनी के केन्द्रीय अध्यक्ष के सुपुर्द इन तीनों को किया गया, इन तीनों पर कोई आरोप भी नहीं लगाया गया।
उत्तराखंड लोक वाहिनी ने पुलिस के इस कृत्य की घोर भृत्सना की तथा कहा की कोई बिना प्रमाण के आम लोगों के उत्पीड़न से समाज में पुलिस की विश्वसनीयता पर सवाल ही पैदा होंगे। देश में माओवाद के नाम से बढ़ रहे उत्पीड़न के विरुद्ध देश की जनवादी शक्ति को संघर्ष के लिये आगे आने का निवेदन किया।























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