यूँ तो गिर्दा से मेरी पहली मुलाकात 1978 के अप्रैल महीने में हुई थी जब एक दिन उन्होंने मुझे नैनीताल समाचार के कार्यालय में बुलाया था। कविता के आँखर पुस्तक के विमोचन के अवसर पर भी उन्होंने एक पोस्टकार्ड भेजकर मुझे अल्मोड़ा आने का न्यौता दिया था, जिसमें कमल जोशी और मैं साथ-साथ गये थे और दूर से ही गिरदा तथा उनकी मित्रमण्डली को देखने का अवसर मिला था। 1983 की फरवरी में जागर कैसेट के तीन भागों की रिकार्डिंग हमारे घर यामा में हुई थी। तब उनके काम करने का तरीका देखा था। पर गिरदा को घनिष्ठता से जानने का सिलसिला 1984 के नशा नहीं रोजगार दो आन्दोलन के दौरान शुरू हुआ जिसकी एक अमिट छाप मेरे मनोमस्तिष्क पर पड़ी।
फरवरी 1984 में यह आन्दोलन चौखुटिया से शुरू हुआ। मैं इसमें मार्च में होली के आसपास से सम्मिलित हुई, जब 20 मार्च के अल्मोड़ा प्रदर्शन की तैयारियाँ चल रही थीं। हम कुछ लोगों ने, जिनमें गिरदा भी थे, द्वाराहाट, चौखुटिया, सोमेश्वर, भुजान, गरमपानी आदि कई जगहों में सभाएँ कीं। गिरदा उस समय कुछ तनाव में रहते थे। शायद शराबबन्दी को लेकर उनके मन में कई सवाल थे। पी.सी. (पूरन चन्द्र तिवारी), निर्मल जोशी, पी.के. (प्रदीप टम्टा), पुष्पा जोशी खूब बढ़-चढ़ कर भाग लेते थे और नेतृत्व में रहते थे। अल्मोड़ा में गिरफ्तारियाँ हो जाने के बाद नैनीताल के साथियों की जिम्मेदारी बढ़ गई थी। हम लोग आन्दोलन में बिल्कुल नये-नये थे। हमसे जो करने को कहा जाता, हम उसे पूरी तत्परता के साथ करते थे। प्रताप बिष्ट, मीना टम्टा, दिनेश तिवारी, रेखा जोशी, अल्मोड़ा-रानीखेत में सक्रिय थे तो नैनीताल में पुष्पा जोषी, महेश आर्य, प्रदीप तिवारी, गिरिजा पाठक, कमला पन्त, दिनेश उपाध्याय, तरुण जोशी, विनोद बहुगुणा, सुरेश डालाकोटी, बसन्ती पाठक आदि सक्रिय थे। वरिष्ठों में केवल गिरदा जेल से बाहर थे। बाकी सभी अल्मोड़ा जेल में थे। गिरदा हमें निर्देश देते रहते थे। अल्मोड़ा, रानीखेत, गरमपानी, भवाली, रामगढ़ और नैनीताल में आन्दोलन जोरशोर से चल रहा था। गिरदा का सर्वाधिक जोर जनसम्पर्क पर रहता था। गाँव-गाँव जाकर सम्पर्क करना है, लोगों को सारी बातें बतानी हैं और उन्हें अपने साथ लाना है। हम लोग टोलियाँ बनाकर घूमते। एक-एक जगह में कई-कई बार जाते। नये-नये जनगीत सीखे जाते और पूरी तल्लीनता से गाये जाते। जुलूस निकालना होता तो कोई घबराहट नहीं होती। 10 व्यक्ति भी जुलूस निकालने के लिए काफी समझे जाते। पूरे अनुशासन के साथ सैनिक की तरह जोशोखरोश में नारे लगाते हुए हम लोग पूरे आत्मविश्वास के साथ जुलूस निकालते। बाद में अल्मोड़ा से साथी लोग छूट गये, पर निर्मल जोशी और पी.सी. नैनीताल की जेल में लाये गये। जिस दिन उनकी कोर्ट में पेशी लगती, हम पहले ही कोर्ट में पहुँच जाते और खूब जोश से नारे लगाते हुए उनका स्वागत करते। उनकी पेशी के दौरान हम कोर्ट परिसर में ही सभा कर डालते। अनोखे उत्साह से हम भरे रहते। कहना न होगा कि इस सबके पीछे गिरदा थे। अल्मोड़ा जेल से छूट कर साथी लोग नैनीताल आये और नैनीताल में आम सभा की गई। यह पूरी योजना गिरदा की रहती थी।
गिरदा इस बात से ज्यादा खुश नहीं थे कि भवाली में आन्दोलन की शुरूआत क्यों कर दी गई। गिरदा का मानना था कि आन्दोलन को अल्मोड़ा में ही केन्द्रित किया जाना चाहिए, दूसरी जगहों से लोग उन्हें मजबूती देते रहें। कई स्थानों पर एक साथ आन्दोलन की शुरूआत होने से आन्दोलन में बिखराव आ सकता है, ऐसा गिरदा का मानना था। भवाली की शराब भट्टी के आगे धरना शुरू कर दिया गया था, जो लम्बे समय क्रमिक अनशन के रूप में चलता रहा। निर्मल-पुष्पा जोशी उन दिनों भवाली में रहते थे। उनकी गृहस्थी पर इस आन्दोलन का बहुत दबाव पड़ा। भवाली से ही गरमपानी और रामगढ़ में आन्दोलन फैला। गरमपानी और रामगढ़ की बहुत सारी महिलाएँ हमारे साथ लम्बे समय तक जुड़ी रहीं। भवाली के क्रमिक अनशन का सिलसिला नैनीताल आकर आमरण अनशन में बदल गया। निर्मल जोशी, मनोहरलाल साह, देवीदत्त पाण्डे, कमला पन्त, सावित्री मठपाल तथा लीला पाण्डे आमरण अनशन में और बाकी लोग बारी-बारी से क्रमिक अनशन में बैठते रहे। तब हम सबकी भागदौड़ काफी बढ़ गई। गिरदा की नजर हर क्रियाकलाप पर रहती थी। बहुत बार असहमति होते हुए भी वह चुप रहता था। गिरदा की बहुत सारी बातें तब मेरी समझ में नहीं आती थीं। पर वे बार-बार कहते थे कि लोगों पर विश्वास करो। जनता सबसे बड़ी ताकत है। वही फैसला करेगी। गिरदा कभी ज्ञान बघार कर आतंकित नहीं करते थे। हम सब नौसिखुए थे लेकिन हमारे भीतर गिरदा ने अपूर्व आत्मविश्वास भर दिया था और हम खुलकर अपने विचार व्यक्त करने लग गये थे। गिर्दा के आत्मीयता भरे सम्बोधन किसी की भी झिझक दूर कर देते थे। बैठकें होती रहती थीं जिनमें हर छोटे-बड़े, नये-पुराने सदस्य को अपनी बात रखनी पड़ती थी। यह एक प्रशिक्षणशाला होती थी हम सबके के लिए।
गिरदा के व्यक्तित्व का जादू उनके गीतों के माध्यम से दूसरों के सिर चढ़ कर बोलता था। 15 अगस्त 1984 को तय हुआ कि जुलूस निकाला जायेगा। गिर्दा ने उस दिन अली सरदार जाफरी की 1948 में लिखी नज्म- कौन आजाद हुआ, किसके माथे से गुलामी की सियाही छूटी, मादरे हिन्द के चेहरे पै उदासी है वही, कौन आजाद हुआ- गाई। हम सब सुर में सुर मिलाने की कोशिश में लगे रहते थे और गिरदा की गूँजती हुई बुलन्द, आरोह-अवरोह मय आवाज का प्रभाव चारों ओर फैलते ही हम अपने भीतर गौरव की अनुभूति से भर उठते थे। लगता था जैसे हम ही हैं जो गा रहे हैं। उस साल कर्मी में बाढ़ आई थी। नन्दादेवी के मेले के दौरान जुलूस निकला। गिर्दा ने हुड़के की थाप के साथ गाया- तू नी मार डाड़ जैंता घर जानूँ भलि है रये। घर बगि गो गाड़ जैंता, घर जानूँ भलि है रये। गीत चलता रहा, मेले में फ्लैट्स में एक जगह पर दुकान लगाकर हम सुरा-शराब के खिलाफ हस्ताक्षर अभियान चलाते रहे।
एक के बाद एक कार्यक्रमों का सिलसिला चलता रहा। कहीं कुण्ठा पैदा नहीं हुई। 1984 का पूरा साल इसी तरह बीता। नवम्बर आते-आते कुछ उतार आया आन्दोलन में तो गिरदा ने कहा अब एक महिला सम्मेलन होना चाहिये। इस समय तक महिलाओं में कमला पन्त, पुष्पा जोशी, मुन्नी तिवारी, बसन्ती पाठक, सावित्री मठपाल, मीना टम्टा, रेखा जोशी, इन्द्रा वर्मा, गरमपानी तथा रामगढ़ की कई महिलाएँ जुड़ चुकी थीं। लेकिन महिलाओं का सम्मेलन किया जाये, ऐसी कोई सूझ हममें से किसी के मन में नहीं आई। पर गिरदा को यह जरूरी लगने लग गया था कि अब महिलाओं का अलग संगठन होना चाहिए। उसने महिला मोर्चा नाम भी सोच लिया (तब तक भाजपा का महिला मोर्चा नहीं बना था)। मोर्चा शब्द में जुझारूपन की झलक आती थी। आर्यसमाज, मल्लीताल में सम्मेलन किया गया। नैनीताल की बहुत सारी महिलाएँ शामिल हुईं। बाहर से भी काफी महिलाएँ आईं। पुरुष साथी भी सम्मिलित हुए। गुरुद्वारे में सबके रहने की व्यवस्था की गई। आर्यसमाज में चारों ओर दीवारों पर पोस्टर, फोटो, आन्दोलन से सम्बन्धित अखबारों की कटिंग लगाईं गईं। कार्यकर्ताओं में केवल महिलाएँ नहीं थीं, पुरुष भी थे। वक्ताओं में अधिकांश महिलाएँ थीं और उन्होंने टुकड़ा-टुकड़ा अपनी समस्याएँ रखी थीं। नैनीताल के हर मुहल्ले में जा जाकर हमने महिलाओं को इस सम्मेलन में शामिल होने के लिए कहा था। उन दिनों हमारे पास एक छोटा माइक (चेलैंजर) रहता था और कहीं पर भी खड़े होकर हम 2 या 3 जन भी नुक्कड़ सभा कर लेते थे। ऐसी हिम्मत गिरदा ने हमारे भीतर जगाई थी।
1985 की जनवरी आते-आते गिर्दा ने कहा, अब पदयात्रा करनी है। अल्मोड़ा व नैनीताल के 10-12 युवा साथी, जिनमें बसन्ती, कमला और मैं भी शामिल हुए, गरमपानी से रामगढ़, मुक्तेश्वर, सरगाखेत, धानाचूली, कसियालेख, गुनियालेख, च्यूरीगाड़, मलवाताल, जंगलियागाँव, भीमताल, हल्द्वानी तक की 10 दिन की पदयात्रा पर निकल पड़े जिसमें चुनाव पर केन्द्रित नुक्कड़ नाटक किया जाता था, जनगीत गाये जाते थे और जेब में एक भी पैसा न रखकर पूरी जनाधारित यात्रा होती थी। गिरदा ने इस यात्रा के लिए बाकायदा गीतों की तैयारी करवाई जिनमें दो नये गीत भी शामिल किये गये- हमारी ख्वाहिशों का एक नाम इन्कलाब है (गोरख पाण्डेय) तथा बोल कि लब आजाद हैं तेरे (फैज)। महेश आर्य इन गीतों की शुरूआत करता था। वापसी में हल्द्वानी में समीक्षा बैठक भी हुई। यद्यपि हम उत्तराखण्ड संघर्ष वाहिनी के बैनर तले ये सब काम कर रहे थे, पर अक्सर लगता था कि हमारी जवाबदेही सिर्फगिरदा तक है।
1985 आते आते फिर कई तरह की घटनाएँ हुईं और नशा नहीं रोजगार दो आन्दोलन का दौर गुजर गया। महिला मोर्चा की जो शुरूआत गिरदा ने करवाई थी, वह कहीं न कहीं बीज रूप में विद्यमान रही। महिला उत्पीड़न के कुछ मुद्दे हमने उठाये पर संगठित रूप में महिला संगठन की शुरूआत 1993 में मैत्री महिला संगठन के रूप में हो पाई।
परन्तु 1989 के बीतते न बीतते गिर्दा ने कहना शुरू कर दिया, एक पत्रिका निकलनी चाहिये महिलाओं की। कैसी पत्रिका, कौन सी पत्रिका, मुझे यह विचार कतई पसन्द न आया। नैनीताल समाचार 1977 से निकल रहा था और 1983 से पहाड़ का प्रकाशन प्रारम्भ हो चुका था। पहाड़ के सम्पादन-प्रकाशन के कामों से मैं शुरू से जुड़ी थी। परन्तु महिलाओं की पत्रिका की बात हम लोगों के मन में दूर-दूर तक न थी। बसन्ती, कमला, शीला और मैं प्रायः मिलते, बातचीत होती पर पत्रिका की बात हमारे बीच गिरदा ने ही शुरू की। तब जनवरी 1990 में हम चार-पाँच जन एक दिन अशोक होटल के डाइनिंग रूम में बैठे और बातचीत हुई। लीक से हटकर पत्रिका निकालनी है, गिरदा ने कहा। कमला पन्त, बसन्ती पाठक और शीला रजवार को विचार जँच गया। गिरदा ने कहा- तुम्हारे पास आधार है। नैनीताल समाचार और पहाड़ ने जमीन बनाई है, उसका उपयोग करो। उनके सदस्यों को पत्र लिखो। उनसे रचनाएँ और आर्थिक आधार दोनों मिलेंगे। फिर तो बैठकों का सिलसिला चल पड़ा। सावित्री कैड़ा और बसन्ती दिल्ली गये और पत्रिका का नाम रजिस्टर करा लाये। हमने कई नाम सोचे थे जो नहीं मिल पाये। उत्तरा के साथ भी महिला पत्रिका जोड़ने पर पंजीकरण हो पा रहा था। मुझे यह महिला पत्रिका विशेषण जँच नहीं रहा था। पर गिरदा ने जोर देकर कहा, जैसी कि उनकी आदत थी, बिलकुल साब, महिला पत्रिका जरूर होना चाहिए इस नाम में। यह पत्रिका बतायेगी कि महिला पत्रिका कैसी होनी चाहिए। पहले अंक की तैयारी में गिर्दा से राय-मशविरा होता रहा पर फिर कई निर्णय हमने गिरदा की असहमति के बावजूद स्वयं लिये और इस तरह अक्टूबर 1990 से उत्तरा निकलने लगी। शुरू-शुरू में लिखने में अटकाव आ जाता था। गिरदा ने एक दिन कहा, लिखते-लिखते लिखना आसान हो जायेगा। यह बात भी गिरदा ने ही एक दिन बातों-बातों में समझाई कि मत समझो कि जो तुम लिख रहे हो, वह विशुद्ध रूप से तुम्हारा लिखा हुआ है। तुम्हारे लिखे हुए में उन कई-कई लोगों की सोच या भाषा आकार ले लेती है,जो तुम्हारे इर्द-गिर्द बहस-मुबाहिसे में या सक्रियता में शामिल हैं। इस तरह गिरदा ने मेरे अहंकार के अंकुर को कुचल दिया।
बाद-बाद में उत्तरा को लेकर अधिक बातचीत गिरदा से नहीं हो पाती थी, पर उसे कुछ भी उत्तरा के उपयुक्त लगता तो कागज के टुकड़े में अपनी टिप्पणी के साथ वह भेज देते थे। हमारी बहुत सी बातें गिरदा को पसन्द नहीं आती थीं। कहीं न कहीं ये बातें झलक जाया करती थीं। परन्तु सामने-सामने प्रशंसा करना भी गिरदा की आदत में शुमार नहीं था। उसको समझना बहुत कठिन होता था। कहाँ सामान्य-सी बात व्यंग्य की सीमा के भीतर चली गई है, पकड़ना मुश्किल होता था और आज जो यह बात कही जा रही है, यह किस पिछले से पिछले दिन के सन्दर्भ में सुनाई जा रही है, याद आना आसान नहीं होता था। कोई भी काम करने के लिए एक चुनौती की तरह, एक मानदण्ड की तरह गिरदा सामने आ खड़े हो जाते थे और भारी उथल-पुथल भीतर पैदा हो जाती थी, क्या किया जाय, कैसे किया जाय।
यह कथा अभी बहुत लम्बी है पर शायद अभी इतना ही अवकाश है।