विनसर वन्य जीव विहार प्रभावित सुनोली, बसोली, ताकुला आदि क्षेत्रों की फसल को चैपट कर जंगली सुअर अब गांव की बस्तियों की ओर बढ़ आतंक मचाने लगे हैं। पहले फसल बचानी मुश्किल हो रही थी अब अपनी ही जान को खतरा बढ़ गया है। खुंखार जंगली जानवरों और वन कानूनों के बीच झूलते ग्रामीण अपने को असहाय महसूस कर रहे हैं। 31 जनवरी की प्रातः दस-ग्यारह बजे के बीच गांवों के लोग बसन्त पंचमी का त्यौहार मना रहे थे। अचानक सुनोली ग्राम सभा के तोक तिलधार से चीखने-चिल्लाने की आवाज वातावरण में गूँजी और लोग सब छोड़-छाड़ कर आवाज की दिशा की ओर भागने लगे। चारों ओर खबर फैल गयी कि जंगली सुअरों ने कई लोगों को घायल कर दिया है! सुअरों को मडराते हुए तरैचैंर के आसपास लोगों ने देखा था। धूप के चढ़ते ही सुअर न जाने कब तिलकपुर की ओर बढ़ गये। यहाँ एक सुअर नन्दन सिंह की पत्नी पर झपट पड़ा। बहू की चीख सुन जेठ लक्ष्मण सिंह भाकुनी हल्ला करते हुए सुअर को भगाने लगे तो वह उन पर ही झपट पड़ा। गनीमत रही लक्ष्मण सिंह जी की बनियान उसके जबड़े में आ गई और वह बनियान को उधेड़ते हुए सामने पतलखेत, भैंसोड़ी को अपने साथियों सहित भागा। तब तक काफी लोग सुअरों के पीछे पड़ चुके थे और सुअर भी कई लोगों को जख्मी करते हुए भाग रहे थे। पतलखेत के नन्दन को जख्मी कर सुअर मल्लाबूँगा के वीरेन्द्र भाकुनी पर झपट पड़ा। नन्दन को बचाने में गामीण सफल हुए तो सुअर ने भैंसोड़ी के मनोहर राम की जाँघ में जबड़ा जो मारा कि वह तभी छुड़ाया जा सका जब सुअर को मौत की नीद सुला दिया गया। घायलों का ताकुला अस्पताल में टांके लगवा मरहम-पट्टी की गई। घटना की सूचना विनसर वन्य जीव विहार के राजि कार्यालय को भी दी गयी लेकिन उन्होंने ग्रामीणों की किसी प्रकार की मदद करने में असमर्थता जताई।
सुअरों का आतंक तो यहाँ पहले से ही था, लेकिन इस घटना से क्षेत्र में दहशत और बढ़ गयी है। ग्रामीण बताते हैं, एक सुअर तो मारा गया लेकिन साथ के दो सुअर भागने में सफल रहे, जो अब निर्द्वन्द धूम रहे हैं। ग्रामीण सेवा संगठन सुनोली के लक्ष्मण सिंह भाकुनी बताते हैं उनका संगठन कई वर्षों से जंगली जानवरों से जान-मान की सुरक्षा करने तथा बाघ द्वारा मारे गये पालतू पशुओं व सुअर द्वारा की जा रही फसलों की क्षति का मुआवजा देने तथा ऐसे खुंखार जंगली जानवरों को मारने का अधिकार ग्रामीणों को देने की मांग करते आ रहा है। लेकिन सरकारें इस गम्भीर समस्या को सुलझाने के बजाय मामले को उलझा रही हैं। डोटियाल गाँव वन पंचायत के सरपंच बताते हैं कि राज्य सरकार द्वारा सुअरों को मारने संबन्धी जारी राजाज्ञा एक छलावा है। उसके तहत सुअरों को मारने आये शिकारियों के रहने-खाने व हर्जा-खर्चे की व्यवस्था ग्रामीणों को करनी है, जो बिल्कुल गलत है। इसका वनपंचायत सरपंच संगठन व ग्राम पंचायतें विरोध करती हैं। क्षेत्र की जनता कृषि व पशु पालन पर निर्भर है।
यह इलाका आलू, गडेरी व अन्य शाक-सब्जी के लिए प्रसिद्ध है, धान, गेहूँ आदि की फसल भी अच्छी होती थी। लेकिन कुछ वर्षों से जंगली जानवरों का आतंक इतना बढ़ गया कि अब ग्रामीणों को अपनी लागत भी नहीं मिल पा रही है। अन्य रोजगार के साधन हैं नहीं। सरकारी योजनाओं में भ्रष्टाचार व्याप्त है। रोजगार गारण्टी योजना का केवल हो-हल्ला ही है। गांवों में भुखमरी की स्थिति उत्पन्न होने से पलायन बढ़ता जा रहा है। ग्राम पंचायत संगठन मल्ला स्यूनरा विकास खण्ड ताकुला, जिला अल्मोड़ा के अघ्यक्ष चन्दन सिंह बिष्ट कहते हैं इस क्षेत्र में सुअरों सहित जंगली जानवरों का जबर्दस्त आतंक है। पूरे इलाके की फसल तो चैपट हो ही रही है, दिन-प्रतिदिन जानमान का खतरा भी बढ़ता जा रहा है। उत्तराखण्ड राज्य बनने के बाद उम्मीद थी सरकार इस ओर ध्यान देगी, लेकिन राज्य बनने के बाद समस्यायें और बढ़ गयी हैं। समस्या की जड़ को समझने और उसके अनुरूप नीतियाँ बनाने के बजाय अंग्रेजी शासनकाल से चले आ रहे नियम कानूनों को और कढ़ा कर उत्तराखण्ड की जनता पर लादा जा रहा है। इसीलिए ग्राम पंचायत संगठन ने पंचायत राज ऐक्ट के अनुसार ग्राम पंचायतों को अधिकार संपन्न बनाने की मांग की है। वे कहते हैं क्षेत्र में जंगली जानवरों का जबर्दस्त आतंक है लेकिन इस समस्या से निजात पाने के लिए गांव की जनता व उनके द्वारा चुनी गई पंचायतें अपने बलबूते कुछ नहीं कर सकतीं। वे सरकारों व उनके कायदे-कानूनों पर निर्भर हैं। और ये कायदे कानून इतने जनविरोधी हैं कि इनसे ग्रामीण पर्वतीय क्षेत्रों की दशा बिगड़ती जा रही है। हमने जंगली जानवरों को मारने का अधिकार ग्रामीणों को देने की मांग की है। जो स्थितियाँ सरकारों ने बना दी हैं उससे ‘मरता क्या न करता’ वाली बात चरितार्थ हो रही है।