चीड़ की पत्तियाँ, जो पिरूल के नाम से जानी जाती हैं, जंगलों में लगने वाली आग का सबसे बड़ा कारण हैं। लेकिन यही पिरूल, यानी ‘पाइनवेस्ट रौक्स बरगाई’ या ‘पाइन नीडल’ भी कहा जाता है, अब आजीविका का जरिया बन रहा है।
उत्तराखंड सरकार द्वारा चलाई गई ग्राम्या परियोजना में पिरूल, जिसका उपयोग पहले जानवरों के नीचे बिछाने तथा मक्खी, मच्छरों से उनकी सुरक्षा के लिए धुआँ करने के लिए किया जाता था, से कोयला यानि पाईन ब्रिकेट बनाने की अभिनव गतिविधियाँ शुरू की गई हैं। ग्राम्या के मुख्य परियोजना निदेशक एम. एच. खान कहते हैं कि फिलहाल दो दर्जन से अधिक स्वयं सहायता समूह इस काम में लगे हैं। पिरूल से कोयला निर्माण की विधि कठिन भी नहीं है। पहले पिरूल को एक विशेष रूप से बनाये गये ड्रम में जलाते हैं। ड्रम के भीतर कम ऑक्सीजन की स्थिति में जला होने के कारण पिरूल पूरी तरह जल कर राख नहीं हो पाता और यह चारकोल में परिवर्तित हो जाता है। फिर लगभग 10 प्रतिशत गोबर का घोल बनाकर चारकोल को आटे की तरह गूँथा जाता है। इस मिश्रण को पाइन ब्रिक्वेट मोल्डिंग मशीन में डालकर आसानी से कोयला बनाया जाता है। यह कोयला जलाने में धुआँ रहित है। इसमें राख अत्यंत कम मात्रा में पैदा होती है। इसका उपयोग सरल है। एक बार में यह विशेष चूल्हे में लगभग 600 ग्राम उपयोग कर डेढ़ घंटे उपयोग में लाया जा सकता है। पर्यावरण विशेषज्ञ डॉ. जे.सी. पाण्डेय कहते हैं कि ईंधन का एक वैकल्पिक स्रोत होने के कारण इससे वनों पर दबाव कम होगा। अगर समुदाय इस गतिविधि को सहर्ष स्वीकार कर लेगा तो पर्यावरण के संरक्षण की दिशा में एक महत्वपूर्ण काम हो सकता है।
स्वयं सहायता समूह से जुड़ी महिलाएँ कहती हैं कि प्रशिक्षण प्राप्त करने के बाद उन्होंने परियोजना के तहत मशीन व ड्रम प्राप्त किए हैं। गढ़वाल मंडल के चमोली गाँव की महिला प्रेरक हेमा डोबरियाल कहती हैं कि समूह मशीन के रखरखाव, बिजली का बिल इत्यादि की व्यवस्था के लिए 25 रुपया मासिक जमा भी कर रहा है। गंगोलीहाट के भगत सिंह ने इस कार्य को पूरी तरह से व्यावसायिक रूप दिया है। उन्होंने विगत वर्ष दस हजार रुपए की आय इससे प्राप्त की। लोग इस कोयले का उपयोग घरेलू कार्यों, होटलों में खाना पकाने व कपड़ों में प्रेस करने में उपयोग में ला रहे हैं। चंपावत जनपद के ग्राम पंचायत कमलेड़ी में गायत्री स्वयं सहायता समूह रौसाल में 20 महिलाएं इस काम में जुटी हंै। अल्मोड़ा जनपद के राजेश पांडे, जो कि अपने गाँव में एक छोटी सी दुकान चलाया करते थे, ने इस काम में हाथ आजमाया। जैसे ही उन्होंने कोयला बनाना शुरू किया स्थानीय बाजार में इसकी माँग बढ़ती चली गई। देखा-देखी गाँव के लोग भी कोयला उत्पादन की ओर प्रेरित हुए। अल्मोड़ा जनपद के ही रामदत्त बेलवाल घर में खेती-बाड़ी करते थे, लेकिन इससे साल भर का राशन तक नहीं निकल पाता था। आज वे प्रति माह 4-5 कुंतल कोयला बना कर लगभग 3 से 4 हजार रुपए कमा रहे हैं। अकेले जनपद पिथौरागढ़ के गंगोलीहाट विकास खंड में परियोजना के तहत 32 मशीनें व 100 चूल्हे लोगों को प्रदान किए जा चुके हैं। इनसे करीब 800 परिवार लाभान्वित हो रहे हैं। राज्य के 11 जनपदों के 18 विकासखंडों के 76 चयनित सूक्ष्म जलागम क्षेत्रों के बीच चलाया जा रहा है।