कवि और बसन्त
हरे बसन्त किलै भौछै तु तन्तुक चलबसन्त
त्यर हुनेर छौ अन्त कि म्यर हुनेर छु अन्त
हरे बसन्त…
पैलि बै तऽ भौतै मैलोकि छिये रे तु
आपुँ इकलै जै के ऊँछिये
दगाड़ में हिसाउ, किलमोडि़, बुराँस, काफोउ,
जाणि कतु डाव बोटनकें पौयै ल्यूँछिये
साल में एक बखत तु धरति कै आपण पैण दिछिये
जोगैल रंग में रंगी जाछि खेताक सिमार
चेलि बेटिनाक श्रृंगार
अणकसै किसमौक हुछि त्यर उ खुमार
जब मैं त्यर उ रूप देख छि
भौते मोहिल भौते रसिल गीत लेखि छि
जो लै कवि आजौक त्यर तौ रूप देखौल
बता धैं रे बसन्त तु पर उ के कविता लेखोल
किलै नि पौंइन बोट डाइ, किलै सुकिये रै गई सिमार
मंन्खि देखी रिसै गोछै कि आफि पडि़ गो छै बिमार
त्यर तौ रूप देखि पुर दुनि कै हरौ भिस्मान्त
हरे ओ….चलबसन्त
मैं कवि छुँ पुर दुनियक अपराध मैं आपण ख्वार ल्ह्यूँन
होइ मैन अपराध करि राखौ, मैन चुनि हालि बोट डाइनैकि मुनई
बज्यै हला जगौङ, फाडि़ हालि डाउ, मिढ़ लुकूण हुँ आपणि मुनई
तु रिसै जालै कबेर मैन सोचि न्हा
मैं करण में लागि रइ आपणि झनपन / एकै त्वी जै के रिसै रौछै
आइ य सौण भदो लै रिसाणी छन
मैं आपणि चाइपाति में लागि रई
भुलि गई, म्यर ज्यूँन रूण हुँ साल में एक बखत
त्यर ऊण जरूडि़ छौ
आ मैं त्यार स्वागत में, अपण हाडनैकि
निसाई-निसाई बाँज लै, लगून, बुराँश लै लगून
उतिस लै लगून, हिसाउ, किलमोडि़ चलमोडि़ लै लगून
चै र्रइं तुकै, जङोवाक, चाड़, तितिर, तु आलै त गीद गान कबेर
उदेखि रई चेलि बेटि, सुखी डाइन पार झुल लगै बेर
आ हो बसन्त पुर जोभन लि बेर आ
मैं कवि तु बसन्त, नै तु सन्त, नै मैं सन्त
आ छियै समाउनु आपुकें, हम द्वीनैकौ हरौ मन चल बसन्त
गजेन्द्र सिंह रावत