प्रस्तुति : सलीम मलिक / मुनीष अग्रवाल
कालाढूंगी में इन दिनों सन्नाटा पसरा हुआ है। चारों तरफ खाकी वर्दीधारी घूम रहे हैं। क्षेत्र में धारा 144 लगी है लेकिन माहौल कर्फ्यू जैसा है। नौजवान घरों से बाहर नहीं निकल रहे हैं या उनके मां-बाप ने डर के मारे उन्हें क्षेत्र से बाहर भेज दिया है। हर किसी की जुबाँ पर एक ही चर्चा है कि अब क्या होगा। पुलिसकर्मी की हत्या व थाने पर आगजनी के जुर्म में कौन-कौन धरा जाएगा। क्षेत्र में पुलिस की दबिशें जारी हैं। खुफिया विभाग के लोग सादी वर्दी में अपराधियों को सूँघ रहे हैं। जनता की ‘मित्र पुलिस’ जनता की शत्रु का रौद्र रूप धारण कर चुकी है। इस वक्त क्षेत्र का प्रत्येक निवासी पुलिस की दृष्टि में अपराधी है, वह कभी भी धरा जा सकता है। पुलिस ने बहीखाता खोल लिया है, जिसमें 15 लोग नामजद हैं। अभी अन्य 400 का नाम इस बहीखाते में लिखा जाना बाकी है। गाँव में दबिश देने 2-4 पुलिस वाले नहीं जाते, उनकी संख्या 200 तक भी होती है। इसका एकमात्र मकसद जनता में दहशत पैदा करना है। छुटभैये नेता अपने आकाओं के सामने अपना नाम पुलिस के मुकदमे में आने से बचाने के लिये गिड़गिड़ा रहे हैं। खाकी के आगे जनता बेबस, असहाय नजर आ रही है।
23 अगस्त की पूर्वाह्न का वह समय बीत चुका है, जब जनता ने भावावेश में आकर कुछ समय के लिए सब कुछ अपने हाथ में ले लिया था। अब खाकी ने अपने राज और रुतबे को फिर से कायम कर लिया है। अशोक कुमार, आई.जी. पुलिस ने जनता की दो नस्लें परिभाषित की हैं, एक पुलिस से लड़ने वाली, दूसरी पुलिस को बचाने वाली। पुलिस से लड़ने वालों को दण्डित किया जायेगा, पुलिस को बचाने वालों को पुरष्कृत।
लोग खुलकर नहीं बोल रहे हैं। कानाफूसी कर रहे हैं कि बलवन्त की हत्या नीरज ने नहीं की। तो फिर किसने की ? इसका उत्तर ग्रामीण कुछ इस प्रकार बयाँ करते हैं।
कोटाबाग के ब्लॉक प्रमुख बलवन्त सिंह कन्याल ने 22 अगस्त की रात में बसपा नेता नीरज तिवारी की एक रेस्टोरेन्ट में पिटाई कर दी। पिटाई के बाद नीरज तिवारी भागकर थाना कालाढूँगी पहुँचा। कुछ ही देर बाद बलवन्त भी एक पत्रकार के साथ थाने में पहुँच गया। बलवन्त वहाँ पुलिस से भी गाली-गलौज करने लगा। ग्रामीणों का कहना है कि जिस गोली से बलवंत की हत्या हुई, वह पुलिस की थी और उसकी हत्या थाने के बाहर नहीं, थाने के भीतर के कमरे में हुई है। पुलिस की गोली से बलवन्त की मौत की बात कितनी सच है इस पर कुछ नहीं कहा जा सकता, परन्तु उसकी हत्या थाने के अन्दर ही हुई इस बात को आई.जी. अशोक कुमार ने हादसे के तीन दिन बाद स्वीकार कर साबित कर दिया कि सबकुछ ‘उतना’ ठीक नहीं है, जितने का दावा पुलिस कर रही थी। हत्या के तत्काल बाद पुलिस ने बलवन्त की लाश को बाहर डलवा दिया और खून के निशान साफ करवा दिये। इस दौरान थाने की बत्ती बुझी रही, जबकि पूरा कालाढूँगी रोशनी से जगमगा रहा था।
मारे गये भाजपा नेता बलवन्त सिंह पर गम्भीर अपराधिक धाराओं के कुल 19 मुकदमे लगे थे तथा जबकि बसपा नेता नीरज तिवारी पर 2 मुकदमे चल रहे हैं, जिसमें से एक उसके फार्म हाऊस से सटी वन भूमि को लेकर है और दूसरा कांग्रेस कार्यकाल में धरना-प्रदर्शन का। जाहिर है कि नीरज पर चल रहे मुकदमे आपराधिक प्रवृत्ति के नहीं हैं।
ग्रामीण बताते हैं कि अगले दिन सुबह जब बलवन्त की बहन इंद्रा, अपने परिजनों व ग्रामीणों के साथ हत्या की जानकारी लेने कोतवाली पहुँची तो उसे बलवन्त की चप्पलें कोतवाली परिसर के भीतर पड़ी दिखाई दीं। बलवन्त के परिजनों ने जब इस पर पुलिस के सामने सन्देह व्यक्त किया तो खाकी ने इसका जवाब उन्हें पिटाई से दिया। इससे मामला बिगड़ गया, जनाक्रोश भड़क उठा व जनता बेकाबू हो गयी और फिर वह सब कुछ हुआ, जिसके लिये न तो क्षेत्र की जनता तैयार थी और न ही पुलिस। कालाढूँगी थाना फूँक दिया गया। दर्जनों वाहन जला दिये गये, पुलिसकर्मी भागते-छिपते नजर आए।
इसी दौरान नैनीताल के एस. एस.पी. मोहन सिंह बंग्याल, डी.एम. शैलेश बगौली, सी.ओ. मुकेश चौहान पुलिस टीम व वज्र वाहन साथ लेकर कालाढूँगी पहुँचे। आक्रोशित जनता को देखकर डी.एम., एस.एस.पी., सी.ओ. व पुलिस के सिपाही मौके से भाग खड़े हुए। उसी काफिले में शामिल पूरन लाल व 4-5 अन्य सिपाही पब्लिक के बीच फँस गये जिनकी जनता ने पिटाई कर दी। इसी बीच किसी ने पूरन लाल के सर पर पत्थर दे मारा, जिससे उसकी मौत हो गयी।
22 व 23 अगस्त का घटनाक्रम पुलिस प्रशासन की कार्यवाही पर कई तरह के सवाल खड़े करता है। पहला यह कि बलवन्त की हत्या थाने के भीतर हुयी है तो इस बात को स्वीकार करने में आई.जी. को तीन दिन का समय क्यों लग गया। इससे अंदेशा होता है कि क्षेत्र के ग्रामीण इस मामले में जो कुछ बोल रहे हैं, कहीं वह सच तो नहीं है। दूसरी बात पुलिस व प्रशासनिक अधिकारियों ने मौके से भागने के बजाय भीड़ को समझाने का प्रयास क्यों नहीं किया। क्या उनकी अपने स्टाफ के प्रति यही जवाबदेही है कि वे उन्हें छोड़कर मौके से भाग खड़े हों ? कल्पना कीजिये कि यदि इन आला अधिकारियों को अधीनस्थ कर्मचारी ऐसे ही हालात में छोड़कर भाग जाते तो क्या इन कर्मचारियों को यों ही छोड़ दिया जाता ? इससे भी ज्यादा महत्वपूर्ण सवाल यह है कि क्या कालाढूँगी की घटना उत्तराखण्ड की या देश की अनोखी घटना है ?
इसका जवाब है नहीं। देश में शायद ही कोई दिन ऐसा जाता हो, जब जनता का आक्रोश सरकारों के जनविरोधी रवैयों के कारण पुलिस अथवा सुरक्षा बलों के खिलाफ न फूटता हो। उत्तराखण्ड आंदोलन के दौरान पुलिस द्वारा रचा गया रामपुर तिराहा काण्ड, खटीमा, मसूरी काण्ड क्या उत्तराखण्ड की जनता कभी भूल सकती है ? कालाढूँगी की घटना क्या वर्ष 2001 में रामनगर में पुलिस कस्टडी में हुई मौत के बाद शहर में मचे बबाल से अलग है या दो वर्ष पूर्व बेतालघाट में पुलिस उत्पीड़न से आक्रोशित जनसमूह द्वारा इंस्पेक्टर का मुँह काला कर देने की घटना से अलग ?
ये सभी घटनाएँ चींख-चींखकर एक ही बात कह रही हैं, वह यह कि देश की पुलिस आजादी के 62 वर्षों बाद भी लगभग वैसी ही है, जैसी ब्रिटिशकालीन गुलाम भारत में थी। देश में अंग्रेजों के बनाए कानून आज भी राज करते हैं। भारतीय दण्ड संहिता 1860, पुलिस अधिनियम 1861, पुलिस अधिनियम 1888, पुलिस द्रोह अधिनियम 1922 इत्यादि देश के कानून की किताबों में आज भी मौजूद हैं। अंगेजों ने भारत में पुलिस का ढाँचा अपने लूट के साम्राज्य को कायम करने व देश की जनता का उत्पीड़न करने के लिये कायम किया था। आजादी के बाद सत्ताधारी पूँजीपतियों की पार्टी कांग्रेस ने उसी ब्रिटिशकालीन ढाँचे में कुछ फेरबदल करके गोद ले लिया। विडम्बना यह कि देश में एक के बाद एक सरकारें बदलती गयीं, परन्तु ढाँचे में कोई भी बुनियादी बदलाव नहीं हुआ।
कालाढूँगी में उपजे असंतोष का कारण मात्र बलवन्त सिंह की हत्या नहीं था। इस असंतोष के पीछे वे सभी कारण मौजूद हैं, जिसे देश की जनता रोज अपनी जिन्दगी में झेलती है। थाने जाने के नाम पर आज भी आम आदमी थर्रा जाता है। कमजोरों का उत्पीड़न, ताकतवरों-धनवानों का सहयोग देश की पुलिस का गुण है। फर्जी मुकदमें, फर्जी एनकाउन्टर, अवैध वसूली, जनान्दोलनों का निर्मम दमन, देश की पुलिस का चेहरा है। कानूनी मर्यादाओं का उल्लंघन कर लोगों से मारपीट, थर्ड डिग्री का इस्तेमाल, अवैध हिरासत में रखना, गाली-गलौज पुलिस की कार्यशैली है।
कुछ लोगों का कहना कि कालाढूँगी में पुलिस ने ढील दे दी। उसे सख्ती बरतनी चाहिये थी। सवाल यह है कि क्या वहाँ पर खून की नदियाँ बहा देनी चाहिये थीं। यहाँ यह तथ्य भी ध्यान में रखना चाहिए कि यदि उस दौरान भारी पुलिस बल कालाढूँगी थाने पर मौजूद होता तो शायद वहाँ पर लाशों के ढेर लग चुके होते। पुलिस की गोली से घायल दो लोगों का मामला भी इस शोरगुल में कहीं दब गया है। शासक वर्ग का एक हिस्सा इस तरह की घटनाएँ रोकने के लिए पुलिस को और ज्यादा दमनात्मक रुख अपनाने की बात कह रहा है। हमेशा सत्ताधारी ऐसे ही सोचते हैं। वे कभी अपनी गलती नहीं मानते। वे सोचते हैं कि दमन करके, कानून का भय दिखाकर वे सब कुछ ठीक कर लेंगे। परन्तु लोकतन्त्र में ऐसा सम्भव नहीं है। इस तरह की घटनाओं की पुनरावृत्ति रोकने के लिये दृढ़ राजनैतिक इच्छाशक्ति की जरूरत है, देश के कानूनी ढाँचे में आमूल-चूल बदलाव लाने की जरुरत है, जिसका दम इस देश की राजनैतिक पार्टियों में नहीं है। अब जनता को ही संगठित होकर पहल करनी होगी।
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