कालाढूंगी कांड ने उत्तराखडं पर एक बहुत बड़ा उपकार तो कर ही दिया है। इसने पार्टीगत राजनीति का चेहरा पूरी तरह उघाड़ कर रख दिया है। अपने आँख-कान खुले रखने वाले जागरूक लोग तो पहले भी यह जानते ही थे कि आखिर क्यों ऐसे लोग लाखों-करोड़ों रुपये खर्च कर ग्राम-प्रधान से लेकर सांसद तक के चुनाव लड़ रहे हैं, जिनका अपने समाज या राजनीति से कुछ लेना-देना ही नहीं है। आखिरकार तो राजनीति एक धंधा हो गई है, जिसमें दस लाख का निवेश करोगे तो एक करोड़ रुपया वापस लोगे। विधायक निधि और सांसद निधि के रूप में ठेके दे-देकर गाँव-गाँव तक अपने दलाल भी रख सकते हो और जमीनी स्तर के कार्यकर्ता को उपकृत भी कर सकते हो।
लेकिन सामान्य समझ वाला व्यक्ति इतनी गहराई तक जाकर नहीं सोचता था। कालाढूँगी कांड के बाद से वह सहमा और हक्का-बक्का है। ये क्या हो रहा है …..
उन्नीस संगीन मामलों के आरोपी एक गुण्डे, बलवन्त कन्याल, की थाने के भीतर हत्या हुई। कन्याल प्रदेश में सत्ताधारी भारतीय जनता पार्टी से जुड़ा था। ज्यादातर लोग यही मान रहे हैं कि वह हत्या पुलिस के ही किसी व्यक्ति ने की, क्योंकि ब्लॉक प्रमुख होने का फायदा उठा कर कन्याल न सिर्फ थाने के भीतर बैठ कर हफ्ता वसूलता था, बल्कि पुलिस अधिकारियों को गलियाता हुआ उन्हें यहाँ-वहाँ पटक देने की धमकी भी देता था। गरीब-असहायों का दमन करने वाली और उनके पक्ष में खड़े होने वाले लोगों को माओवादी कह कर जेल में ठूँस देने की आदी पुलिस के लिये यह अपमान नाकाबिले बर्दाश्त था। जब यह बेइज्जती अपनी सीमा लाँघ गयी तो मौका मिलते ही पुलिस ने कन्याल को ठिकाने लगा दिया और एक अन्य राजनीतिक पार्टी से जुड़े दूसरे अपराधी, नीरज तिवारी, को हत्या के मामले में फँसा दिया। …..सामान्य अफवाह यही है। एक नौजवान अपराध के रास्ते पर गया और जैसा कि अपराधियों के मामलों में होता है अकाल मौत मारा गया। पुलिस को किसी व्यक्ति को, भले ही वह कितना बड़ा अपराधी क्यों न हो, जान से मारने का अधिकार नहीं है। वह सिर्फ विवेचना कर किसी अपराधी को न्यायपालिका के दरवाजे तक ही पहुँचा सकती है, ऐसे सवालों पर माथापच्ची करने की क्षमता जनसाधारण की नहीं होती।
जब कन्याल की हत्या की खबर इलाके में फैली तो अगले दिन एक भीड़ ने कालाढूँगी थाने पर हमला कर जबर्दस्त तोड़फोड़ और आगजनी की और एक पुलिसकर्मी को जान से मार दिया। इस घटना ने पुलिस की कायरता साबित की तो उसकी मर्दानगी और गुस्से को भी जगाया। पूरा इलाका पुलिसिया आतंक से सहम गया। लोग अपने घरों से भाग कर इधर-उधर छिपने लगे। लेकिन अपनी आतंकी कार्रवाहियों के बावजूद पुलिस इस बार अतिरिक्त रूप से चौकस थी, क्योंकि कन्याल हत्याकांड की पोल खुल जाने तथा हमलावर भीड़ के आने पर जान बचाने के लिये भाग खड़े होने की जगहँसाई के झटके से भी उसने उबरना था। उसने दर्जनों लोगों को पकड़ा, लेकिन पूछताछ कर कुछ ही लोगों को गिरफ्तार किया…. सिर्फ उन्हें जिनके खिलाफ पुख्ता सबूत थे। पकड़-धकड़ की इस कार्रवाही के समानान्तर पुलिस के उच्चपदस्थ अधिकारी यहाँ-वहाँ आम जनता के साथ बैठक कर उसका विश्वास जीतने की भी कोशिश करते रहे। जनता से मोहब्बत दिखाने का पुलिस का यह विरल उदाहरण था।
इसी बीच पुलिस ने एक और कहानी गड़ी। उसने बताया कि देहरादून जेल में बंद एक शातिर अपराधी मिंटू चौधरी ने जेल के भीतर से कालाढूँगी थाने पर हमले की साजिश रची और और जेल से बाहर इस योजना को अंजाम देने में उसका साथ दिया युवा कांग्रेस के जिलाध्यक्ष संजय नेगी ने। मिंटू चौधरी को जेल से छूटने के बाद फिर से धर लिया गया और संजय नेगी ने कई हफ्तों तक पुलिस को छकाने के बाद 20 अक्टूबर को न्यायालय में आत्मसमर्पण कर दिया।
यह कहानी है….. घटनाक्रम है, जो भी समझिये। अफवाहें कितनी सच हैं, पुलिस का केस कितना पुख्ता है, यह तो अदालत ही तय करेगी। (अदालत का प्रसंग आया तो एक अवांतर प्रसंग यह भी है कि इसी बीच कई जजों द्वारा करोड़ों रुपये हड़पने के सनसनीखेज जी.पी.एफ. मामले के मुख्य अभियुक्त आशुतोष अस्थाना की जेल में हत्या कर दी गई है)।
लेकिन इस पूरे घटनाक्रम में जो सवाल उत्तराखंड के आम आदमी को मथ रहे हैं, वे हैं कि उन्नीस संगीन अपराधों के आरोपी को भाजपा ने अपना टिकट देकर ब्लॉक प्रमुख क्यों बनाया ? और जब वह मर गया तो क्यों भाजपा के ही नहीं, पक्ष-विपक्ष के सभी नेताओं में यह होड़ लग गई कि वे कन्याल के घर जाकर अश्रुपूर्ण नेत्रों से अपने श्रद्धा सुमन अर्पित कर आयें ? यहाँ तक कि साफ-सुधरी राजनीति का ढिंढोरा पीटने वाले पूर्व मुख्यमंत्री भुवन चन्द्र खंडूरी ने भी अपनी कुमाऊँ यात्रा का शुभारम्भ कन्याल के घर मत्था टेकने से ही की। क्या बलवन्त कन्याल महात्मा गांधी का अवतार था ? इनमें से कोई भी उस गरीब पुलिसकर्मी के घर क्यों नहीं गया, जिसे उसके वरिष्ठ अधिकारी बलवाइयों के आगे असहाय छोड़ आये थे और हिंसक भीड़ ने जिसे पागल कुत्ते की तरह मार डाला था ?
यह बात भी अखबारों ने छापी और अब इस पर खूब चर्चा हो रही है कि मिंटू चौधरी, जिसे पुलिस कालाढूँगी थाने पर हमले का मास्टरमाइंड बतला रही है, की गिरफ्तारी का विरोध करने वालों में साफ-सुथरे राजनेता माने जाने वाले चन्द राजघराने के सांसद के. सी. सिंह बाबा प्रमुख थे। क्या बाबा साहब और मिंटू चौधरी के आपसी सम्बन्ध वास्तव में उतने ही घनिष्ठ हैं, जितनी कि कानाफूसी हो रही है ? ![]()
लेकिन इस वक्त लोग सबसे ज्यादा इस बात से भौंचक्के हैं कि प्रदेश भर के कांग्रेसी नेता उस संजय नेगी की गिरफ्तारी के विरोध में आन्दोलन कर रहे हैं, जो स्वयं यह स्वीकार कर चुका है कि मिंटू चौधरी से उसका परिचय जेल के भीतर ही हुआ था। निचले स्तर पर ठेकेदारी करते हुए किसी बड़े नेता का दामन पकड़े रहने को राजनीति मानने वाले छुटभैये कांग्रेसियों से लेकर केन्द्रीय मंत्री हरीश रावत तक ने संजय नेगी को ‘पुलिस द्वारा लपेटने’ के मामले को लेकर आसमान सिर पर उठा रखा है। लोग ताज्जुब कर रहे हैं कि गैरसैंण राजधानी, नौकरशाही में भ्रष्टाचार, विकास कार्यों में लूट-खसोट, गाँवों से पलायन, महिलाओं की दिनोंदिन बदतर होती हालत, चौपट होती शिक्षा व युवाओं में बेरोजगारी, जंगली जानवरों से बर्बाद हो रही किसानी, अभयारण्यों और जल विद्युत परियोजनाओं से उजड़ते ग्रामीण, सूखा व महंगाई जैसे अनन्त मुद्दों को छोड़ कर सिर्फ यही मुद्दा कांग्रेस के पास आन्दोलन करने के लिये रहा कि संजय नेगी को गिरफ्तार मत करो। अभी गिरफ्तारी ही तो हुई है, सजा तो नहीं हुई है! इस मामले में कांग्रेस की सबसे ज्यादा जगहँसाई तो तब हो पड़ी जब पुलिस ने अपने पर बन रहे दबाव को कम करने की गरज से मिंटू चौधरी ओर संजय नेगी की सैलुलर फोन पर कथित रूप से हुई बातचीत को एक दैनिक अखबार को लीक कर दिया। इस खबर के छपने के बाद अपने को इज्जतदार समझने वाले बहुत से कांग्रेसी मुँह छिपाने लगे।
लोग यह भी पूछ रहे हैं कि एक भाजपायी गुण्डे की हत्या पर बलवा कराने की जरूरत एक कांग्रेसी गुण्डे को क्यों आ पड़ी ? क्या अनैतिक धंधों और ठेकदारी की लूटखसोट राजनैतिक विचारधारा से कहीं बड़ी होती है ? इसका मतलब कि चुनाव में जो जबर्दस्त प्रतिद्वन्द्विता दिखलाई जाती है, क्या वह महज दिखावा होती है ?

























कालाढूंगी काण्ड की जांच सी०बी०आई० से भी होनी चाहिये और न्यायिक जांच सुप्रीम कोर्ट के किसी अवकाश प्राप्त जज के द्वारा भी। अगर यह दो जांच हो जांये तो जनता के हितैषी साबित करने पर तुले उत्तराखण्ड के आज के कई नेता मुंह दिखाने के काबिल भी न रह पायेंगे।