मुख्यमंत्री भुवन चंद्र खंडूरी अब लोक लुभावन घोषणाओं पर उतर आये हैं। किसानों को बिजली की पेनाल्टी की माफी, सचिवालय में संविलयन की मांग कर रहे संबद्ध कर्मचारियों को तोहफा, उत्तराखंड राज्य आंदोलनकारियों के चिन्हीकरण और उनके कल्याण का फैसला, जमीन की कीमतों में इजाफा रोकने के लिये इमारतों की ऊँचाई को बढ़ाने की मंजूरी और युद्धभूमि में वीरता पुरस्कार प्राप्त करने वालों को 25 लाख रुपये तक देने की घोषणा।
इन सरकारी घोषणाओं को सरकारी अमला और उनके चाटुकार भले ही लाभकारी मानें, लेकिन इनमें एक भी घोषणा संपूर्ण राज्य के हित में नहीं है। लगता है जैसे मुख्यमंत्री खंडूरी वर्ग विशेष पर अपनी पकड़ मजबूत करने के लिये ही कदम उठा रहे हों। राज्य आंदोलनकारियों के चिन्हीकरण के लिये परिषद बनाना कोई पहली बार नहीं हो रहा है। इससे पहले कांग्रेस सरकार ने भी ऐसा निर्णय लिया था और उसने भी राज्य आंदोलनकारी कल्याण परिषद बनाई थी, जिसने कई आंदोलनकारियों का ‘चिन्हीकरण’ कर उन्हें सरकारी नौकरी दी। यह अलग बात है कि परिषद के कामकाज पर सवाल उठे और आंदोलनकारियों को सरकारी नौकरी देने के फैसले को जनपक्षीय मुद्दों पर संघर्ष रोकने की एक सोची समझी रणनीति के रूप में देखा गया। इसका असर कांग्रेस सरकार के पाँच सालों में दिखाई भी दिया। उत्तराखंड के जन संघर्षों से जुड़े कई युवा सरकारी हो गये। सरकार के जनविरोधी निर्णयों पर इन आंदोलनकारी ‘सरकारी युवाओं’ को ‘टीस भरे आक्रोश’ में साफ देखा जा सकता था। खैर ! खंडूरी सरकार ने एक बार फिर से आंदोलनकारियों के कल्याण के लिये सुशीला बलूनी की अध्यक्षता में एक सम्मान परिषद बना दी है। इस परिषद की वास्तविकता भी जल्दी पता चल जायेगी। क्योंकि आंदोलन की मूल भावना गैरसैंण को राजधानी बनाने की थी, लेकिन भाजपा व कांग्रेस, दोनों की ही सरकारों ने गैरसैंण को ‘गैर’ बनाने के राजनैतिक षड़यंत्र रचे हैं। पिछले सात सालों से सफेद हाथी में तब्दील हो चुके दीक्षित आयोग का कार्यकाल लगातार बढ़ाया जा रहा है। ऐसे में आन्दोलनकारियों के सम्मान का मतलब क्या रह जाता है?
इसी तरह से इमारतों की ऊँचाई बढ़ाने को भी सरकार ने जमीन की बढ़ती कीमतों पर अंकुश लगाने वाला बताया है। जमीनी सच्चाई यह है कि इससे आम आदमी को फायदा तो नहीं हो पायेगा, बल्कि राजनैतिक दलों को चुनावी चंदा देने वाले वर्ग में से एक, बिल्डरों को अवश्य ही फायदा होगा। इसी तरह युद्धभूमि में वीरता पदक प्राप्त करने वाले विभिन्न श्रेणी के जवानों के लिये प्रोत्साहनस्वरूप भारी-भरकम रकम देने की घोषणा भी सरकार ने की है। इस घोषणा से भी गिने-चुने सैनिकों को ही कुछ फायदा होगा। सैनिकों के कल्याण के लिये कोई भी योजना सरकार ने नहीं बनाई है। वीरता की कीमत क्या चंदा-रुपये ही हैं ? क्या उसके एवज में सैनिक और उनके परिवारों के सुरक्षित भविष्य के लिये दीर्घकालिक योजना नहीं बनाई जा सकती, जिससे उनकी वीरता का भी सम्मान हो और उनका परिवार स्वयं को भी सुरक्षित महसूस करे। उन हजारों सैनिकों, जो परिस्थितिवश पदक पाने से वंचित रह जाते हैं, के व उनके परिवार के कल्याण की जिम्मेदारी क्या सरकार की नहीं है ?
इन लोक लुभावन घोषणाओं में सबसे ज्यादा जिसकी चर्चा हो हो रही है, वह है किसानों के बिजली अधिभार को माफ करना। यह माफी लगभग 12 करोड़ रुपये की है। राज्य के किसानों पर 33 करोड़ रुपये का बिजली किराया बाकी है। इसमें 12.26 करोड़ रुपये अधिभार भी शामिल है। सरकार ने दावा किया है कि इससे प्रदेश के दस लाख किसानों को लाभ होगा। लोग आश्चर्य व्यक्त कर रहे हैं कि आखिर वे दस लाख किसान कौन से हैं, जो लाभान्वित होंगे ? क्योंकि बिजली बकाया वाले सम्पूर्ण जिले दो ही हैं, एक उधमसिंह नगर और दूसरे हरिद्वार। इन दोनों जिलों की जनसंख्या क्रमशः लगभग 12 लाख और 14 लाख है। इनमें भी उधमसिंह नगर में ज्यादातर किसान काफी धनी हैं। हरिद्वार में जरूर कुछ किसानों की माली हालत खराब हो सकती है। लेकिन यहाँ भी किसानों के एक बड़े हिस्से को डीजल इंजन के पम्प से भूजल खींचना आता है, या वे गंगा नहर के पानी से खेतों में सिंचाई करते हैं। देहरादून, नैनीताल और पौड़ी जिलों में काफी कम किसान ट्यूबवेल से सिंचाई करते हैं। इनमें से भी अधिकांश अपने फसल चक्र के अनुसार बिजली का भुगतान करते रहते हैं। पहाड़ के किसान तो बिजली से सिंचाई करते ही नहीं हैं। ऐसे में क्या यह नहीं माना जाना चाहिये कि प्रदेश सरकार ने उधमसिंह नगर और हरिद्वार के उन चंद किसानों के दबाव में ऐसा निर्णय लिया है, जो अब राजनैतिक रूप से काफी शक्तिशाली हो चुके हैं। पहाड़ के किसान अपनी नकदी फसलों, माल्टा, सेव, मंडवा, राजमा, आलू आदि के सही मूल्य के लिये भी तरस जाते हैं। लेकिन कोई भी सरकार इनकी ओर ध्यान नहीं देती। माल्टा को हर वर्ष पहाड़ के किसान ओने-पौने दामों पर बेचने को मजबूर हैं। ऐसे में प्रदेश सरकार को इस कदम का किसानों के हित में माना जाये या फिर तथाकथित किसानों को राजनैतिक दबाव में खुश करने वाला कदम ! क्या सरकार यह बता सकती है कि उसकी इस दरियादिली से लाभान्वित होने वाले ये लगभग दस लाख किसान आखिर हैं कौन ?






















आपकी टिप्पणीयाँ