प्रमोद जोशी पर लिखते हुए पहला डर यह लगता है कि यह नाम यानी प्रमोद जोशी इतना ‘कॉमन’ हो गया है कि पाठक कैसे समझ पायेंगे कि मैं किस प्रमोद जोशी की बात कर रहा हूँ। चलिए सबसे पहले मैं प्रमोद जोशी की सही पहचान कराता हूँ और यह काम उसी तरह करता हूँ जैसा मेरी नानी ने अपने एक रिश्तेदार का घर खोजते हुए किया था। किस्सा यह है कि मेरी नानी कभी कहीं अकेली नहीं गयी थीं। एक बार पता नहीं कैसे वे अकेली लखनऊ स्टेशन पहुँचीं। जो साथ में था उससे ट्रेन छुट गई थी या पता नहीं क्या हुआ था। बहरहाल लखनऊ स्टेशन पर नानी अकेली थीं और उन्हें हमारे एक मौसा आसिफ शाह के घर जाना था। उन्होंने रिक्शे वाले को मौसा का नाम बताया और कहा कि वहाँ जाना है। जाहिर है मौसा महात्मा गांधी या जवाहरलाल नेहरू नहीं थे। रिक्शेवाला समझ नहीं पाया। तब नानी ने कहा कि उनके घर में खिन्नी का पेड़ है, वहाँ ले चलो। इस पर भी रिक्शेवाला नहीं समझ पाया। तब नानी ने कहा कि उनके पास दो काले बड़े कुत्ते हैं। यह जानकारी भी काफी नहीं थी। तब नानी ने मौसा का हुलिया और कद-काठी समझाने की कोशिश की लेकिन रिक्शेवाला नहीं समझ पाया कि उन्हें किसके घर जाना है। खैर ये सब हो ही रहा था कि मौसा आ गये। उनके पास फोन आ गया था कि नानी अकेली लखनऊ पहुँच रही हैं।
तो मैं अब प्रमोद जोशी, कौन से प्रमोद जोशी हैं, यह बताने की कोशिश कर रहा हूँ। उससे पहले यह बता दूँ कि एक जमाना था जब लोगों के बच्चे बहुत होते थे और उनके नाम रखना कठिन हो जाता था। माँ-बाप दोनों, नाम रखते रखते परेशान हो जाया करते थे। शायद इन्हीं हालात में प्रमोद नाम रखा गया होगा। बहरहाल मैं जिस प्रमोद जोशी की बात कर रहा हूँ उनका परिवार अल्मोड़ा का था। हालाँकि प्रमोद जोशी दिल्ली में पैदा हुए थे क्योंकि उनके पिता सरकारी नौकरी में थे। लेकिन प्रमोद जोशी को अल्मोड़ा से इतना लगाव था कि वे अपने आप को अल्मोड़ा में जन्मा ही मानते थे। प्रमोद जोशी कुमाउनी ब्राह्मणों की तरह गोरे चिट्टे थे। नाक नक्शा खड़ा था और ब्राह्मणों की ही तरह काफी तेज दिमाग के थे। लखनऊ में बचपन गुजरा था। अल्मोड़ा के बाद उनका दूसरा पसन्दीदा शहर लखनऊ था। लखनऊ में वे अपने ताऊ के यहाँ रहते थे। स्कूल में हमेशा अव्वल आते थे। लेकिन दो-एक साल के बाद ये हुआ कि क्लास में जो कुछ टीचर ब्लैक बोर्ड पर लिखता था वह प्रमोद जोशी को दिखाई देना बन्द हो गया था। प्रमोद जोशी इसकी वजह न समझ पाते थे।
फिर अचानक यह पता चला कि उनकी आँखें कमजोर हैं और उनके चश्मा लगवा दिया गया। प्रमोद जोशी विज्ञान और गणित के विषयों में बहुत दिलचस्पी लेते थे। सब जानते थे कि वे इंजीनियर या डाक्टर बनेंगे। लेकिन ऊपर आकाश में बैठा भगवान कुछ और ही रच रहा था। प्रमोद जोशी को टी.बी. हो गई थी। भवाली में उनका आपरेशन हुआ था। आपरेशन बिगड़ गया था। उसके बाद उनका दूसरा बड़ा आपरेशन दिल्ली में डॉ. आत्माराम ने किया था। बचने के ‘चांसेज’ बहुत कम थे। लेकिन बच गये। एक फेफड़ा निकाल दिया गया था। पढ़ाई में गैप आ गया था। उस वक्त प्रमोद बारहवीं क्लास पास थे। बी.ए. की परीक्षा न दे पाये थे। प्रमोद दिल्ली आ गये और एक एडववरटाइजिंग एण्ड सेल्स प्रोमोशन कम्पनी में काम करने लगे। यहीं उनके साथ अद्भुत चित्रकार मिकी पटेल भी काम करते थे। संस्था का माहौल बहुत रचनात्मक था। यहीं मुजफ्फर अली से भी प्रमोद की मुलाकात हुई थी। प्रमोद फोटोग्राफी और फिल्मों में रुचि लेने लगे थे। इसके बाद वे साहू जैन में ‘पब्लिसिटी’ का काम देखने लगे थे। उनके सम्पर्क में बड़े चित्रकार, छायाकार और लेखक आने लगे थे।
प्रमोद टाइम्स ऑफ इंडिया बिल्डिंग की तीसरी मंजिल पर बैठते थे। नीचे नवभारत टाइम्स का आफिस था। उस जमाने का सुप्रसिद्ध साप्ताहिक ‘दिनमान’ भी वहीं से निकलता था। लगे हाथों यह भी बताता चलूँ कि यह वह जमाना था जब हिन्दी पत्रकारिता में लेखकों की खासी पूछ हुआ करती थी और बड़े-बड़े लेखकों को पत्रिकाओं में नौकरी दी जाती थी। भाई भतीजावाद, जातीय गिरोहबंदी, क्षेत्रीय प्राथमिकताओं और चमचागीरी का जो दौर चल रहा है वह न था। इसलिये ‘दिनमान’ में स.ही. वात्स्यायन, रघुवीर सहाय, श्रीकांत वर्मा, सर्वेश्वर दयाल सक्सेना, प्रयाग शुक्ल, इब्बार रब्बी जैसे लोग काम करते थे। इन्हीं में ‘दिनमान’ के फिल्म समीक्षक नेत्र सिंह रावत भी हुआ करते थे जो विलक्षण प्रतिभा के धनी थे। तो टाइम्स ऑफ इंडिया की कैण्टीन में एक दिन संयोग से प्रमोद जोशी और नेत्र सिंह रावत की मुलाकात हो गई थी। दोनों में फौरन दोस्ती हो गई थी।
यह सन् 1971-72 का जमाना था। टाइम्स ऑफ इंडिया बिल्डिंग के पास ‘लिंक हाउस’ में हिन्दी ‘पैट्रियट’ निकलता था जहाँ मंगलेश डबराल काम करते थे। मैं भी किस्मत और उत्साह का मारा यहाँ सिर पटकने पहुँच गया था। मंगलेश के अभिन्न मित्र त्रिनेत्र जोशी भी उन दिनों दिल्ली में फ्रीलांसिंग कर रहे थे। नेत्र सिंह रावत के साथ एक शाम प्रमोद जोशी काफी हाउस आये थे। वहाँ मित्रों की मंडली जमती थी। इनमें प्रमुख रूप से आनन्द स्वरूप वर्मा, पंकज बिष्ट, सुरेश सलिल, असद जैदी, रमाकांत जी, विष्णु प्रभाकर जी और तमाम दूसरे हिन्दी के छोटे बड़े साहित्यकार आते थे। यहीं हम लोगों की मण्डली बनी थी।
मुझे यह देर से पता चला था कि प्रमोद जोशी का आपरेशन हो चुका है और उसके एक ही फेफड़ा है। क्योंकि प्रमोद को मैंने हमेशा उत्साह से भरा, सब कुछ कर देने पर तैयार और सब के साथ कदम मिला कर चलने वाला पाया था। वह कभी कभी सिगरेट के दो चार कश भी लगा लेता था। खैनी की एक चुटकी भी मुँह में डाल लेता था। मौका आने पर एक दो पेग भी हलक में उँडेल लिया करता था। उन दिनों काफी हाउस में नक्सलवाद का बहुत जोर था। प्रमोद भी इसके प्रभाव में आ गया था और धीरे-धीरे पक्का होता चला गया था। मैं नक्सलवाद को पूरी तरह न समझ पाया था इसलिए कुछ मित्र मेरे ऊपर शक करते थे। लेकिन प्रमोद में ऐसा कुछ न था। रोज शाम को मिलने, दस-ग्यारह बजे तक साथ रहने हमख्याल होने के कारण हम लोगों का एक बहुत मजबूत ग्रुप बन गया था। काफी हाउस में ऐसे मित्र भी आते थे जिनके पास काफी के पैसे न होते थे, वापस जाने के लिए बस का किराया न होता था, दवा खरीदने के पैसे न होते थे; ऐसे मौकों पर आम तौर पर प्रमोद मदद करता था। बहुत खुले दिल और प्यार से।
फिर पता नहीं क्या हुआ कि मेरी प्रमोद जोशी से कुछ ज्यादा ही छनने लगी। वजह शायद यह हो सकती है कि हम दोनों योजनाएँ बनाने में बड़ी रुचि लिया करते थे। दिन में सपने देखने का हमें शौक था। गप मारना दोनों को बहुत प्रिय था। वह मेरे लेखन को पसंद करता था। मुझे उसके फोटोग्राफ अच्छे लगते थे। हम दोनों फिल्म बनाने के जुनून में भी गिरफ्तार थे। नेत्र सिंह हमारा समर्थन करता था।
इन्हीं दिनों प्रमोद जोशी के माध्यम से हमारे ग्रुप में वीको सोनी या विजय सोनी नाम के व्यक्ति भी आ जुड़े थे। वीको चित्रकार अभिनेता था। पोलैण्ड में रह चुका था। बहुत प्यारा आदमी था। पत्नी पोलिश थी। उसने मुक्तिबोध की कविता ‘अंधेरे से’ का बड़ा अच्छा मंचन किया था। वीको का कोई दोस्त एक पुराना मूवी कैमरा बेच रहा था। यह कैमरा प्रमोद जोशी ने खरीद लिया था। अब तो हमारी फिल्म बनाने वाली योजना में पंख लग गये थे। पर उस समय हमें यह मालूम न था कि प्रमोद ने जो कैमरा खरीदा है वह ‘म्यूजियम पीस’ है और उससे फिल्म कभी नहीं बन सकती। बहरहाल सपनों की उड़ान कैमरे की गति से ज्यादा होती है।
शायद 1974-75 की बात है जब प्रमोद जोशी के छोटे भाई प्रभात को मुम्बई के ओबेराय होटल में नौकरी मिली थी। मैंने और प्रमोद ने प्रोग्राम बनाया था कि मुम्बई जायेंगे और फिर वहाँ से गोवा चलेंगे। गोवा के बारे में उन दिनों काफी रोमाण्टिक धारणाएँ बनी हुई थीं। खैर हम मुम्बई पहुँचे। प्रभात किसी पारसी महिला का ‘पेइंग गेस्ट’ था। वहाँ ठहरने का जुगाड़ नहीं बन सका। हम दोनों ‘टाइम्स ऑफ इंडिया’ में आकर विष्णु नागर और मधुसूदन आनंद से मिले और उनकी कृपा से उस गेस्ट हाउस में ठहरे जहाँ वे रहते थे।
गोवा में हम कोई दुर्लभ अनुभव करना चाहते थे। पर दिन में सपने देखने वालों का कोई पूछने वाला नहीं है। हमने पुर्तगाली खाना खाया, वहाँ की प्रसिद्ध फेनी का स्वाद चखा। स्थानीय बाजारों और समुद्र तट पर घूमे। उस समय के प्रसिद्ध ‘अनजुना बीच’ पर गये जहाँ सांसारिक बंधनों से मुक्त होकर हिप्पी मौज मस्ती करते नजर आये। प्रमोद का कैमरा उसके कंधे से लगा रहता था। वह लगातार चित्रांकन करता था। वापसी के लिये हमने समुद्री रास्ता चुना। प्रमोद ने इस यात्रा के कुछ अविस्मरणीय चित्र खींचे थे। अब पता नहीं वे चित्र कहाँ हैं ?
प्रमोद से मैं अक्सर कहा करता था कि यार तुमने कोई काम जम कर क्यों नहीं किया ? तुमने इतने अच्छे चित्र खींचे हैं। कभी अपनी प्रदर्शनी लगाते। अखबारों में छपवाते। चित्रों की किताबें छपतीं। रघु राय को देखो। अशोक दिलवाली को देखो। दोनों तुम्हारे दोस्त हैं और आज अन्तर्राष्ट्रीय ख्याति के चित्रकार हैं। तुमने इतनी अच्छी कविताएँ लिखीं। किताब भी छपी। फिर तुमने कविताएँ लिखना और छपवाना बंद कर दिया। तुमने इतनी अच्छी फिल्म समीक्षाएँ लिखीं और फिर उस काम को भी छोड़ दिया। तुम कोई अच्छी लघु फिल्म बनाते। ऋत्विक घटक पर तो तुम एक किताब लिख सकते हो। तुमने ये सब क्यों नहीं किया ? प्रमोद इन सवालों पर हँसता था और कहता था- यार मेरे इन सब कामों को तुम जोड़ डालो और फिर देखो मैंने क्या किया है। प्रमोद के अंदर एक संतों सी निर्लिप्तता थी। एक ऐसा भाव कि ‘होता है शबो- रोज तमाशा मेरे आगे’।
प्रमोद ने जिस आफिस में काम किया वहाँ के चपरासी, ड्राइवर और दूसरे चतुर्थ श्रेणी के कर्मचारी उससे बहुत खुश रहा करते थे। पूछने पर वह कहता था कि यार मेरा मार्क्सवाद यहाँ तक साथ चला आया है। उसके अंदर कभी छोटे-बड़े को लेकर कोई भेद मैंने नहीं देखा। वह घनश्यामदास बिड़ला और रूपसिंह चपरासी को बराबर का सम्मान दिया करता था। नये लोगों से मिलने और उनसे दोस्ती कर लेने की कला उसे अच्छी तरह आती थी।
प्रमोद की एक कमजोरी थी- पहाड़ और पहाड़ी। मैं उसे छेड़ा भी करता था। वह जल कर कहता था तुम तो पहाड़ी नहीं हो, न कुमाऊँ के हो, न ब्राह्मण हो- लेकिन मेरी कमजोरी हो। प्रमोद की एक दूसरी कमजोरी थी गप्प मारना। उसे गप्प मारने की बड़ी गंभीर बीमारी थी। उसे कोई न कोई ऐसा चाहिए होता था जिससे गप्प मारी जा सके। बाद के दिनों में वह अल्मोड़ा के जीवन और अपने पुराने संबंधियों के बड़े रोचक किस्सेसुनाया करता था। अकसर वह यह भूल जाता था कि वह यह किस्सा सुना चुका है। लेकिन मैं चुपचाप सुन लेता था क्योंकि मुझे पता था कि इससे उसका इलाज हो रहा है।
काफी हाउस के दिनों में ही एक बार यह पता चला कि प्रमोद बी.ए. की परीक्षा दे रहा है। इस पर मण्डली की अलग-अलग राय थी। रावत इसके पक्ष में था। कुछ लोग इसे बेवकूफी मानते थे। लेकिन प्रमोद पूरी वैचारिक प्रतिबद्धता और क्रांतिकारिता के बावजूद यह मानता था कि बी.ए. किए बिना उसके लिए अच्छी नौकरी के दरवाजे बंद हैं। वह साहू जैन से निकल कर ‘अजंता ऑफसेट प्रेस’ में लग गया था। जहाँ उसे दोयम दर्जे के काम करने पड़ते थे। सरकारी पब्लिक सेक्टर की नौकरियाँ उसे मिल नहीं सकती थीं क्योंकि वह बी.ए. नहीं था। बी.ए. पास करते ही उसे एच.आई.एल में जन सम्पर्क अधिकारी की नौकरी मिल गयी थी।
यह तकरीबन 1982-83 की बातें हैं। अब सवाल था कि यार हमें फिल्म बनानी है, प्रकाशन खोलना है, अखबार निकालना है, यात्राएँ करनी हैं लेकिन हमारे पास पैसा नहीं है। मतलब पहले पैसा आना चाहिए। प्रमोद को अन्तर्राष्ट्रीय पत्रिकाएँ पढ़ने में मजा आता था। एक दिन मैं उसके ऑफिस गया तो बोला, ‘‘यार देखो इकोनॉमिक टाइम्स में छपा है, एक पानी का जहाज है जिसमें ‘डनहिल’ सिगरेट भरी है। यह हांगकांग से ईरान के पोर्ट अब्बास के लिये रवाना हुआ था। लेकिन इस बीच ईरान में क्रांति हो गयी है। यह जहाज बीच समन्दर में खड़ा है। इसके मालिक अंतर्राष्ट्रीय मार्केट में ग्राहक तलाश कर रहे हैं। अगर यार हम लोग ये सौदा करा दें तो करोड़पति हो जायेंगे।’’ मैं उसकी सूरत देखने लगा और बोला- ‘‘अबे पागल हुआ है क्या ?’’
-‘‘क्यों पागल की क्या बात है ?’’ वह बोला और फिर एक पूरा किस्सा सुना दिया जिसका लुब्बेलुबाब यह था कि एक साधारण आदमी इसी तरह के किसी काम से कैसे करोड़पति बन गया। बहरहाल वह माना नहीं। ग्राहक तलाश करता रहा।
एक दिन उसके दफ्तर गया तो मेज पर छोटी-छोटी पुड़ियों में चावल के कुछ नमूने रखे थे। पूछने पर बताने लगा कि यार सोवियत यूनियन वालों ने पचास लाख टन चावल का टेण्डर निकाला है। मैं सोचता हूँ…..’’ मैंने उसकी बात काट कर कहा था- ‘‘बंद कर यार……तू क्या करेगा….तुझे मालूम है इतनी ही चालाकी होती तेरे अंदर तो आज हमारी फिल्म बन गयी होती।’’
प्रमोद जिन्दगी भर कोई मोटा पैसा नहीं कमा सका। उसे किसी भी काम में करोड़ों नहीं मिले। लेकिन एक दिलचस्प बात है कि चतुराई-चालाकी से करोड़ों कमा लेने वालों को वह बड़ी अच्छी नजर से देखा करता था। यह एक अजीब तरह की प्रवृत्ति है। मेरे ख्याल से मेरे पिताजी भी ऐसे ही थे। प्रमोद की जिन्दगी में कभी कभी ऐसे फ्रॉड भी आ जाते जो उसे ‘सब्जबाग’ दिखाया करते थे। लेकिन कभी उसका भला हुआ हो यह मुझे याद नहीं। हाँ सैर-सपाटे, तफरीह की बात और है।
वह एच.आई.एल. में तब लगा ही था जब उसकी शादी हुई। उसने मुझे अपनी शादी में आने का नेवता दिया था। जबकि इससे पहले जब मैंने अपनी शादी की थी तो उसे या किसी भी दोस्त को नहीं बुलाया था। उस जमाने में मैं ‘विद्रोही प्रवृत्ति’ का आदमी था और लीक से हट कर काम करता था। बहरहाल न बुलाने पर भी प्रमोद जोशी मेरी शादी में लखनऊ आया था। और उसने मुझे ‘हनीमून’ मनाने के लिए अल्मोड़ा बुलाया था। जहाँ हम लोग गये भी थे और उसके पुश्तैनी मकान में ठहरे थे।
इन्हीं दिनों या इससे दो-एक साल बाद की बात है। मैंने धारावाहिक बनाने के लिए एक प्रस्ताव दूरदर्शन को दिया था। किस्सा यह था कि किसी एक व्यक्ति ने एक प्रस्ताव मुफ्त में तैयार करवाया था और कहा था कि पास हो जायेगा तो पैसा देगा। मैंने सोचा यार मेरे पास क्या प्रमाण होगा कि वह धारावाहिक मैंने लिखा है ? अगर उस आदमी ने पैसे देने से इंकार कर दिया या प्रोपोजल से मेरा नाम निकाल दिया तो क्या होगा ? यही सब सोच कर मैंने वही प्रस्ताव अपने नाम से दूरदर्शन को भेज दिया था। ख्याल था कि यह सबूत के तौर पर काम आयेगा। लेकिन जिसने प्रोपोजल भेजना था उसने तो नहीं भेजा और मेरा भेजा प्रोपोजल पास हो गया। यह उस जमाने में बड़ी बात और ‘लाखों का खेल’ माना जाता था। इससे मैं और प्रमोद दोनों ‘एक्टिव’ हो गये थे। बहुत लम्बा किस्सा है लेकिन इसे लेकर हम दोनों के संबंधों में कुछ कटुता भी आ गयी थी। साल-दो साल यह चला लेकिन फिर सब कुछ सामान्य हो गया। जहाँ आधार मजबूत हो वहाँ अधिक क्षति नहीं होती।
प्रमोद जोशी का आफिस पहले हंस भवन हुआ करता था। उसके बाद एक बड़ी सरकारी योजना के अंतर्गत उसका कार्यालय दूर नेहरू स्टेडियम के पास सी.जी.ओ. काम्प्लेक्स में चला गया। यही हम लोगों और प्रमोद जोशी के बीच में एक बाधा बन गया था। काफी हाउस उजड़ चुका था। सबके बाल बच्चे हो चुके थे। धंधे या नौकरियाँ जमा चुके हैं। सुबह दफ्तर और शाम घर वाला माहौल बन गया था। बस फोन बचा था जिस पर बात हो जाती थी। इसी बीच मैं पाँच साल के लिये विदेश चला गया। वापस आया। प्रमोद से कभी कभार मुलाकात हो जाती थी।
पाँच-छः साल पहले प्रमोद जोशी रिटायर हो गया था। मेरे ख्याल से रिटायर होना और अचानक होना किसी भी आदमी के जीवन की एक दुःखद घटना है। रिटायरमेंट के बाद प्रमोद जोशी का घर से निकलना बंद हो गया था। हालाँकि वह मण्डी हाउस यानी दिल्ली के सांस्कृतिक केन्द्र के पास ही रहा करता था लेकिन पता नहीं क्यों उसने आना-जाना लगभग बंद कर दिया था। हो सकता है सेहत भी इसकी एक वजह रही हो। वर्तमान में कुछ न करने के कारण प्रमोद अतीत में चला गया था। पुराने दोस्तों से लगातार सम्पर्क बनाये रखता था, लेकिन अब पुराने दोस्तों की बड़ी चुनौती भरी जिम्मेदारियाँ थीं। कुछ अलग-थलग पड़ गये थे। कुछ के पास इतना वक्त नहीं था कि फोन पर गप्प शप्प मार सकें या उससे मिलने उसके घर जा सकें। अब अपनी-अपनी मजबूरियों की बेड़ियों में जकड़े थे।
प्रमोद पहले भी कुछ लग कर नहीं करता था। रिटायरमेंट के बाद काम का सिलसिला जम नहीं सका। उसने कई बार सोचा अपने दुर्लभ चित्रों की प्रदर्शनी लगाउंगा। अल्मोड़ा पर उपन्यास लिखूँगा। कुछ अंश लिखा भी। लेकिन बात बन नहीं पायी। अकेलेपन में घिरता चला गया। एक दिन उसका फोन आया। बताया कि एक बहुत पुराने मित्र से उसने कहा कि वह उसके इलाके में आ रहा है और तीन बजे उसके घर पहुँचेगा। मित्र ने कहा कि यार दोपहर को तो मैं सोता हूँ। इस बात से प्रमोद बड़ा आहत हुआ था। लेकिन उसकी नाराजगी बहुत देर नहीं चलती थी। पूरे जीवन दोस्तों की मदद करने वाले प्रमोद जोशी का दिल बड़ा था। उसमें छोटी बातों के लिये जगह नहीं थी।
उसके गुजर जाने के कोई दो दिन पहले मैंने उसे फोन किया था तो भाभी जी ने फोन उठाया था और बताया था कि आपके दोस्त बीमार हैं और अस्पताल में भरती हैं। ऐसा प्रमोद के साथ साल में एक दो बार हो जाया करता था लेकिन इस बार वह लौटा नहीं। मुख्यधारा का तैराक आगे निकल गया।
























beautiful!
Pramod was my my spose’s relative and a good friend of ours. We had years of interaction and experiences together, as both his and my kids grew up together in Modern School Barakhamba where his wife is a teacher. I used to like him very much as a genuine human being always ready to offer assistance. He was a big help during my son’s wedding at Delhi in March ’10 and despite his failing health, attended all the four functions. Few days later, he left for his heavenly abode so suddenly. May his soul rest in peace. We shall miss you Pramod very much. Alvida.
Vivek
its a lovely article. Azgar Uncle.. you for sure knew papa very well. All the things that you have mentioned in your article.. have been narrated to us by papa so many times. He was not just a father but my dearest friend my philosopher my guide. Papa apki yaad roz aati hai aur bahut aati hai…love you…always…