जल, जंगल, जमीन जैसे बुनियादी सवालों को लेकर संघर्ष करने वाले जन संगठन अब मिलकर उत्तराखंड में बन रहे सभी बड़े बाँधों का विरोध करेंगे। इन संगठनों ने बड़े बाँधों के स्थान पर छोटे बाँध व ‘रन ऑफ रिवर’ के तहत परियोजनायें बनाये जाने की माँग की है।
उत्तराखंड में समय-समय पर जन सरोकारों के लिये संघर्ष करने वाले लोग पिछले दिनों देहरादून में दो दिवसीय ‘मित्र-मिलन गोष्ठी’ में शामिल हुए। जल, जंगल, जमीन से जुड़े सवालों पर गंभीरता से चिंतन मनन करने के बाद एक घोषणा पत्र भी जारी किया गया। प्रसिद्ध सर्वोदयी नेता मानसिंह रावत ने कहा कि आज समाज में पैदा हुई तमाम विकृतियाँ अब गाँवों में भी पहुँच गई हैं। गाँवों को नशा मुक्त बनाने के लिये महिला मंगल दलों को मजबूत करना होगा। ‘बीज-बचाओ आंदोलन’ के विजय जड़धारी ने कहा कि स्थानीय संसाधनों को संरक्षित किये बगैर गाँवों का विकास नहीं हो सकता। सबसे पहले स्थानीय फसलों के बीजों का संरक्षण किया जाना अति आवश्यक है। जलवायु परिवर्तन का असर नई तकनीक से पैदा किये गये बीजों पर जल्दी पड़ता है, जबकि जैविक बीजों पर असर कम होता है। ऐसे में परम्परागत बीजों को बचाया जाना बेहद जरूरी है। पहाड़ों में चकबंदी किये जाने के लिये पिछले तीन दशकों से आंदोलन कर रहे गणेश सिंह ‘गरीब’ का मानना था कि उत्तराखंड का विकास पूर्ण रूप से चकबंदी लागू होने से ही संभव होगा। हिमाचल प्रदेश में चकबंदी के बाद खेती की पैदावार में दस गुना तक वृद्धि हुई है।
प्रसिद्ध पर्यावरणविद् सुन्दरलाल बहुगुणा ने कहा कि पथरीले व सर्पीले रास्तों से तीव्र गति से बहने के कारण ही गंगा अपने आप को शुद्ध करती है। गंगा जल एक जिंदा पानी है, जिसे हमारे भाग्यविधाता बाँध बनाकर मृत करने पर तुले हुए हैं। विमला बहन ने कहा कि कृषि नीति पहाड़ के अनुकूल न होने से आज भी पहाड़ की महिलायें काम के बोझ तले दबी हुई हैं। ‘नदी बचाओ आंदोलन’ के सुरेश भाई ने भागीरथी नदी पर पाला और मनेरी और भैंरोघाटी जल विद्युत परियोजनाओं को रद्द किये जाने का स्वागत किया। उत्तराखंड में बन रही जल विद्युत परियोजनाओं में जन-सुनवाई के नाम पर प्रभावित गाँव के लोगों के साथ हमेशा धोखा किया जाता रहा है।
लक्ष्मी आश्रम की राधा बहन ने कहा कि हिमालय बचेगा, तभी देश की सभ्यता और संस्कृति बचेगी। चिपको नेता धूम सिंह नेगी ने माना कि बर्बाद होती पहाड़ी खेती के लिये जंगली जानवर, रासायनिक खाद, संकरित बीज और सरकारें जिम्मेदार हैं। हैस्को के संस्थापक डॉ. अनिल जोशी ने कहा कि उत्तराखंड के सामाजिक कार्यकर्ता, स्वयंसेवी संगठन और विभिन्न जन संगठनों से जुड़े लोगों में जब तक एकता नहीं होगी तब तक कुछ नहीं होगा। दुर्भाग्य से यहाँ सिर्फ ठेकेदार संगठित हैं। टिहरी के विधायक किशोर उपाध्याय ने स्थानीय सम्पदा पर स्थानीय लोगों को अधिकार और केन्द्र सरकार की नौकरियों में उत्तराखंड के लोगों को आरक्षण दिये जाने की वकालत की।
दो दिवसीय गोष्ठी में इन लोगों के अलावा डॉ. वाचस्पति मैठाणी, सुमित्रा धूलिया, गीता गैरोला, एन.डी. जुयाल, प्रताप शिखर, देवेन्द्र बहुगुणा, विधायक गोविन्द सिंह कुंजवाल, हर्ष डोभाल, सदन मिश्र, योगेश बहुगुणा, चन्द्र सिंह, नागेन्द्र पंत, अनुराग भंडारी, नन्दीधार दयाल, गोविन्द बहुगुणा और राकेश कुमार ने अपने विचार रखे। तय किया गया कि भविष्य में जल, जंगल, जमीन से जुड़े मुद्दों पर एक मंच से लड़ने की कोशिश की जायेगी। निम्नलिखित 13 बिन्दुओं का एक घोषणा पत्र तैयार किया गया, जिसे सभी हिमालयी राज्यों के मुख्यमंत्री, राज्यपालों के साथ-साथ राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री को भी भेजा जायेगा:-
(1) हिमालय में सभी बड़े बांधों के विरोध में एकजुट होकर संघर्ष करना।
(2) छोटे बांध व रन ऑफ द रिवर स्कीम राज्य में बनायी जाये।
(3) जल विद्युत योजनाओं के निर्माण व प्रबंधन में स्थानीय लोगों की भागीदारी।
(4) वन व वनवासियों के हक के लिये 2006 का अधिनियम लागू किया जाये।
(5) बीज अधिनियम में संशोधन किया जाये।
(6) बड़े खनन पर प्रतिबंध लगे।
(7) गाँव के आसपास की 2 किमी जमीन पर गाँव वालों का अधिकार हो।
(8) हिमालयी नदियों के संरक्षण के लिये एक नीति तैयार की जाये।
(9) पर्यावरण संरक्षण को ध्यान में रखकर रोजगार के नये अवसर तलाशे जायें।
(10) विज्ञान का विकेन्द्रीकरण कर लोगों तक पहुँचाया जाये।
(11) जल, जंगल और जमीन का अधिकार गाँव को मिले।
(12) खाद्य सुरक्षा बिल में मिले पोषण के अनाजों को शामिल किया जाये।
(13) सभी मुद्दों व आंदोलन पर बातचीत के लिये एक साझा मंच बने।

























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