सीमान्त के अंतिम गाँव की स्त्रियाँ इस साल तिब्बत की सरहद पर स्थित पार्वती कुंड के पास अपनी देवी के मंदिर की कुछ मरम्मत तथा पूजा कर लौट आईं। 1962 के भारत-चीन युद्ध के समय से इस मंदिर में जाना संभव नहीं हो पा रहा था, क्योंकि यह दोनों देशों के बीच विवादित क्षेत्र ‘बड़ा होती’ के उत्तरी छोर पर पड़ता है, जहाँ तिब्बती याक चरवाहे प्रति वर्ष तथा चीन के सिपाही साल में कभी गश्त लगाने आ जाते हैं। इन कारणों से इस मंदिर में जाना संभव नहीं हो पाता था। लगभग 48 वर्ष के बाद मलारी, गमसाली तथा नीती की महिलाएँ साहस कर इस वर्ष वहाँ हो आयीं।
मंदिर विवादित क्षेत्र के ठीक उत्तर में, होती गाड़ (नाला) के पास पडता है। वहाँ हर साल घुड़सवार चीनी सैनिक गश्त लगाने पहुँच जाते हैं। उसके ठीक ऊपर तिब्बत जाने का धूरा (पास) पड़ता है और उससे कुछ आगे तिब्बत का दापा गाँव है, जहाँ तक चीन ने एक अच्छी मोटर सड़क बनाई है। इस विवादित क्षेत्र पर भारत ने अपना दावा नहीं छोड़ा है। यह लगभग बीस वर्ग किमी. का वृक्षहीन घास का ढलान है, जिसमें वर्षा काल में बहुत अच्छी तथा पौष्टिक घास उगती है जिससे जाड़ों में कमज़ोर हुए पशु कुछ ही दिन में मोटे तथा स्वस्थ हो जाते हैं। यहाँ वर्षों से तिब्बत के याक (चँवर गाय) मालिक तथा भारतीय सीमान्त गाँवों के भेड़चारक वर्षा होते ही पहुँच जाते हैं और दो-तीन महीने वहीं पर अपने पशु चरा कर अपने गाँव वापस आते हैं। यह सिलसिला अभी भी जारी है। भारतीय पशुचारकों को वहाँ अपने भेड़ ले जाने के लिए उप जिलाधिकारी, जोशीमठ से फोटो लगा पारपत्र लेना पड़ता है। उस विवादित क्षेत्र में भारत-तिब्बत सीमांत पुलिस तैनात रहती है और उसकी एक चौकी में कुछ भारतीय फौज के कुछ सिपाही भी रहते हैं, जो इस सरहदी क्षेत्र की रक्षा करते हैं।
बहुत समय से तिब्बत के निवासी भी यहाँ अपने याक चराने लगातार आते थे। इसलिए चीन ने इसे अपने तिब्बती क्षेत्र का भाग घोषित कर दिया। दोनों देशों के बीच चल रही सीमांत वार्ता में यह तय होना है कि बड़ा होती किस देश का भाग है। वार्ता में चीन ने भारत से अपने सरहदी भागों के नक्शे माँगे थे। भारत ने इस मध्य क्षेत्र के बड़ा होती का अपना नक्शा चीन को दे दिया है। कहा जाता है कि उत्तर पश्चिम तथा उत्तर पूर्व विवादित क्षेत्रों के नक्शे भारत ने अभी चीन को नहीं दिए हैं। सब विवादित सरहदी क्षेत्रों में बड़ा होती सबसे छोटा है। 1962 में भारत-चीन की सरहदी लड़ाई के समय चीन की फौज यहाँ आई अवश्य थी, लेकिन उसके तथा भारतीय फौज के बीच गोली नहीं चली और यह तय हुआ कि यह विवाद वार्ता के द्वारा हल किया जाएगा।
तबसे भारत-तिब्बत सीमा पुलिस वहाँ के एक निचले पहाड, रिमखिम पर तैनात की गई। उसके ऊपर वाले पहाड़ पर इस सीमा पुलिस ने अपनी एक चौकी स्थापित की है, जहाँ उसके सिपाही दिन में देखरेख के लिए जाते हैं और रात को अपनी छावनी में सोने वापस आ जाते हैं। ऊपर एक विस्तृत घास का ढलान उत्तर की ओर फैला है, जिसमें लगभग तीन किमी. आगे ‘होती गाड़’ पड़ता है। उसके पास एक प्राचीन मंदिर है, जहाँ 1962 की लड़ाई के समय से पूजा बंद हो गई थी।
उस नाले तक चीनी फौजी गश्त लगाने प्रति वर्ष आते हैं। भारत-तिब्बत सीमा पुलिस के कुछ सदस्य तब एक बडे़ कपडे़ पर चीनी भाषा में लिखी चेतावनी वहाँ ले जाते हैं, जिसमें कहा गया है कि यह भारत की भूमि है और चीनियों को वहाँ से वापस चला जाना चाहिए। कुछ समय बाद चीनी सैनिक वापस चले जाते हैं। वे होती नाले से आगे विवादित क्षेत्र में नहीं बढ़ते। वहीं एक छोटी सी झील है, जिसे हम लोग पार्वती कुंड कहते हैं। उसी के किनारे सरहदी गाँवों का देवी-मंदिर है, जहाँ 1962 से पूर्व तक गर्मियों के समय साल में एक बार पूजा होती थी। अब 48 साल बाद इस वर्ष फिर हुई।
यद्यपि दोनों देश इस बड़े घास के मैदान पर अपना हक जताते हैं, किन्तु यह अभी तक शान्ति का क्षेत्र रहा है। कभी-कभी तिब्बती याक चरवाहे भारतीय भेड़ चालकों के सामने छाती ठोक ऊँची आवाज में अपनी भाषा में कुछ कहते हैं, जिसका अर्थ भारतीय लगाते हैं कि वह भूमि तिब्बत की है और भारतीय चरवाहों को वहाँ से वापस चले जाना चाहिए। लेकिन उस पर दोनों में कभी कोई झगड़ा या हाथापाई नहीं हुई। तिब्बती अपनी बात कह फिर अपने जानवर चराने लगते हैं। यहाँ दोनों क्षेत्रों के चरवाहे अपने पशुओं के साथ महीनों बिना कहे-सुने पड़े रहते हैं और जाड़ा पड़ने पर अपने-अपने स्थानों को वापस चले जाते हैं। हर साल यह होता रहता है।
इस क्षेत्र से होकर जाने वाले मार्ग से कैलाश-मानसरोवर भारत से बहुत निकट पड़ता है। अभी जो पैदल रास्ता कैलाश जाने को प्रयोग होता है, वह बगल के पिथौरागढ़ जनपद के लीपूलेख पास से होकर जाता है। भारतीय कैलाश यात्री इसी से जाते हैं, जो बहुत ही कठिन तथा लंबा है। इससे तिब्बत की सरहद, तकलाकोट तक पहुँचने में 100 किलोमीटर से अधिक पैदल चलना पड़ता है और इसमें उतार-चढ़ाव बहुत हैं। एक स्थान, लखनपुर के पास तो लगभग 4,400 सीढ़ियाँ उतरनी-चढ़नी पड़ती हैं। इसके मुकाबिले चमोली जनपद से जाता, बड़ा होती के पास का ग्यालडुंग मार्ग से सरहद तक केवल लगभग 25 किलोमीटर पैदल चलना पड़ता है। सीमा सड़क संगठन इस क्षेत्र में मोटर मार्ग बना रहा है, जो सरहदी मलारी गाँव से लगभग दस किलोमीटर आगे तक बन गया है, जहाँ से तिब्बत सीमा केवल 25 किलोमीटर से कुछ अधिक रह जाती है। सीमा सड़क संगठन इस सड़क को बड़ा होती विवादित क्षेत्र तक बनाएगा।
यहाँ से 1962 की लड़ाई से पूर्व, नीती, गमसाली तथा मलारी गाँवों से तिब्बत के साथ बहुत व्यापार होता था। तिब्बत से भारतीय पहाड़ी क्षेत्र के लिए नमक तथा ऊन आता था तथा भारतीय व्यापारी गुड़, चीनी, तंबाकू, कपडा तथा दैनिक प्रयोग की वस्तुओं को लेकर तिब्बत की मंडियों में बेचने जाते थे। इस व्यापार के कारण इस सरहद के गाँव खूब समृद्ध थे। प्रत्येक वर्ष आरंभ में सामान बड़ी सफेद बकरियों पर लाद कर ले जाया जाता था। इन गाँवों में कुछ लोग थे, जिनके पास 15,000 से अधिक बकरियाँ होती थीं। व्यापार बंद होने पर बकरियों की आवश्यकता नहीं रही और उनके मालिकों ने उन्हें कसाइयों को बेच दिया। इस क्षेत्र की खुशहाली समाप्त हो गई। यहाँ की जनता लगातार माँग कर रही है कि तिब्बत व्यापार यहाँ से पुनः आरंभ किया जाये, लेकिन जब तक इस सरहद पर दोनों देशों में कुछ समझौता नहीं हो जाता, यह शायद संभव नहीं हो पाएगा। यहाँ के लोगों का कहना है कि जैसे भारत-तिब्बत व्यापार नाथू ला तथा लीपूलेख पास से फिर शुरू किया गया, वैसे ही यह नीती घाटी और बड़ा होती से भी आरंभ किया जाये। शायद यह बात चीन सरकार तक भी पहुँचाई गई थी और चीन का तब कहना था कि यदि यह क्षेत्र व्यापार के लिए फिर खोला जाता है तो चीन चाहेगा कि उसी प्रकार सिक्किम का जलेप पास भी दोनों के बीच आदान-प्रदान के लिए खोल दिया जाये, जिस पर शायद भारत सहमत नहीं हुआ।