अभी उस दिन एक परिचित अध्यापिका मुझसे अपना दुख बाँट रही थीं कि ‘‘आज हमारे स्कूल में एक लड़की के पास प्रेम पत्र पाया गया, जिसके लिए उसे खुली असेम्बली में डांट पिलाई गई।’’ मुझे बड़ा बुरा लगा ….. प्रेम पत्र इतनी अस्वाभाविक और अप्राकृतिक चीज तो नहीं कि जिसके लिए इतनी जिल्लत उठानी पड़े !
जी, हरगिज नहीं। बल्कि नितान्त प्राकृतिक और स्वाभाविक चीज है। और मैडम, बड़ी खुशी की बात है कि आपको बुरा लगा। ऐसी बातों पर बुरा लगना एक अच्छा लक्षण है। मतलब कि आपके भीतर दया- माया- करुणा जैसी चीजें मौजूद हैं। आपका दृष्टिकोण बड़ा ही मानवतावादी, सन्तुलित और वैज्ञानिक है। आप मानवीय गरिमा का सम्मान करना जानती हैं। आपके पास ऊँचे पाये का सौन्दर्यबोध है और आपके दिमाग में कोई कुंठा नहीं है। मगर अफसोस कि ऐसे लोग गिद्धों की तरह कम ही मिलते हैं। लेकिन आप इस मामले में खुद को अकेली जानकर डिप्रेस्ड न हों।
ट्यूशन पढ़ाते समय वह लड़कियों को अपने करीब बिठाता है…… लड़कों को दूर। गलती करने पर लड़कों को जूता फेंक कर मारता है, लड़की को बाँह में चिंकोटी काटने के बहाने मर्मस्थान के स्पर्श का सुख लेता है। इंपोर्टेन्ट बताने के लिए वह लड़की को अकेले बुलाता है, लड़कों को सामूहिक रूप से। लड़कियों को वह पाँचेक मिनट पहले छोड़ देता है ताकि लड़के उन्हें रास्ते में छेड़ें नहीं। लेकिन उस गधे को पता नहीं होता कि लड़कियाँ कुछ दूर जाकर बिजली के खम्भे के नीचे गप्पें हाँकने लगती हैं। जब लड़के छूट कर आते हैं तभी उन्हें घर जाने की याद आती है, दुपट्टा दुरुस्त करने की होश भी तभी आती है…..
व्यक्तिगत रूप से मुझे यह जानकर प्रसन्नता हुई कि पत्र लेखन की विद्या एकदम खत्म नहीं हुई है। छिटपुट पत्र लेखन हो रहा है। वर्ना पत्र या चिट्ठी शब्द सुने अर्सा बीत गया था। हालाँकि आज के समय में प्रेम-पत्र लिखना कुछ वैसा ही है जैसे तेज रफ्तार की आरामदायक मोटर को छोड़कर कोई अपनी खुशी से बैलगाड़ी में सफर करना चाहे। आउटडेटेड तरीकों से प्रेम प्रदर्शित करोगे तो सार्वजनिक तौर पर पिटोगे ही।
प्रेम से घृणा करने वाले तत्व समाज में सदा से ही रहे हैं। अध्यापक इसका एक मुख्य घटक है। उससे उम्मीद की जाती है कि वह हर तरह से पूर्ण है। उसमें कोई भी कमी, खास तौर पर मानवीय कमजोरी तो हो ही नहीं सकती। और दुर्भाग्यवश अध्यापक ने इसे मान भी लिया। उसने पढ़ाने के अलावा कई और जिम्मेदारियाँ ओढ़ ली हैं या हमने उसे सौंप दी हैं …… कि रे मास्टर, तू बच्चे को पढ़ना-लिखना सिखा, उसे अच्छे संस्कार दे, सच्चरित्र बना, ये और वो…… मास्टर बेचारा खुद भीतर से सच्चरित्र नहीं, बच्चों को क्या बनाएगा। उसने अपने गुरु जी से ’भर्व’ पढ़ रक्खा है, अब वह दूसरों को वर्ब कैसे पढ़ाए। शब्दकोश देखने में उसे शरम आती है. …. अपमान महसूस होता है। वह प्राइवेट ट्यूशन से अच्छा पैसा पीट लेता है। जो बच्चा उससे ट्यूशन न पढ़े उसे फेल कर देता है या उसकी डिवीजन बिगाड़ देता है। ट्यूशन पढ़ाते समय वह लड़कियों को अपने करीब बिठाता है…… लड़कों को दूर। गलती करने पर लड़कों को जूता फेंक कर मारता है, लड़की को बाँह में चिंकोटी काटने के बहाने मर्मस्थान के स्पर्श का सुख लेता है। इंपोर्टेन्ट बताने के लिए वह लड़की को अकेले बुलाता है, लड़कों को सामूहिक रूप से। लड़कियों को वह पाँचेक मिनट पहले छोड़ देता है ताकि लड़के उन्हें रास्ते में छेड़ें नहीं। लेकिन उस गधे को पता नहीं होता कि लड़कियाँ कुछ दूर जाकर बिजली के खम्भे के नीचे गप्पें हाँकने लगती हैं। जब लड़के छूट कर आते हैं तभी उन्हें घर जाने की याद आती है, दुपट्टा दुरुस्त करने की होश भी तभी आती है…..
ऐसे में अध्यापक किसी का प्रेम करना कैसे बर्दाश्त कर सकता है। वह बच्चों को चरित्रवान और संस्कारी बनाते-बनाते अनजाने ही उन्हें कुसंस्कारी बना डालता है। बच्चे के व्यक्तित्व में कई तरह के विरोधाभास और कुंठाएँ भर देता है। अधिकांश मामलों में छात्र-अध्यापकों के सम्बन्ध कुत्ते-बिल्ली के से होते हैं। बिल्ली कुत्ते को देख ले तो छिप जाती है, कुत्ते बिल्ली को देखे तो काट खाने को दौड़े। कई बार कब्र में पाँव लटकाए बुजुर्गों को देखता हूँ कि जवान लड़कियों को आशीर्वाद देता हुआ उनका हाथ काफी नीचे तक चला आता है और ऐसी-ऐसी जगहों पर आशीर्वाद दे डालता है कि तौबा ! और यही लोग धर्म, सच्चरित्रता, परम्परा, नैतिकता वगैरा का डंडा लिए लिए बरामदे में बैठे दूसरों के चरित्र और ईमान की अवैतनिक रखवाली करते हैं…… अपना परलोक सुधारते हैं।
एक बार एक साहब मुझसे पूछ रहे थे कि सरकार स्कूलों में यौन शिक्षा देने की बात कर रही है। जरा बताओ तो कि थ्योरी तो ठीक है, हो जाएगी… …. प्रेक्टिकल का क्या होगा ? मुझे झट से याद आया कि एक तो यह सज्जन अधेड़ उम्र के विदुर हैं और उनकी राजनैतिक विचारधारा से भी मैं वाकिफ था। हर वक्त डंडा लिए दूसरों के चरित्र की चौकीदारी करने वालों की जमात से जुड़े थे वे सज्जन। मैं स्वभावतः हर समय एक तरह से उचक्केपन के मूड में रहता हूँ। मैंने कहा- साहब यकीन मानिए, प्रेक्टिकल का मुझे कोई अनुभव नहीं है…… बल्कि मैंने इस मुद्दे पर जाकर यमराज का गिरेबान पकड़ना है। हाँ, थ्योरी मैंने खूब पढ़ रखी है। पोर्नोग्राफी से लेकर स्तरीय किताबें तक। आप तजुर्बेदार आदमी हैं। प्रेक्टिकल की मुद्राएँ आप तय कर दें, थ्योरी मैं ऐसी लिख दूँगा कि डॉ. प्रकाश कोठारी को भी काफी कुछ सीखने को मिल सकता है।
इस बात को समझाने के लिए ज्यादा मगजमारी करने की जरूरत नहीं कि उनके मुँह से कौन बोल रहा था…. ….कौन-सी शिक्षा, संस्कार, भावनाएँ और कुंठाएँ उनसे ऐसा सवाल पुछवा रही थीं . ….. कुतर्क करने को विवश कर रही थीं। ऐसे दोहरे मानदंडों वाले लोगों के बीच और ऐसे दुराग्रही माहौल में कोई कैसे प्रेम कर सकता है ! जहाँ पंचायतें प्रेमियों को फाँसी पर लटका दें, जहाँ ऐसे तत्व मौजूद हों कि वैलेन्टाइन-डे पर भाई-बहन को एक साथ देख लें तो वहीं सड़क पर उनकी आपस में शादी करवा दें। जो ऐसे दौर में प्रेम करे जरा उसकी हिम्मत तो देखिए- ’हौसला देख मेरा कि बर्फ का बनवा के मकाँ, फिर उसे धूप की बस्ती में उठा लाया हूं।’
इस सबका यह मतलब नहीं कि बच्चे स्कूल-कालेज जाकर पढ़ाई-लिखाई न करके प्यार-मुहब्बत किया करें और अध्यापक उन्हें देखकर अनदेखा कर स्टाफ रूम में बैठ कर गप्पें लड़ाएँ। जी नहीं, कोई पागल भी ऐसी बात नहीं कहेगा। कहने का मतलब सिर्फ इतना सा है कि इतनी छोटी बात पर ऐसी अमानवीय सजा देना न सिर्फ सजा देने वालों की विकृत मानसिकता को दर्शाता है……. बल्कि यह घोर अन्याय है और घातक भी। प्रेम पत्र ही है यार कोई तमंचा तो नहीं कि यूँ किसी को जलील किया जाये।
इस घटना का जिक्र जब मैंने एक मित्र से किया तो उन्होंने पहला सवाल यही पूछा कि क्या वह लड़की जिंदा है ? बड़ा अहम सवाल है। भरी महफिल में बेइज्जत करने से पहले इस नजरिये से
क्यों नहीं सोचा गया ! ऐसे मूढ़ मगज अध्यापकों से हम किस प्रकार की शिक्षा की उम्मीद करें जिन्हें खुद अभी शिक्षित होने की आवश्यकता है ?
भाषा और शब्दों की हमारी समझ बेहद बौनी और सीमित है। हम शब्दों का सही प्रयोग करना नहीं जानते। मसलन हम किसी चोर-उचक्के, खूनी, डकैत, घूसखोर और भ्रष्टाचारी को भूल कर भी दुश्चरित्र नहीं कहते। इसका प्रयोग हम सिर्फ सैक्स के संदर्भ में ही करते हैं कि फलाँ तो फलाँ के साथ…. … बड़ा ही चरित्रहीन आदमी है। मंत्रीजी जब तक किसी सैक्स स्कैंडल में नहीं फँसते उनका चरित्र बड़ा ही पाक-साफ रहता है। करोड़ों रुपया कमीशन के रूप में खा जाना हमारी नजर में चरित्रहीनता के दायरे में नहीं आता। कोई किसी से हँस-बोल ले तो झट से चरित्रहीन हो जाता है…… महिलाएँ खास तौर पर।
भाषा और शब्दों की हमारी समझ बेहद बौनी और सीमित है। हम शब्दों का सही प्रयोग करना नहीं जानते। मसलन हम किसी चोर-उचक्के, खूनी, डकैत, घूसखोर और भ्रष्टाचारी को भूल कर भी दुश्चरित्र नहीं कहते। इसका प्रयोग हम सिर्फ सैक्स के संदर्भ में ही करते हैं कि फलाँ तो फलाँ के साथ…. … बड़ा ही चरित्रहीन आदमी है। मंत्रीजी जब तक किसी सैक्स स्कैंडल में नहीं फँसते उनका चरित्र बड़ा ही पाक-साफ रहता है। करोड़ों रुपया कमीशन के रूप में खा जाना हमारी नजर में चरित्रहीनता के दायरे में नहीं आता। कोई किसी से हँस-बोल ले तो झट से चरित्रहीन हो जाता है…… महिलाएँ खास तौर पर।
लड़की के पास प्रेम पत्र पाया गया। इस मामूली/मासूम सी खता के लिए आपने खुली असेंबली में उसे बेइज्जत किया। ऐसा करके आपने शायद सोचा होगा कि लड़की को भटकने से बचा लिया, उसे दुश्चरित्र होने से रोक लिया। अपने अध्यापकीय जीवन का एक बहुत बड़ा कारनामा कर दिखाया। इसके लिए आपको कोई पुरस्कार या प्रशस्ति पत्र मिलना चाहिए। मेरी विनम्र राय है कि ऐसे दुश्चरित्रों को चौराहे पर जूता मिलना चाहिए।
एक छोटी-सी बात के लिए आपने एक लड़की की जिन्दगी लगभग तबाह कर डाली। उसकी ’दुश्चरित्रता’ के आपने सैकड़ों गवाह पैदा कर दिए। पूरे शहर में उसे रुसवा कर डाला। हो सकता है माँ-बाप उसे स्कूल छुड़वा कर घर बिठा लें और किसी लूले-लंगड़े या अधेड़ विदुर के साथ औने-पौने हाँक दें। नाक तो आपने उनकी काट ही ली है। चरित्र सुधार के नाम पर चरित्रहनन का जो वीभत्स सार्वजनिक अनुष्ठान आपने किया, वह बंद कमरे में ज्यादा प्रभावशाली तरीके से हो सकता था। प्यार से अभिभावक की तरह लड़की को समझाया जा सकता था। बात का सकारात्मक असर होता। लेकिन आप अभिभावकों सा व्यवहार कैसे कर सकते हैं। आप तो रौब-दाब वाले मास्टर होना पसंद करते हैं कि आपकी डाँट सुनकर बच्चा नेकर गीली कर ले। आपकी दमित इच्छाएँ और कुंठाएँ ऐसे ही सार्वजनिक भद्दे प्रदर्शनों से तृप्त होती हैं। आप में से ज्यादातर की जिंदगी भयंकर वर्जनाओं के बीच बीती है। इसी के चलते आपके व्यक्तित्व में ऐसी उलझनें पैदा हो गई हैं कि बकौल मुहावरा- ’हमारा मरने को तो जी बहुत चाहता है लेकिन कफन की कीमत सुनकर घबरा जाते हैं।’ आपने मास्टरी का पेशा शिक्षा और बच्चों का भला करने के लिए नहीं चुना। आपको एक अदद नौकरी चाहिए थी। पुलिस में भर्ती न हो सके, चलो मास्टरी ही सही। इतना ही सम्मान और तनख्वाह अगर कसाई को मिलती तो आप खुशी से कसाई बन जाते, शान से कीमा कूटते।
वह लड़की शायद ही उबर पाए इस हादसे से कभी। उसके व्यवहार में सहजता शायद ही कभी आ पायेगी। एक अनजान-सा डर जिन्दगी भर उसे सालता रहेगा जो आपने उसकी रगों में उतार दिया अपनी बीमार जहनियत के चलते। जिन्दगी भर वह दबी-दबी सी रहेगी। हर लफंगा उसे सहज सुलभ मानकर बेहद नंगे और भद्दे शब्दों में छेड़ेगा। और जो कहीं दुर्भाग्यवश वह पलट कर वार करने के मूड में आ गई तो उसकी जिन्दगी क्या रुख इख्तियार करेगी, उसे शब्दों में कह कर मैं अपनी जबान का जायका खराब नहीं करना चाहता।

























बिल्कुल सही लिखा है आपने। उस लडकी को इसके चलते जो-जो जिल्लतें झेलनी पडेंगी, उनकी तो कल्पना भी नहीं की होगी आपने। इस उम्र का प्रेम एक स्वाभाविक क्रिया है, जिसके बारे में बच्चे को प्यार से ही समझाया जा सकता है।
shambhu ji you wrote well but this is one side the good character also there i am from uttrakhand n my education up to 12 standard in uttrakhand n i saw all these things happened a good articles thanks
Ek ache lekh ke liye bahut bahut shukriya. Saath hi afsoos is baat ki hai ki hamara samaj kab in baarikyun ko samjhega. Sawal one side nahi hai. Jab jab iss tarah ki “ghatnayen” ghatti hain kuch log samaj ke rakchak ban jate hain lekin moqa milte hi…. Saare teacher aise hain aisa nahi hai lekin ek bhi teacher aisa kare dukh to hota hai.
Dhanyewad Shambhu ji
Faiyaz