रिम्पी बिष्ट
कुमाउनी में एक कहावत है कि ‘जब आग लाग, तब पाणि चाय’, अर्थात् जब आग लगती है तब पानी ढूंढा जाता हे। ऐसी स्थिति में समस्या और जटिल हो जाती है। ऐसा ही मामला लालकुआँ में भी दखने को मिला। रेल विभाग को विस्तारीकरण की याद तब नहीं आयी, जब अतिक्रमण की शुरूआत हो रही थी। अगर अतिक्रमण शुरू होते ही बीमारी का इलाज कर दिया जाता तो यह लाइलाज नहीं बनती। अब जब अतिक्रमण को तोड़ने के लिए रेलवे विभाग व प्रशासन द्वारा जेसीबी से कहर बरपा किया गया और अनेक कच्चे व पक्के निर्माण ध्वस्त किये गये और अब रेलवे की जद में आने वाली दुकानों को भी तोड़ने के लिए कमर कसी जा रही है तो लोगों में विरोध पनपना स्वाभाविक है। ऐसे में अपने नम्बर बढ़वाने के लिए सियासतदाँ भी सक्रिय हो गये हैं। सवाल यह उठता है कि इस घटना के लिए कौन जिम्मेदार हैं ? इसकी जाँच होनी चाहिए।
उल्लेखनीय है कि विगत दिनों रेलवे द्वारा जिला प्रशासन की मदद से विस्तारीकरण के लिए बंगाली कालोनी व नगीना कालोनी में अतिक्रमण हटाने का अभियान चलाया गया। लगभग 300 कच्चे व पक्के निर्माण ध्वस्त किये गये तथा अनेक लोग बेघर हुए। रेल विभाग द्वारा प्रशासन की सहायता से भले ही लोगों के आशियाने उजाड़ दिये लेकिन यक्ष प्रश्न यह है कि आखिर ऐसी घटनाओं की पुनरावृत्ति क्यों होती है। प्रभावितों का कहना है कि उनके पास राशन-कार्ड, फोटो पहचान पत्र व पेन कार्ड बने हैं और वे 30 वर्ष से भी अधिक समय से यहाँ रह रहे हैं। ऐसे में उनका आशियाने को तोड़ना कैसे उचित था ? उनका तर्क जायज है और रेल विभाग व आला अधिकारी अपनी जिम्मेदारियों से मुँह नहीं मोड़ सकते, क्योंकि अतिक्रमण एक दिन में तो हुआ नहीं। अगर रेलवे की भूमि पर अतिक्रमण हुआ है तो इसके लिए वह स्वयं जिम्मेदार है। जब अतिक्रमणकारी रेलवे की भूमि पर बस रहे थे, तो उस समय विभाग क्यों नहीं चेता ? अगर उसी समय दृढ़ रुख अपनाया जाता तो आज ये स्थिति नहीं आती। इस दौरान अतिक्रमणकारियों ने अपने आवास बनाने में अपनी समस्त जमा पूँजी लगा दी। अतिक्रमण जिसके कार्यकाल में हुआ, उस अधिकारी की जिम्मेदारी भी तय होनी चाहिए। राजनैतिक दल ऐसी घटनाओं को राजनीति की दृष्टि से देखते हैं। जबकि अतिक्रमण उनके संज्ञान में रहा होगा। संभव है कि उन्होंने ही अतिक्रमण को प्रोत्साहित भी किया हो।
इधर रेलवे द्वारा बाजार क्षेत्र की दुकानों को हटाने की सुगबुगाहट से यहाँ का व्यापारी वर्ग भी सड़कों पर उतरने को तैयार है। वर्षो से उन्होंने अपनी मेहनत व जमा पूँजी से दुकानें बनाई हैं और ये उनकी आजीविका की स्रोत है। ऐसी स्थिति में यहाँ जेसीबी दौड़ाने से स्थिति विस्फोटक हो सकती है। क्षेत्रीय विधायक राज्य में कैबिनेट मंत्री हैं। उनके लिए समस्या और ज्यादा विकट है। एक तरफ मॉडल लालकुआ बनाने का संकल्प तो दूसरी तरफ सरकार के प्रति जवाबदेही। जनता के वोट लेकर जीतना तथा फिर जनता के आशियाने उजाड़ने में शामिल होना।
झुलसाती गर्मी में विभाग द्वारा अतिक्रमण तो हटा दिया गया, लेकिन अब ये बेघर लोग कहाँ बसेंगे इस पर कोई स्पष्ट बोलने को तैयार नहीं है। मकान बनाने के लिए इनको आश्वासन तो दिया जा रहा है लेकिन जमीन कहाँ से आयेगी, इस पर कोई उच्चाधिकारी लिखित देने को तैयार नही है।