(नैनीताल समाचार के लिए एक कवि की रिपोर्ट)
पानीदार लगभग कुछ नहीं है
न आंखें 
न चेहरे
न हथियारों की धार
न किरदार
मेरे आसपास पानीदार लगभग कुछ नहीं है
एक ऐसे समय में कह सकते हैं
सूखा है
अकाल है
पपड़ाई मिट्टी के ढूहों से
बिलखती निकलती हैं चींटियाँ
दिमाग में रेंगती
अचानक पानी की उम्मीद में उग आए
कोमल पंखों को हिलातीं
थोड़ा उड़तीं इधर-उधर
फिर दिमाग के कोटर में ही
गिर जातीं
एक ऐसे समय में कह सकते हैं
सूखा है
अकाल है
पक्षियों की महान उड़ानों के झड़े हुए पंख
धूल में भटकते बच्चों को मिल जाते हैं
खेलने के काम आते हैं
पक्षी जो उड़ गए पानी की तलाश में
साधारण थे
महान थीं उड़ानें
आकाश के सूनेपन को सरापती
अब न जाने कहाँ होंगी
एक ऐसे समय में कह सकते हैं
सूखा है
अकाल है
पेड़ों पर बंधे हुए फलों में सूख गया रस
अब लगे रहें बेशर्मी से कि झड़ जाएं उनकी कशमकश
पहाड़ी नदियों के तल में रेत ही रेत
गो हर देश और काल में अपने उद्गम से लगभग पहाड़ी ही होती हैं वे
लाश की तरह नोचते उन्हें माफिया
पानी न होने का सुख सम्भालते
इधर लोग पुकारते व्याकुल कराहते
बोलते तो मुँह से झरती रेत
एक ऐसे समय में कह सकते हैं
सूखा है
अकाल है
जंगलों से भाप की जगह निकलता धुँआ 
धूप के साथ आग
चाँदनी के साथ राख
हर तरफ झुलसे हुए छोटे-छोटे जीवों और
कीड़ों के अदृश्य शव
इधर पिटती हुई झील के किनारे
समृद्ध पर्यटकों का कलरव
हाहाकार पहाड़ों के दिल का अनसुना ही रह जाता है
बेवक्त की इस अजब-सी बादे-बहार के बीच
एक ऐसे समय में कह सकते हैं
सूखा है
अकाल है
कहाँ है बारिश
बारिश कहाँ है
पुकारते हैं पहाड़
कराहता है भाबर
पानीदार कुछ भी नहीं अब तो बताओ
बीते जा रहे चौमासे के महीने रीते के रीते
कहाँ है बारिश
बारिश कहाँ है
कैसे न कैसे एक दिन तो वह आएगी
तर-ब-तर हो जाएंगे पहाड़
पानी इतना आएगा
कि सरकार को दैवीय नजर आने लग जाएगी हर आपदा
पर आँखें सूनी रह जाएंगी मेरे जनों की
चेहरे वैसे ही सूखे
बेपानी इठलाते रहेंगे जनप्रतिनिधियों के किरदार
क्या हमेशा कुंद ही बनी रहेगी विचारों के हथियारों की धार
बारिश कहाँ है
कहाँ है बारिश
एक ऐसे समय में कह सकते हैं
सूखा है
अकाल है
जानता हूँ मैं यह बारिश जिसकी बरसों से तलाश है
कैद है दूसरी बारिश के भीतर
इस बारिश के भीतर दुबक गया है
एक बहुत बड़ा संसार
एक बारिश छुप गई है बारिश के भीतर
आपदा के भीतर उर्वरता
सरकार के भीतर जनता
एक ऐसे समय में कह सकते हैं
सूखा है
अकाल है
किसी भी समय में कवि
यदि कवि है तो उम्मीद नहीं छोड़ता
जानता है
अपने हारते हुए दिल से भी मानता है
एक दिन बारिश को बारिश का डर न होगा
इतनी बढ़ जाएगी आपदा
कि दुबक जाने को कोई घर न होगा
आँख मलते जन सड़कों पर होंगे
बारिश होगी
जल होगा
भले ही एक विशाल आज में घुटकर रह गए हों हम
पर सरल बात है यह- कल होगा
एक ऐसे समय में जब कहना पड़ता है
सूखा है
अकाल है
बात का यूँ उम्मीद के मोड़ पर खत्म हो जाना ही अच्छा
यही एक शरण्यम है
बाकी तो सब जीवन फिलहाल हताश धुकधुकियों का एक सिलसिला है
भय है ।
- शिरीष कुमार मौर्य