पहाड़ों पर पानी के दिन हैं
और नींद में चल रही हवा।
छुए जाने के भय से![]()
बच-बच कर इधर-उधर
भाग रहे हैं बादल रोमांचित।
बहुत भागमभाग का समय है
तेजी से नीचे की ओर
दौड़ रही हैं गायें रंभाती
थनों में आंदोलित हो रहा है
अनुराग बछड़ों का।
ऊपर बसेरे की ओर
लौटती चिड़िया देखती है
भयातुर भेड़ों का
उतरना आपाधापी में।
सबको अपनी-अपनी पड़ी है
समय कम है
किसी भी क्षण हो सकती है
बारिश – मूसलाधार
सबको जल्दी है पहुँचने की
अपने ठीहे पर
लो ! इसी आवाजाही में ![]()
कहीं गिर गया है
चश्मा बूढ़े गडरिये का
वह फिर जा रहा है
ऊपर उसे ढूँढने
- कुमार सरोज
साभार: नया ज्ञानोदय
( मैथली कविता का हिन्दी रूपान्तरण स्वयं कवि द्वारा )
kab hoga rel ka sapana//////////