स्मृतिशेष: राजेन्द्र रावत ‘राजू’
यहाँ धारा रोड स्थित भारतीय स्टेट बैंक में प्रवेश करते ही अब नजरें राजू भाई को ढूँढने लगती हैं। मन नहीं मानता कि राजू भाई अब हमारे बीच नहीं रहे।
राजू भाई मुफलिसी में बीते अपने बचपन को कभी भूले नहीं थे, जब पिता जी की बिजनौर में हत्या हो गई थी। राजू भाई कक्षा आठ में थे। इस छोटी उमर में ही उन पर परिवार की जिम्मेदारी आ गई थी। इण्टर करने के बाद इन्हीं परिस्थितियों के कारण उनकी पढ़ाई छूट गई थी और एक बार तो उन्होंने कुलीगिरी करना भी शुरू कर दिया था। मगर उन्होंने अपनी पढ़ाई जारी रखी। पिता की, फिर मँझले भाई और अन्त में माँ की मौत, इन प्रतिकूल परिस्थितियों ने उनके अन्दर जूझने का जज्बा पैदा किया। शायद इस जज्बे के रहते ही उन्होंने जीवन में कभी भी हार नहीं मानी। अपने सामाजिक सरोकारों को उन्होंने जितनी व्यापकता के साथ अंजाम दिया, वह अदभुत् था। समाज के अन्तिम पायदान पर खड़े और हक से महरूम हुए व्यक्ति की क्या मदद हो सकती है, इसका जवाब मुझे राजू भाई के कार्यों एवं संघर्षों से प्रायः मिलता था। स्वभाव में सरसता और बातों में इस कदर आत्मीयता कि सम्पर्क में आने वाला कोई भी व्यक्ति दिल खोलकर रख दे, प्रतिकूल परिस्थितियों में अनुकूल राह दिखाने का कौशल, संघर्ष हेतु सहजता से अभिप्रेरित करने का माद्दा, मेहनतकशों की मदद के लिए हरदम तत्पर, जटिल समस्याओं का सरल निदान और भ्रष्ट व्यवस्था से टकराने के फौलादी इरादे। विकट परिस्थितियों में भी आम जन के साथ खड़े रहने की उनकी दिलेरी ने पूरे उत्तराखण्ड में उन्हें एक पहचान दी थी।
उमेश डोभाल, राजेन्द्र रावत और ओंकार बहुगुणा जिगरी दोस्त थे और उमेश की हत्या के बाद राजू भाई और ओंकार ‘मामू’ की माफिया के खिलाफ सक्रियता को देखते हुए वे सीधे उनके निशाने पर थे। इससे पहले भी एक बार दो पक्षों में मारपीट के बाद गोली चलाये जाने की घटना का विरोध करने पर राजू भाई और ओंकार मामू को शराब माफिया के क्रोध का शिकार होना पड़ा था। राजू भाई बैंक के गार्ड के साथ कैश लेने कोटद्वार गये थे। कोटद्वार में मनमोहन और उसके साथियों ने उनका अपहरण कर दिया था। उन्हें नजदीकी जंगल में रखा गया था। मारपीट कर उन्हें बुरी तरह घायल कर दिया गया था। बाद में कुछ स्थानीय लोगों के बीच-बचाव और थाने में रिपोर्ट न लिखाये जाने की शर्त पर उन्हें छोड़ा गया। दूसरे दिन ओंकार बहुगुणा राजू भाई को लेकर एक एम्बेसडर कार से वापस लौट रहे थे तो गुमखाल के निकट एक बार फिर बन्दूक की नोंक पर उनकी कार को रोक कर उनके साथ मारपीट की गई। इसमें मामू के सिर पर चोटें आयी और उन्हें इलाज के लिए पौड़ी जिला अस्पताल में भर्ती कराया गया।
राजू भाई धैर्य के साथ संघर्ष करते हुए मुकाबला करने में विश्वास रखते थे। यही कारण है कि जब उमेश डोभाल की हत्या हुई तो शराब माफिया के खिलाफ पहले ही चोट खाये राजू भाई और ओंकार मामू ने यह जानते हुए भी कि माफिया से उनकी जान को खतरा है, उमेश की हत्या का पर्दाफाश करने का संकल्प लिया। तब तक पुलिस लोअर बाजार में हुए बड़थ्वाल हत्याकांड और उमेश की हत्या के मामले में इन्हें ही लपेटने का मन बना चुकी थी। उस समय शराब माफिया से पुलिस को प्रतिमाह भारी रकम अपने अवैध धंधों को जारी रखने के एवज में दी जाती थी। सी.बी.सी.आई.डी. की जाँच में भी ओंकार मामू को फँसाये जाने की योजना थी। राजू भाई और मामू अगर सक्रिय नहीं होते तो उमेश की हत्या की कहानी ही कुछ और होती।
राजू भाई ने पहाड़ की तत्कालीन शराब नीति पर भी सवाल खड़े कर दिये थे। उनका आरोप था कि शराब ठेकों की वर्तमान व्यवस्था पहाड़ में माफिया पैदा कर रही है। यह विचार भी उन्हीं का था कि पहाड़ के भीतर शराब ठेकों को निजी हाथों से छीन कर सहकारी संस्थाओं या निगमों को दिया जाना चाहिए। उन्होंने इसके लिए मुझ जैसे और भी कई पत्रकारों को इस मुद्दे पर लिखते रहने के लिए भी प्रेरित किया था। बाद में पहाड़ की शराब व्यवस्था में बदलाव हुआ और ये ठेके गढ़वाल और कुमाऊँ विकास मंडलों को सौंप दिये गये।
पौड़ी में तमाम ट्रेड यूनियनों और कर्मचारी संगठनों को मिलाकर कर्मचारी व मजदूरों के हितों के लिए एक कर्मचारी समन्वय समिति का गठन करने का श्रेय भी राजू भाई को ही जाता है। उस समय मुख्यालय में प्रांतीय और केन्द्रीय कर्मचारियों के बीच आपसी हित के मुद्दों पर किसी भी तरह का तालमेल नहीं था। तभी मजदूर दिवस पर जुलूस प्रदर्शन का सिलसिला भी राजू भाई की प्रेरणा से शुरू हुआ। राजू भाई कर्मचारी वर्ग या जनांदोलनों में अपने आक्रामक तेवरों तथा वैचारिक सूझबूझ के लिए हमेशा याद किये जायेंगे। आंदोलनों व जनसंघर्षों को एक दिशा देने में उनकी हमेशा एक अहम् भूमिका रही है। उत्तराखण्ड राज्य आंदोलन में 8 अगस्त को आंदोलनकारियों पर लाठीचार्ज के बाद जब उनके समर्थन में जुलूस प्रदर्शन शुरू हुए तो कर्मचारी समन्वय समिति के जुलूस प्रदर्शन का नेतृत्व करते हुए मुझे राजू भाई ही दिखे।
ऐतिहासिक ‘नशा नहीं, रोजगार दो’ आंदोलन के बाद अस्सी के दशक के अन्तिम सालों में जब गढ़वाल के भी कई गाँवों में अवैध शराब के खिलाफ आंदोलन चलाया जा रहा था, तो राजू भाई इस आंदोलन का अखबारों के जरिये समर्थन करने के लिए भी प्रेरित करते थे। पौड़ी में होने वाले ज्यादातर आंदोलन के वे धुरी में होते थे। गढ़वाल मंडल बहुउद्देशीय कर्मचारी यूनियन जब दो साल पहले अपनी माँगों को लेकर आंदोलन चला रही थी तो राजू भाई अपनी अस्वस्थता के बावजूद आंदोलनकारियों को प्रायः वैचारिक ऊर्जा और समर्थन भी देते रहते थे। ‘नौछमी नारैण’ पर जब कांग्रेसियों ने नरेन्द्र सिंह नेगी के पुतले फूँकना शुरू किया तो राजू भाई ने सड़क पर नेगी जी के समर्थन में लड़ाई लड़ी। उन्होंने मुझसे नरू भाई के समर्थन में पोस्टर और पैम्फलेट छपवाये। उनकी पहल पर ही पौड़ी के तमाम रचनाधर्मी लोग नरू भाई के समर्थन में बाहर निकले।
गढ़वाल में आदमखोर बाघ के आतंक पर वे वन नीतियों के खिलाफ मुखर हो गये थे। जल, जंगल और जमीन के साथ ही दलित समाज की समस्याएँ उनकी प्राथमिकताओं में होती थी। ऐतिहासिक डोला-पालकी आंदोलन के 125 साल पूर्ण होने पर पौड़ी में ‘दलित चेतना’ पर व्याख्यानमाला आयोजित करना एवं इस मौके पर एक स्मारिका का सम्पादन राजू भाई का ही काम था।
धारा के विपरीत तैरने का साहस भी उनमें था। गढ़वाल विश्वविद्यालय के तत्कालीन कुलपति डॉ. डी. एस. रावत द्वारा विश्वविद्यालय में कड़ाई के साथ कई सुधारात्मक कदम उठाये तो निहित स्वार्थों ने उनके खिलाफ हड़ताल करा दी। राजू भाई, उमेश और ओंकार ‘मामू’ श्रीनगर जाकर कुलपति से मिले और उनकी बातें सुनकर खुलकर उनके समर्थन में सामने आये थे। इस आशय की खबरें उन्होंने उस समय समाचार पत्रों में प्रकाशित कराई थी। पौड़ी में मुन्सिफ मजिस्ट्रेट के आवास से जब शराब बिक्री पकड़ी गई थी तो उस प्रकरण में भी राजू भाई अप्रत्यक्ष रूप से पूरी तरह सक्रिय थे। ओंकार मामू बताते हैं कि वे (मामू) स्वयं तो शराब पकड़वाने में आगे थे परन्तु वे बैंक में राजू से संवाद बनाये हुए थे और उस रात इस प्रकरण की वजह से राजू भाई को सारी रात बैंक में ही गुजारनी पड़ी थी।
राजू भाई बहुआयामी प्रतिभा के धनी थे। बेशक, वे साहित्य लेखन को अधिक समय नहीं दे पाये, लेकिन उनके लेखन में ऐसी धार व पैनापन था, जो बिरले साहित्यकारों और लेखकों में होता है। वे एक अच्छे पत्रकार, समीक्षक और कलाप्रेमी भी थे। यात्रा संस्मरण लेखन में उनकी महारत थी। यात्राएँ हालाँकि उन्होंने बहुत अधिक नहीं कीं, लेकिन जो भी कीं उनके संस्मरण उन्होंने लिखे हैं। ‘उत्तराखण्ड खबर सार’ में हमने उनके गढ़वाली में लिखे ऐसे ही तीन यात्रा संस्मरण प्रकाशित किये। राजू भाई एक बेहतरीन पाठक भी थे। उन्होंने एक जमाने में, जब लाइब्रेरी नगर के केन्द्रीय स्थान से नगर के एक कोने पर जिला विद्यालय निरीक्षक कार्यालय में चली गई थी, तब वे कई स्तरों पर जोरदार प्रयास कर पाठकों के हित में इसे संस्कृति भवन में वापस लाये। उमेश डोभाल स्मृति समारोह हेतु कई सालों तक स्मारिका प्रकाशित करते समय मुझे उनके बहुत गम्भीर पाठक होने का अहसास हुआ था। वे स्मारिका के लिए खोज-खोज कर सामग्री मुझे दिया करते थे। बर्तोल्ट ब्रेख्त, अलबर्ट पिन्टो और अन्य कई देशी-विदेशी लेखकों की रचनाएँ वे लाकर मुझे स्मारिकाओं में प्रकाशित करने हेतु सौंपते थे। ‘उत्तराखण्ड खबर सार’ के कार्यकारी संपादक बनने के बाद उन्होंने गढ़वाली में भी लिखना शुरू कर दिया था। उनकी गढ़वाली और हिन्दी पुस्तकों व कैसेटों आदि की समीक्षाएँ व लेख आदि खबर सार में छपते रहते थे।
पत्रकारिता में इतनी रुचि और इतनी गहरी समझ मैंने कम ही लोगों में देखी है। एक जमाने में जब ‘पौड़ी टाइम्स’ बन्द हो चुका था, तो उसके सम्पादक श्री सखा सत्यम भण्डारी से राजू रावत और उनके साथियों ने मिलकर सन 1978 में इसका पुनर्प्रकाशन शुरू करवाया था। पौड़ी टाइम्स से वे तीन-चार सालों तक जुड़े रहे। सन् 1981 में ऐतिहासिक गढ़वाल उपचुनाव में सम्पादक के साथ कुछ मतभेद होने पर वे पौड़ी टाइम्स से अलग हट गये। हालाँकि उनका इस अखबार में कोई पद नहीं था, लेकिन इतने वर्षो तक उन्होंने इसके लिए निरन्तर लिखा था। बैंक कर्मचारी होने के बावजूद भी वे सामाजिक सरोकार के मुद्दों पर नैनीताल समाचार और बिजनौर टाइम्स आदि में निरन्तर लिखते रहते थे।
सन् 2004 की शुरूआत में कैंसर का पता चलने के बाद भी उन्होंने अपनी दिनचर्या में अन्तर नहीं आने दिया। कई बार बैंक में उनके पास बैठने पर बोलते थे कि थकान हो रही है। शारीरिक तकलीफ के बावजूद सन् 2005 में गढ़वाली साहित्यकार सुदामा प्रसाद ‘प्रेमी’ की बीमारी का हालचाल जानने में कल्जीखाल से उनके गाँव फल्दा पहुँचे। इस तरह की कर्मठता से मुझे राजू भाई की जीवटता और जिजीविषा के बारे में सोचने के लिए मजबूर होना पड़ता था। उनकी यही जिजीविषा थी कि शरीर थक जाने के बाजूद मन से वे अन्तिम समय तक भी कैंसर से लड़ते रहे। जनसंघर्ष व जनसरोकारों के इस महानायक को मेरी भावभीनी श्रद्धांजलि।