राजेन्द्र रावत ‘राजू’ के देहान्त को 16 दिसम्बर को एक साल पूरा हो गया। उनका भावपूर्ण स्मरण करते हुए उमेश डोभाल ट्रस्ट ने पौड़ी में एक सादे कार्यक्रम का आयोजन किया। इस अवसर पर वीर चन्द्रसिंह गढ़वाली स्मृति व्याख्यान तथा सुप्रसिद्ध चित्रकार धरणीधर चन्दोला स्मृति चित्रकला प्रतियोगिता सम्पन्न हुए। उनकी स्मृति में इस साल से आरम्भ की गई निबन्ध प्रतियोगिता का पुरस्कार वितरण भी हुआ। कार्यक्रम में मौजूद मुख्य अतिथि पद्मभूषण चण्डी प्रसाद भट्ट, लोकगायक नरेन्द्र सिंह नेगी, ट्रस्ट के अध्यक्ष गोविन्द पन्त ‘राजू’, चकबन्दी आन्दोलन के प्रवर्तक गणेशसिंह गरीब, राजू भाई के मित्रों तथा नगर के गणमान्य व्यक्तियों ने उनके चित्र पर पुष्पाजंलि अर्पित की।
कार्यक्रम में बोलते हुए ट्रस्ट के अध्यक्ष गोविन्द पन्त ‘राजू’ ने कहा कि राजू भाई समाज के लिये जिये। समाज, संस्कृति, कला व साहित्य के क्षेत्र में उनकी अभिरुचि थी। आज यदि उमेश डोभाल ट्रस्ट साहित्यकारों व पत्रकारों को सम्मानित करता है तो उसके जरिये हमें अपनी सामाजिक जिम्मेवारी निभाने का अवसर मिलता है। ट्रस्ट के संरक्षक नरेन्द्र सिंह नेगी ने राजू भाई को याद किया तथा कार्यक्रम में आमन्त्रित लोगों का आभार प्रकट किया। विधायक यशपाल बेनाम ने भी राजू भाई को अपनी श्रद्धांजलि दी।
अन्त में बच्चों को पुरस्कार बाँटे गये। इस बार धरणीधर चित्रकला प्रतियोगिता में 15 स्कूलों के 232 बच्चों ने भाग लिया। जबकि राजेन्द्र रावत स्मृति निबन्ध प्रतियोगिता पौड़ी के विद्यालयों के साथ अल्मोड़ा जनपद के सर्वोदय इन्टर कालेज, जैंती में करवाई गई।
इस अवसर पर ‘संवेदनशील हिमालय को संवेदनशीलता की आवश्यकता’ विषय पर वीर चन्द्रसिंह गढ़वाली स्मृति व्याख्यान देते हुए पद्मभूषण चण्डी प्रसाद भट्ट ने कहा कि हिमालय क्षेत्र में होने वाली विकासोन्मुख गतिविधियों के तरीकों के प्रति यदि हम समय रहते सजग न हुए तो आने वाले दिनों में उसके अधिक दुष्प्रभाव देखने को मिल सकते हैं। इस विकास की वजह से हो रहे भूक्षरण, भूस्खलन व भूकटाव के दुष्परिणाम हम अभी भी झेल ही रहे हैं। जरूरत ‘अति विकास’ की नहीं, बल्कि ‘टिकाऊ विकास’ की है।
यदि हम विकास कार्यों को लेकर सजग होते तो इस वर्ष की अतिवृष्टि से इतना अधिक नुकसान नहीं होता। काम हों तो ऐसी नौबत नहीं आ सकती। हालंकि कुछ आपदाओं को टाला नहीं जा सकता, फिर भी उसके दुष्प्रभावों को न्यूनतम किया जा सकता है। अगस्त 2010 को लद्दाख के लेह में बादल फटने से भारी तबाही मची। यदि लेह में समझबूकर भवन बनाये गये होते, रास्तों व नालों में अतिक्रमण न होता तो विनाश इतना अधिक नहीं होता। लगभग ऐसा ही सितम्बर में उत्तराखंड में हुआ। दरअसल में हिमालय क्षेत्र संवेदनशील है। लोकगीत बताते हैं कि अतीत में भी यहाँ बड़े भूस्खलन होते रहे। प्रमुख रूप से ऐसी घटनायें नदी घाटियों में देखने को आयीं। इसलिये समझदारी इसी में है कि पहाड़ों के साथ कम से कम छेड़-छाड़ हो।
सितम्बर 2010 की अतिवर्षा से हुए नुकसान में मानवीय हस्तक्षेप का योगदान अधिक था। अस्थिर जगहों पर किये गये या कामचलाऊ ढंग के निर्माण ने कहर ढा दिया। वे चाहे भवन रहे हों या सड़कें। कहीं सड़कों के लिये किये गये अंधाधुंध कटान के कारण गाँवों के ऊपर मलबे से खतरा पैदा हुआ तो कहीं गाँव के नीचे से जाने वाली सड़क ने संकट खड़ा कर दिया। मौजूदा सड़क निर्माण तकनीकी में बुनियादी खामी है। इसमें काम तो जल्दी होता है किन्तु उसे भारी पर्यावरणीय क्षति होती है। खेत नष्ट होते हैं और इसका मलबा फेंकने से हजारों पेड़ों को नुकसान पहुँचता है। पहले ‘आधा कटान व आधा भरान’ पद्धति से सड़क बनती थी। अब मशीनों का प्रयोग करते समय इस बात पर ध्यान नहीं दिया जाता। हिमालय पर आबादी का दबाव बढ़ रहा है। ऐसे में यहाँ टिकाऊ विकास की अनदेखी की जा रही है। नदी किनारे बसे नगरों में नदी के तटों के करीब अतिक्रमण कर भवन बन रहे हैं, जो भविष्य में खतरनाक होंगे। किसी निर्माण में यह ध्यान नहीं दिया जाता है कि उससे गधेरा बन्द हो गया है। फिर बारिश में पानी का निकास कैसे होगा ? ऐसे सवालों पर सोचना होगा।
यह आयोजन संस्कृति भवन प्रेक्षागृह में हुआ, जहाँ भारी ठण्ड के बावजूद नगर के बुद्धिजीवियों व छात्रों की अच्छी तादाद में मौजूदगी रही।