नवीन चन्द्र कफल्टिया
नैनीताल जिले के सुदूरवर्ती ब्लॉक ओखलकांडा से 12 किमी. दूर रमोला गाँव प्रकृति का कोपभाजन हुआ है। ओखलकांडा-पतलोट मोटर मार्ग में ओखलकांडा से 8 किमी. पर करायल गाँव है। करायल से उत्तर-पश्चिम की ओर तीन किमी. दूरी पर स्थित है रमोला गाँव। गौला नदी के तटवर्ती क्षेत्र में स्थित इस गाँव में जाने के लिये सीधी ढलान के बाद गौला पुल का सहारा था। उफनाई गौला नदी अपने प्रलयंकारी स्वरूप के चिन्हों को छोड़ कर पछाड़ खा रही थी।
सन् 1968 से 1970 तक जूनियर हाईस्कूल पैटना में अध्ययन हेतु रमोलागाँव के रास्ते ही जाना पड़ता था। तब लहलहाती फसल के बीच पतले रास्तों से गुजरना मनमोहक लगता था। आज वही खेत उजाड़ रौखड़ में तब्दील हो गये हैं। उस गाँव में सहस्त्रों लोगों का जमावड़ा होने के बावजूद भी खौफनाक सन्नाटा पसरा था। लोग वहाँ मलबे एवं विशाल पत्थरों के बीच दबे अथवा लापता मकानों के मलबे से डुंगर सिंह की तीन पुत्रियाँ व देव सिंह रमोला को खोजने की असफल एवं निराश कोशिश कर रहे थे। दीवान सिंह रमौला, जिनका मकान सामान एवं पशुओं के साथ दफन हो गया, बताते हैं कि गाँव के सिरहाने से गुजर रहे मोरनौला-मझौला मोटर सड़क के निर्माण हेतु किये गये कटान का मलबा कटे हुए बड़े-बड़े पेड़ों से अटका रहा और अतिवृष्टि का जल एकत्रित होने के कारण भारी दबाव बना तथा गौला नदी की ओर मलबे के पहाड़ की तरह खिसक गया। इसकी चपेट में जन, धन समेत कई मकान व खेत आ गये। प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार उस कीचड़, मिट्टी, पत्थर, पेड़ आदि के भयानक सैलाब में तुन व चीड़ के विशालकाय हरे वृक्ष भी माचिस की तीलियों की तरह घूमते हुए खड़े-खड़े नदी में समा गये और इस सैलाब के कारण गौला का जल भी कुछ देर के लिये पूरी तरह अवरुद्ध हो गया जैसे कि वह भी इस भीषण दृश्य को देख कर स्तब्ध रह गया हो। विशाल पत्थर गौला नदी की दूसरी ओर पहाड़ी में कई मीटर ऊँचाई तक पहुँच गये जो अभी उस विनाश लीला के साक्षी हैं।
प्रकृति के इस रौद्र रूप में डुंगरसिंह का मकान नींव सहित लापता हो गया, जिसमें उनकी तीनों पुत्रियाँ भी थी। मवेशी और सामान भी बह गये। अब मकान की जगह रौखड़ है। लगता ही नहीं कभी वहाँ दोमंजिला विशाल मकान रहा होगा। दूसरे छोर पर ललित सिंह व भगवान सिंह के मकानों को क्षतिग्रस्त किया। सतर्कता के कारण लोगों ने बच्चों को प्रयास कर बचा लिया। कुछ घायलों को हल्द्वानी चिकित्सालय में भेजा गया। दीवान सिंह रमोला का तीन मंजिला मकान जमींदोज हो गया तथा तेज सिंह रमोला का मकान भी ध्वस्त हो गया। उस मलबे से दुर्गध आ रही है तथा कहीं-कहीं मक्खियाँ भिनभिना रही हैं, जिससे यह संकेत मिल रहे हैं कि वहाँ मवेशी दबे हो सकते हैं।
कीचड़, पानी, पेड़, पत्थर, मिट्टी का सैलाब उस समृद्ध गाँव को नष्ट कर दो टुकड़ों में बाँट गया तथा गाँव के दो टुकड़ों के बीच रौखड़ की शक्ल में सन्नाटा है। स्व. चतुर सिंह के परिजन कहते हैं कि रात भर नींद नहीं आती। दिल दहला देने वाली भीषण गर्जना व मकानों के ध्वस्त हो जाने की आशंका दूर नहीं होगी। दीवान सिंह अब उस स्थान में रहने के औचित्य पर प्रश्न चिन्ह खड़ा कर देते हैं। इस त्रासदी में अपनी तीन पोतियों को खो चुके वयोवृद्ध राम सिंह अपनी दोनों आँखों की रोशनी भी पूर्व में ही गँवा चुके हैं। अपने परिचितों को आवाज की पहचान से गले लगा लेते हैं और अपने दुःखों के पहाड़ को आँसुओं के जल से कम करने का प्रयास करते हैं। अपने दिल की टीस के साथ सभी से प्रार्थना करते हैं कि गाँव के सिरहाने से गुजरने वाली प्रस्तावित दूसरी सड़क मत बनने देना अन्यथा बचे-खुचे खेत भी नहीं रहेंगे हम कहाँ रहेंगे ? क्या खायेंगे ?