सलीम मलिक
रामनगर के चिल्किया गाँव में एक ताऊ ने अपनी भतीजी को खेलने-कूदने की उम्र में अनचाहे गर्भ का बोझ ढोने को मजबूर कर दिया। भरे-पूरे परिवार के अंदर एक दरिंदा बीते आठ माह से एक मासूम बच्ची को अपनी हवस का शिकार बनाता रहा, तब तक इस घटना का किसी को पता नहीं चला। लेकिन जब घटना का खुलासा हो गया, तब भी गाँव से इस दरिंदगी के खिलाफ कोई आवाज न उठना बताता है कि हमारा समाज दरहकीकत कितना ‘सभ्य’ है। जैसा कि दस्तूर हो चला है कि पुलिस प्रशासन भी ऐसी घटनाओं में किसी की पहलकदमी की प्रतीक्षा कर ऐसी असामाजिक हरकतों को ही बढ़ावा देता है, ऐसा ही इस घटना मे भी हुआ। यदि इस मामले में भी मीडिया ने पहलकदमी न ली होती तो यह मामला भी दफन हो जाता। ऐसे मामलों में अक्सर समाज की एक सर्वमान्य व सर्वथा गलत प्रतिक्रिया नजर आती है कि यह किसी के घर का मामला है और समाज को इसमें हस्तक्षेप करने की कोई आवश्यकता नहीं है। घर से बाहर अपराध होने की हालत में समाज जितना मुखर होता है, घर के अंदर के अपराध पर उसकी चुप्पी उतनी ही खतरनाक होती है। घर के अंदर ही मासूम बच्ची से बलात्कार का यह न तो पहला मामला है और न ही आखिरी। बारह साल की एक मासूम बच्ची के साथ बलात्कार का मामला खुलने के बाद भी इस बच्ची के रिश्तेदारों व परिजनों ने भी इस मामले को ठंडे बस्ते में डालने में कसर नहीं छोड़ी। वह तो भला हो इलाके की ‘महिला एकता मंच’ का, जिसने संसाधन न होते हुए भी गायब की गई बालिका को ढूँढ निकाला और कोतवाली में मुकदमा भी कायम करवाने की पहल की।
रवि सैनी की पुत्री लक्ष्मी (काल्पनिक नाम), जो कि कक्षा 8 की छात्रा है, से उसके ताऊ गोपाल सैनी ने चाकू दिखाकर मुँह पर कपड़ा ठूँसकर बलात्कार कर दिया। घटना के करीब आठ माह बाद बालिका के गर्भवती होने पर परिजनों को पता चला। गाँव में तमाम तरह की चर्चायें आरम्भ हो गई। सुगबुगाहट होते ही महिला संगठन ने घटना की जाँच आरम्भ कर दी और सच्चाई का पता लगा लिया। महिला संगठनो की शिकायत पर पुलिस ने पीड़िता की माँ बसंती देवी के भी बयान लिये, जिसने स्पष्ट रूप से गोपाल सैनी का नाम बताया। विद्यालय के प्रधानाचार्य ने बताया कि बीते 6 जनवरी से बच्ची स्कूल भी नहीं आ रही है। स्कूली अभिलेखों में उसकी आयु 16 मार्च 1998 अंकित है।
रामनगर में गुजरे साल के मई माह में भी कोसी नदी में रहने वाले एक अल्पसंख्यक परिवार में भी ऐसी घटना हुई। मजदूर परिवार में इस घटना को अंजाम देने वाला बच्ची का अपना ही जन्मदाता, उसका बाप निकला। उस समय भी पुलिस प्रशासन ‘किसी ने कोई तहरीर ही नहीं दी’ की अपनी चिरपरिचित शैली के साथ इस मामले को पचा लिया। यदि तब पुलिस ने कोई कार्यवाही की होती तो शायद चिल्किया इलाके की इस बच्ची के ताऊ की हिम्मत यह कुकर्म करने की नहीं होती। कौन जानता है कि ऐसे न जाने कितने मामले समय की गर्द पड़ने से ढँके होंगे। राष्ट्रीय अपराध रिकार्ड ब्यूरो (एनएसीआरबी) के आँकड़ों के अनुसार देश में रिश्तेदारों द्वारा ही महिलाओं को अपनी हवस का शिकार बनाये जाने के मामलों में 30 फीसदी का इजाफा हो चुका है। बलात्कार की घटनाओं में 65 फीसदी अपराधी सगे रिश्तेदार ही थे जिन्होंने अपनी हवस की पूर्ति के लिये 10 साल से कम उम्र की बच्चियों तक को अपना शिकार बनाने से परहेज नहीं किया। बलात्कार के कुल मामलों में अजनबियों द्वारा बलात्कार की केवल 5 फीसदी घटनाओं को ही अंजाम दिया गया। साफ है कि बदलते परिवेश में महिलाओं व बच्चियों को अब अजनबियों से उतना खतरा नहीं है जितना कि अपनों से।