‘आये चुनाव गये चुनाव’लोगों को सही रास्ता दिखाने का एक और अच्छा प्रयास है। धन की लोलुपता और सत्ता के नशे में चूर भ्रष्टाचारियों की गुलाम मानसिकता इस देश को भी रूस, यमन, इजिप्ट आदि देशों की वर्तमान स्थिति में डाल सकती है।
जे.एम.शाह, फेसबुक पर
एक जैसे ठैरे घुघुतिया और चुनाव
आदरणीय सम्पादक जी,
जबसे घुघतिया/काले कव्वा/उतरैणी का त्यार गुजरा है, तभी से ये त्यार और चुनाव त्यार में फर्क कर पाने में असमर्थ हो रहा हूँ। आस पड़ोसी छोड़ो, घर वाले भी ‘बुड़ पगली गो’ जैसे जुमले का इस्तेमाल कर रहे हैं। उम्मीद है आप ऐसा नहीं सोचोगे।
बात इत्ती सी है कि मेहनत दोनों में ही ठैरी। आटे में तेल, रिफाइन्ड, घी, डालडा (जिसकी जैसी क्षमता) डालकर और गुड़ का घोल बनाकर, आटा गूँथ कर, उड़द पीस कर बड़े, खजूरे, घुघूते उसी से तलवार घड़े आदि आकार (चुनाव चिन्ह) बनने वाले ठैरे…. आप वाकिफ ही होंगे। मेहनत का काम ठैरा हो। पूरा आधा दिन लग जाने वाला ठैरा और ऐसा हर घर में होने वाला ठैरा।
अब टिकट लाना, असंतुष्टों से निपटना, पोस्टर, पर्चे, बैनर इकट्ठा करना…. जिसकी जैसी क्षमता, टिकट नहीं मिलने पर निर्दलीय होकर लड़ना। सुबह से रात तक घर-घर जाना, चुनाव सभा, मीटिंग, सपोर्टरों का इंतजाम ये त्यार भी मेहनत का ही ठैरा।
फिर गले में घुघुते, खजूरे, संतरे, मूँगफली, घड़ा, तलवार आदि की विभिन्न आकार की मालायें डालकर हकाहाक ‘ले कव्वा बड़, मके दे सुनक घड़’, ‘ले कव्वा तलवार, मके दे सुनो हार’ आदि-आदि नारे के साथ हम कव्वों को वर्ष में एक बार पुकारते मौकियाते बच्चे/नेता ! हम कव्वों को आटे की तलवार और अपने लिये सोने का हार…
अब इतने वर्षों में हम कव्वे के इन गुणों के इस तंत्र को समझ ही रहे होंगे। लोक को कव्वा समझने वाले इस गणतंत्र को मैं ऐसे ही समझ रहा हूँ तो इसमें पगलाने वाली कौन सी बात है ? आप यह बात मेरे घर वालों को समझा पायेंगे….साथ ही आप और आप का अखबार गणतंत्र का नहीं, बल्कि लोकतंत्र का प्रबल समर्थक रहा है सो मेरी भी सहायता करेंगे इस उम्मीद के साथ….
दिनेश उपाध्याय