पेड़ की ओट में हल्का होने की आजादी पुरुषों को ही मुबारक हो
नैनीताल समाचार के 15 मार्च के अंक में मुकेश नौटियाल का लेख ‘क्या महिलाओं को पूर्ण अधिकार दिला पायेगा महिला आरक्षण बिल’ पढ़ा और पत्र लिखने का मन किया। महिला आरक्षण बिल महिलाओं को संसद और विधान सभाओं में 33 प्रतिशत सीटें दिला सकता है। इससे नीति निर्मात्री संस्थाओं में उनकी भागीदारी बढ़ेगी। वह भागीदारी कितनी सकारात्मक होगी, यह नहीं कहा जा सकता। स्थानीय निकायों में कहीं 33 और कहीं 50 प्रतिशत आरक्षण मिलने पर स्त्रियों ने प्रशंसनीय कार्य भी किया है और उनकी परनिर्भरता या अक्षमता का उपहास भी उड़ाया गया है। स्त्रियाँ इसी समाज का अंग हैं। उनसे इतनी अधिक उम्मीदें क्यों करनी चाहिए ? महिला आरक्षण बिल का उद्देश्य भी महिलाओं को पूर्ण अधिकार दिलाना नहीं है। वह तो इस दिशा में उठाया गया एक कदम भर है।
यह भी भ्रम नहीं होना चाहिए कि पश्चिम की स्त्री हिन्दुस्तान की स्त्री का आदर्श है। यह भी एक भ्रम ही है कि पूर्णता जैसा भी कोई आदर्श होता है जिसे हासिल किया जा सकता है। अपने देश-काल-परिस्थितियों के बीच अपने स्व की पहचान, अपने संघर्षों की पहचान अधिक महत्वपूर्ण है। लेखक का यह कहना सही है कि स्त्री को लेकर पूरी दुनिया के पुरुषों का नजरिया एक सा है। वह पितृसत्तात्मक नजरिया है जो अब पूरी तरह बाजार की पकड़ में है। इसमें शक नहीं कि बहुत सी महिलाओं का भी वही नजरिया है। यह भी देखा ही जाना चाहिए कि दूसरे विकसित देशों के मॉडल को हम कहाँ नहीं लेकर चल रहे हैं। स्त्री विमर्श को देह मुक्ति के रूप में उछाला जरूर गया है, इस तरह की चर्चाएँ हुई हैं। पर स्त्री विमर्श का मतलब स्त्री की चुप्पी तोड़ना है, कह पाने की सन्तुष्टि है, उस सब को जो सदियों से वह सहती आई है। स्त्री होने के नाते झेली गई वेदना, घुटन, अपमान और दमित इच्छाओं की अभिव्यक्ति है, कहना चाहिए स्वीकारोक्ति है। उसे पहचाना जाये, यथार्थ में वह जैसी है। वह कैसी है, यह बात उस पर थोपी न जाये। जैसे कि लज्जा, सहनशीलता, त्याग आदि आदि उस पर थोपे जाते रहे हैं। महिला मुद्दों को लेकर भी एक साफ दृष्टि होनी चाहिए और बार-बार पश्चिम की दुहाई देते हुए अपने देश की स्थितियों को उलझाना नहीं चाहिए। अपनी देह पर अपना अधिकार एक प्रकार से आत्मनिर्णय के अधिकार की माँग है। पिता रक्षति कौमारे ……. के पूरे जीवन पर पितृसत्ता के अधिकार को घोषित करता है। देह की मुक्ति स्त्री की आजादी का पर्याय नहीं है। स्त्री की आजादी का अभिप्राय है, एक व्यक्ति के रूप में स्त्री की पहचान न कि वस्तु के रूप में। जब व्यक्ति के रूप में स़्त्री स्थापित होती है तो अपनी देह पर भी स्वतः उसका अधिकार होता है। यह सच नहीं है कि नारी मुक्ति के तमाम आन्दोलन पुरुषों द्वारा चलाये गये हैं। अन्य संघर्षों के अलावा कानूनी प्रावधानों के लिए भी स्त्रियों ने बखूबी लड़ाई लड़ी है, जिसके परिणामस्वरूप दहेज या बलात्कार के कानूनों में संशोधन हुआ है। कार्यस्थल पर यौन उत्पीड़न सम्बन्धी निर्देश जारी हुए हैं। घरेलू हिंसा अधिनियम बना है। माता के नाम को कानूनी तौर पर मान्यता मिली है।
अमेरिका और यूरोप के शहरों में पुरुषों को भी कहीं भी, कभी भी पेशाब करने की आजादी नहीं है। यह तो दक्षिण एशिया ही है, जिसे पुरुषों ने अपना मूत्रालय बना रखा है। समझ नहीं आता कि इस तरह का सवाल लेखक को महिला आरक्षण के नाम पर उठाने की जरूरत क्यों पड़ी। पेड़ की ओट में हल्का होने की आजादी पुरुषों को ही मुबारक हो। उन्हें तो कहीं भी, किसी भी जगह पर माँ-बहन की गालियाँ देने की भी आजादी है। लड़कियों के समूह पर छींटाकशी करने या सीटी बजाने की भी आजादी है, कहीं भी किसी भी बैठक में स्त्रियों पर ताने कसने या अभद्र भाषा बोलने की भी आजादी है। स्त्रियों को इस तरह की आजादी की कोई आवश्यकता नहीं है। लेकिन इतना जरूर है कि पुरुषों को नियंत्रित करने की बहुत जरूरत है और महसूस करने की भी जरूरत है कि वे कब, कहाँ कैसे वे स्त्री के खिलाफ हो जा रहे हैं और उसके सम्मान को चोट पहुँचा रहे हैं।
उमा भट्ट
सम्पादक ‘उत्तरा’, नैनीताल
एक ‘शंभू राणा’ कॉलम नियमित कर दें
नै.स. के 32वें जनमबार के उपलक्ष्य में शिक्षा पर केन्द्रित सुन्दर अंक छापने के लिये- देर से ही सही बधाई। धन्यवाद भी सहभोज आयोजित करने के लिये। अरे भई, पाठकों के लिये विविध पठनीय सामग्री पा जाना भोज ही तो है न। अंग्रेज लोग बर्थडे पार्टी में पूरे हो गये सालों जितनी मोमबत्तियाँ जलाकर फू……कर देते हैं। आपके अंक में अगर चार पेज सामग्री और जोड़ दें तो 32वाँ जनमबार अंक 32 पेज का छपता- कुछ मॉड टच आ जाता।
मैं पिछले पाँच माह से तमिलनाडु में रामेश्वर के समीप चल रही एक गवेषणा परियोजना से सम्बद्ध हूँ- मेरे पास नागपुर से डाक का बंडल देर से पहुँच पाया। जनमबार अंक में छपी दोनों कवितायें (शिक्षक राजेश्वरी और कितना अच्छा होता- स्वाति मेलकानी) बहुत अच्छी हैं। यह हमारी शिक्षण प्रणाली का ही दोष है कि समाज में भ्रष्टाचार बढ़ता ही जा रहा है और शिक्षक वर्ग के सिखाने में ही कुछ छूट रह जाती है, जिसके कारण छात्र अपने गुरुजनों का आदर नहीं करते। मुझे मेरे हाईस्कूल के पहले दिन की डरावनी याद ताजा हो गई। जब डी.ए.वी. प्राइमरी स्कूल, मालरोड शिमला में प्रार्थना सभा में ही हेडमास्टर ने कुछ बच्चों को पता नहीं किस कसूर पर तड़ातड़ डंडे मारे कि वे सब दर्द से चिल्लाने लगे। मैं दहशत में आ गया। इसी लिये दूसरे दिन डर के मारे स्कूल न जाकर दाज्यू के दोस्त के होटल में सारा दिन बैठा रहा। शाम को दाज्यू ऑफिस से लौटते समय मुझे घर ले जाने आये, तो मैंने डरते-डरते बताया कि मैं स्कूल नहीं गया। वहाँ मास्टर जी मारते हैं। अगले दिन दाज्यू मुझे कक्षा के अंदर तक पहुँचा गये और मास्टर जी से विनती कर गये कि बच्चा पहली बार स्कूल आया है जरा खयाल रखियेगा। आज के दिन भी जब मेरे पड़ोस में रहने वाली चार-पाँच साल की लड़की स्कूल जाते समय हाय-तौबा मचाती है और उसे जबरदस्ती स्कूल भेजना पड़ता है- तब सोचता हूँ कि काश, स्कूल बच्चों की प्रिय जगह होता। प्रभात उप्रेती, महेश पुनेठा की लिखी रचनायें आँख, कान, नाक और दिमाग ही नहीं वरन हाथ खलबला देने वाली हैं। शिक्षक मनोहर चमोली ने अपनी डायरी में इन छोटी-छोटी बातों का जिक्र किया है जिनका असर बड़ा होता है, और जीवन भर के लिये होता है। प्राथमिक स्कूल में यदि शिक्षक इन बातों पर ध्यान दें। बाल भावनाओं को समझने उनके मन में उठे छोटे-बड़े सवालों का समाधान और उनकी व्यक्तिगत समस्याओं को सुलझाने का प्रयास करें और भरसक कोशिश करें कि बच्चों को इनका बचपन जीने का हर सम्भव अवसर मिल सके, बच्चों को उपदेश देने से पहले वे सभी बातें अपने चरित्र में ढालें तभी तो वे आपके अनुयायी बन पायेंगे और आपको अपना आदर्श मानेंगे।
पाँच वर्षों तक स्कूल जाने के बाद भी नाजिश तमन्ना की गंगा निरक्षर क्यों रह गयी ? यह प्रश्न हमारी खोखली शिक्षानीति, जिसकी सफलता का हम कागजों पर खूब ढिंढोरा पीटते जा रहे हैं,की पोल खोलता है। हमें प्राथमिक शिक्षा को गाँवों की मौजूदा हालत के अनुसार एडाप्टेबल बनाना होगा तभी सभी बच्चे साक्षर बन पायेंगे। शंभू राणा ने हमेशा की तरह अंतर्मन से निकले विचारों पर बिना बनावटी लेप लगाये अपनी धारधार हास्यव्यंग्यात्मक शैली में बागेश्वर वालों को लताड़ दिया – दंगा करवाने की विफलता के लिये और शिक्षा के मामले में अपने निखद्देपन पर लिखते हुए सभी शिक्षित लोगों से अपनी वाहवाही करवा ली। वो शख्स लिखता ही कुछ ‘और’ किस्म का है। मेरी मानों तो नै.स. के हर अंक में- छोटा ही सही पर अनिवार्य रूप से एक ‘शंभू राणा’ कॉलम नियमित कर दें।
हरेले का तिनड़ा गछिया कर भेजने की बजाय चिपका कर भेजने के कारण उखड़ कर कहीं गिर जाने और नवीन जोशी को न मिल पाने से लगे सदमे के लिये हमें संवेदनायें हैं। साथ ही मन में यह इच्छा भी है कि बीच-बीच में ऐसा ही कुछ होता रहे, ताकि नवीन जोशी सरीखे और लोगों का मन उचाट हो, उनकी रातों की नींद हराम हो। ताकि इसी बहाने ही वे अपनी प्रतिक्रिया मनोभाव, समीक्षा-संस्मरण लिखने को बाध्य होते रहे।
गणेश पाठक
तमिलनाडु

























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