आज के इस बदलते दौर में वैलेन्टाइन और ‘फ्रैंडशिप डे’ की तारीख तो शायद हम सब को याद होगी लेकिन भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव जैसे अनेक वीरों की शहादत का दिन बहुत कम को याद होगा। सूरतेहाल यह है कि कुछ को तो 15 अगस्त के दिन विभाग में जाकर राष्ट्रीय ध्वज फहराना भी मुसीबत ही लगता है। हम शहरवासी इस राष्ट्रीय पर्व को कितने हर्ष और उल्लास के साथ मनाते हैं यह किसी से छुपा नहीं है, लेकिन उत्तराखण्ड के सुदूर सीमावर्ती क्षेत्र नीती घाटी के वासी इस राष्ट्रीय पर्व को जिस जज़्बे और उल्लास के साथ मनाते हैं वह सबके लिये एक मिसाल है।
सन 1947 से ही पूरी घाटी में मलारी से लेकर हिन्दुस्तान सीमा के आखिरी गाँव नीती तक स्वतंत्रता दिवस समारोह का आयोजन एक ऐसे मेले की तरह होता है जिसमें देशभक्ति और धार्मिक आस्था का अनूठा संगम दिखायी देता है। भारत सीमा के इस आखिरी गाँव में शान से लहराते तिरंगे को देखकर इक पल को रोंगटे खड़े हो जाते हैं। हालाँकि पूरी घाटी में ही स्वाधीनता दिवस का आयोजन होता है लेकिन ग्राम गमशाली में ग्राम बाम्पा और फरकिया मिलकर स्वतंत्रता दिवस को मिलकर मनाते हैं, जिससे यह आयोजन और भी भव्य हो जाता है। दो वर्ष पूर्व पौड़ी से गये हमारे छोटे से दल को भी घाटी का यह अनोखा जज़्बा देखने का मौका मिला और उसके बाद से सच मानिये, शहरों में महज़ खानापूर्ति के लिये जिस उदासीनता से यह दिन मनाया जाता है, उसे देख खुद के शहरवासी होने पर शर्मिन्दगी ही महसूस होती है।
भारतमाता की जय के नारे कानों में पड़ने लगे थे, यह फरकिया गाँव का दल था जो लगभग 2 किमी. की दूरी से ढोल-दमाऊ की ताल पर थिरकता हुआ गमशाली गाँव पहुँच रहा था और उनके पीछे-पीछे 4 किमी. से पैदल नाचते-गाते बाम्पा गाँव के लोग पहुँचे और अन्त में आये गमशाली के लोग। आयोजन स्थल पर जब तीनों गाँव के लोग पहुँचे तो यह देख कर बेहद आश्चर्य हुआ कि ज्यादातर महिलायें हैं और वे भी वृद्ध। लेकिन उनके जोश के आगे युवा भी फीके थे।
पारम्परिक वेषभूशा और आभूषणों से सुसज्जित घाटीवासियों ने जब एक स्वर में ध्वज़ारोहण के बाद राष्ट्रीय गीत गाया तो मानो पूरा नीती दर्रा ही गूँज उठा। उसके बाद सारा दिन सांस्कृतिक कार्यक्रमों का जो सिलसिला चला, वह शायद समाप्त ही न होता अगर घाटी में रात न गहराने लगती। सांस्कृतिक कार्यक्रमों में यहाँ की संस्कृति की अनूठी झलक देखने को मिली।
इस घाटी के वासी स्वयं ही इस कार्यक्रम के आयोजक हैं, कलाकार भी और दर्शक भी, लेकिन संसाधनों, युवाओं और बच्चों की कमी के बावजूद जिस उत्साह से सारा दिन 15 अगस्त मनाया जाता है, वह बेशक काबिलेतारीफ है। भारत तिब्बत सीमा पुलिस ने भी कंधे से कंधा मिलाकर इस आयोजन में इनका साथ दिया। यहाँ तक कि मंच पर आकर थिरकने से भी वह अपने आप को रोक नहीं पाये। इस आयोजन की सबसे अनोखी प्रतियोगिता थी, तकली कातना जो यहाँ का कभी मुख्य व्यवसाय भी हुआ करता था। इस प्रतियोगिता में तीनों गाँव की दो-दो महिलाओं ने भाग लिया और इस हुनर में पारंगत सभी वृद्ध महिलाओं को विजेता घोषित किया गया, जो कि आयोजकों का बेहद ही अच्छा फैसला था।
सारा दिन बीत कब अंधेरा हो चला इसका अहसास ही नहीं हुआ। पूरी घाटी देशभक्ति के रस में डूबी थी। गाँववासियों द्वारा स्वयं अपने हाथों से बनायी गयी स्वतंत्रता संग्राम के महानायकों की तस्वीरों को ग्राम नीती के पंचायत भवन की दीवारों पर देखना अपने आप में एक सुखद एहसास था। नीती से लौटते समय हमारे दल के हर सदस्य के मन में शायद एक ही बात थी कि स्वतंत्रता दिवस को एक राष्ट्रीय पर्व के रूप में मनाते तो अक्सर देखा था लेकिन स्वतंत्रता दिवस को एक त्यौहार के रूप में मनाते पहली बार ही देखा।