उमेश डोभाल की 20वीं पुण्यतिथि उत्तराखंड के आंदोलनकारियों, पत्रकारों, सामाजिक और राजनैतिक चिन्तकों के लिये किसी कुम्भ से कम नहीं था, जिसमें राजेन्द्र रावत जैसे जुझारू व्यक्ति की स्मृति के जुड़ने से उसका महत्व कई गुना बढ़ गया। इन दोनों व्यक्तियों की कर्मस्थली पौड़ी में होने वाले आयोजन में मुख्यमंत्री शरीक हुए और उन्होंने स्वयं को आयोजकों में से एक करार दिया।
दो दैनिक पत्रों के स्थानीय सम्पादक, एक पूर्व सम्पादक, समाज को जीवनदान कर चुके मान सिंह रावत, उ. प्र. लोक स्वातंत्र्य संगठन के अध्यक्ष, इतिहासकार पद्मश्री डॉ. शेखर पाठक, मैगसेसे पुरस्कार प्राप्त राजेन्द्र सिंह, राजस्थान विधान सभा के पूर्व अध्यक्ष सहित स्थानीय पत्रों के एक दर्जन से अधिक सम्पादक, लोक वाहिनी व परिवर्तन पार्टियों के केन्द्रीय अध्यक्ष तथा पत्रकार यूनियनों के पदाधिकारियों सहित 200 से अधिक पत्रकार व सामाजिक कार्यकर्ता जहाँ उपस्थित हों, उस आयोजन को क्षेत्रीय पत्रों में पहला पृष्ठ न मिल पाना उनकी दशा-दिशा को समझने के लिये काफी है।
उमेश डोभाल जब शराब माफिया के हाथों मारे गये, उस समय वे अमर उजाला में कार्यरत थे। नवभारत टाइम्स, बिजनौर टाइम्स, नैनीताल समाचार आदि कितने ही समाचार पत्रों में उमेश अपनी लेखनी का जादू बिखेर चुके हैं। अमर उजाला के लिये भी उमेश की 20वीं पुण्यतिथि बहुत महत्व की नहीं रही होगी, क्योंकि उसका कोई वरिष्ठ सम्पादकीय कर्मी वहाँ मौजूद नहीं था और पाँचवाँ व पौड़ी पृष्ठ ही उमेश और उत्तराखंड के उन लोगों के हिस्से आया, जिनके लिये उमेश पत्रकारिता की मिसाल थे। उमेश डोभाल, राजेन्द्र रावत तथा उनकी शहीदाना सेवाओं को क्षेत्रीय पत्र समझेंगे ऐसी भ्रांति नहीं हो सकती। लेकिन सूचना के जिस बाजार में क्षेत्रीय समाचार पत्रों का एकाधिकार है और राष्ट्रीय कहे जाने वाले पत्र भी क्षेत्रीयता का बाना ओढ़ने के लिये मजबूर हुए हैं, उससे एक बात तो तय है कि सूचना के बाजार और उसमें कब्जे के लेकर कितनी ही मारामारी क्यों न हो, उत्तराखंडी संवेदनाओं, सरोकारों और सहकारों से उनका इतना कोई रिश्ता नहीं है।
प्रसार के स्तर पर क्षेत्रीय पत्र बहुत बड़ी छलाँग लगा रहे हैं। व्यवसाय भी बढ़ा है। पाठक को समाचार पत्र खरीदने की भूख है या उसे पढ़ने की, यह सवाल जरूरी नहीं है। उसी प्रसार के बल पर उत्तराखंड की सरकार क्षेत्रीय पत्रों को ही मीडिया समझ बैठी है जो उसका उसके योग्य सोच है। राजधानी के सवाल को पीछे करने का मामला हो या किसी भी आन्दोलन को बेमौत मारने का, स्थानीय छुटभैयों से लेकर दून के सत्तानशीनों तक सब की राय बनाने के इकलौते माध्यमों की पत्रकारिता की क्या गति होने जा रही है, उसे उमेश डोभाल युवा पत्रकारिता पुरस्कार हेतु नामांकन से ही समझा जा सकता है। उमेश डोभाल स्मृति ट्रस्ट को जो 15 संस्तुतियाँ प्राप्त हुईं, उसमें से 6 ने प्रिंट मीडिया के किसी पत्रकार का नाम पुरस्कार हेतु संस्तुत नहीं किया। शेष नौ में से 4 ने वर्ष 2009 के लिये उमेश डोभाल युवा पत्रकारिता पुरस्कार पाने वाले सीताराम बहुगुणा का नाम संस्तुत किया। बहुगुणा किसी क्षेत्रीय या राष्ट्रीय समाचार पत्र से जुड़े नहीं हैं। शेष 5 लोग ही सम्पादकीय, ब्यूरो, रिपोर्टर और स्टिंगरों में से आ पाये। हजारों की जमात में किसी एक को दो लोगों ने भी संस्तुत नहीं किया तो आईना क्षेत्रीय व राष्ट्रीय समाचार पत्रों की ओर घूम जरूर रहा है।
कई बार समाचार पत्र प्रतिष्ठानों के मालिकानों की ओर अंगुली कर मुद्दों को गौण करने की कोशिश होती है, जबकि अधिकांश मामलों में ऐसा नहीं है। सम्पादकीय विभाग में कई जानकार व अच्छी सोच के लोगों की उपस्थिति के बावजूद अधकचरी सोच का वर्चस्व बना है। दून में कोई घटना बड़ी व सार्थक न होते हुए भी अच्छा स्थान पा लेती है, लेकिन अंतराल की अच्छी खबर भी उसके लिये निर्धारित पन्नों से आगे न बढ़े, ऐसा तो शायद किसी मालिक ने नहीं ही कहा होगा। 29 जनवरी 10 को उत्तराखंड के मूर्धन्य पत्रकार एवं स्वतंत्रता सेनानी, ‘देवभूमि’ के संस्थापक-संपादक रामप्रसाद बहुगुणा की स्मृति में दिया जाने वाला पुरस्कार उत्तरकाशी में ‘अमर उजाला’ के उप संपादक सूरत सिंह रावत को दिया गया। लेकिन ‘अमर उजाला’ में ही वह समाचार चमोली के पृष्ठ पर प्रकाशित हुआ, जिससे एक स्वतंत्रता संग्रामी की स्मृति में आयोजित समारोह और एक योग्य पत्रकार को मिले सम्मान की जानकारी से अखबार का वह पाठक वंचित रहा, जहाँ गढ़वाल संस्करण नहीं जाता। देहरादून भी नहीं।
सवाल केवल अमर उजाला, जागरण, हिन्दुस्तान या दूसरे समाचार पत्र का नहीं है। सवाल प्रवृत्ति का है, जिसे जिला संस्करणों तक सीमित कर जनता को सूचना के अधिकार बाधित करने वाला मीडिया कैसे हो सकता है ? सम्पादकीय पर विज्ञापन व प्रसार के प्रभुत्व को स्वीकारना कोई व्यवसाय तो हो सकता है, वह मीडिया नहीं बन सकता। इसलिये स्थानीय मीडिया के लिये सम्भावनायें बढ़ी हैं और अपनी धमक के बावजूद क्षेत्रीय पत्रों में छपी होने के बावजूद खबरें असरहीन साबित हो रही हैं। स्थानीय मीडिया जिस दिन प्रतिस्पर्द्धा में उठ खड़ा होगा, जिला संस्करण के पत्रों की हालत क्या होगी सोचा जा सकता है।
क्षेत्रीय समाचार पत्रों में योग्य पत्रकारों की कमी हो, ऐसा नहीं है। अनुभवीय युवा प्रतिभा प्रिंट मीडिया में है, लेकिन उन्हें उभारने और अच्छी रिर्पोटिंग को प्रोत्साहित करने तथा अनुभवों का लाभ लेने की प्रवृत्ति संपादकीय हिस्सों में नहीं बची है। अध्ययन की लगन कम हुई है और अहं जोर मारता नज़र आता है। ऐसे में कोई प्रतिभा आगे आये भी तो कैसे ? देश के लिये आंदोलनकारी सुरेन्द्र भंडारी द्वारा स्वर्ण पदक जीतने की खबर जब अखबार के स्थानीय पृष्ठ में सिंगल कॉलम लगे और वह भी मुख्यमंत्री के वर्जन के साथ तो यह अधकचरी पत्रकारिता को ही इंगित करता है। जिस मीडिया में उपलब्धियों पर गर्व करने और बुराइयों को दुत्कारने की ताकत न हो, वह मीडिया क्षणिक व्यावसायिक सफलता के बावजूद आमजन का माध्यम नहीं हो सकता। टूथ पेस्ट, साबुन या शेयर बेचना और समाचार पत्र प्रकाशन के बीच का फर्क जनता भी जानती है।