स्वतंत्रता संग्रामी हरस्वरूप पाण्डेय की मूर्ति का अनावरण व स्मारक स्थल का उद्घाटन न होने से पट्टी मल्ला स्यूनरा (अल्मोड़ा) की जनता नाराज है। लोगों ने 26 फरवरी 2011 को भैंसोड़ी स्थित स्मारक स्थल पर धरना-प्रदर्शन कर आगे की रणनीति तय करने का निर्णय लिया है।
हरस्वरूप पाण्डेय का जन्म 15 अगस्त 1909 को और 26 सितम्बर 1978 को निधन हुआ। स्वतंत्रता संग्राम में महत्वपूर्ण भागीदारी के साथ एक वैद्य के रूप में भी उन्होंने क्षेत्र के लोगों की ताउम्र सेवा की। वे आयुर्वेदिक औषधियों से घर-घर जाकर निःशुल्क सेवा करते थे। यदि कभी शुल्क भी लिया तो आठ पुड़िया दवा के साथ एक ‘धर्म की पुड़िया’ खुराक के रूप में साथ में देते थे।
उनके पुत्रों व क्षेत्र के जागरूक लोगों के प्रयासों से 2005 में तत्कालीन मुख्यमंत्री एन.डी. तिवारी ने हरस्वरूप पाण्डेय की मूर्ति, स्मारक तथा एक कक्ष निर्माण की स्वीकृति प्रदान की थी। 2007 में इस कार्य की शुरुआत हुई। 3 सितम्बर 2009 को मूर्ति स्थापित भी कर दी गई। विगत वर्ष 7 मीटर लम्बे व 4 मीटर चौड़े एक कक्ष का निर्माण भी पूरा हो गया। लेकिन इस स्मारक का उद्घाटन लगातार प्रयासों के बावजूद नहीं हो पाया है।
यहाँ हम हरस्वरूप पाण्डेय जी के हाथ से लिखा एक संक्षिप्त लेख प्रस्तुत कर रहे हैं। 28 दिसम्बर 1956 को लिखा यह संस्मरण उन्होंने तत्कालीन कांग्रस कमेटियों व भारत सरकार को भी भेजा है, जिसके संदर्भ में उन्होंने एक टिप्पणी की है:-
‘‘15 अगस्त 47 के बाद भारत को स्वतंत्र होने के उपरान्त काँग्रेस कमेटियों व सरकार द्वारा समय-समय पर स्वतंत्रता संग्राम के कार्यकर्ताओं की जीवनियाँ मागी गई। उन पर क्या हुआ व होगा यह तो अभी तक ज्ञात न हो पाया। इतिहास के किसी कोने में तो वह शायद ही अंकित हो पर तसल्ली देने को ऐसा समय-समय पर होता आ रहा है। जो भी हो कभी आवश्यकता रहे, इस उद्देश्य से अतीत की जो-जो स्मृतियाँ इस समय याद आई हैं वह लिख रहा हूँ।’’
हरस्वरूप पांडेय आत्मज श्री अंबा दत्त पांडेय शिमल्टिया, ग्राम भैंसोड़ी पट्टी मल्ला स्यूनरा, जन्म तिथि दिनांक 15 अगस्त 1909। मेरे पिता श्री अंबादत्त पांडेय जोतिष, कर्मकाण्ड तथा तांत्रिक विद्या के एक नामी विद्वान थे पर लक्ष्मी के भक्त नहीं। साधारण किसान जीवन में ही उनका तथा मेरा जीवन गुजरा व चला आ रहा है। पिताजी मेरे राजभक्त थे, पर मैं बालकाल से ही ब्रिटिश सत्ता का असहयोगी होता चला आया। बागेश्वर के मेले में जिस दिन कुली उतार का आंदोलन कूर्मांचल केशरी श्री बद्रीदत्त पांडेय जी के नेतृत्व में हुआ व सरयू के गंगा के बगड़ में उन्हें गिरफ्तार किया गया तो तभी से मेरे हृदय में देश सेवा के प्रति उद्गार उत्पन्न हो गये। उस दिन के दृश्य को उस छोटी अवस्था में देखने से अभी तक नहीं भुला पाया हूँ। पिताजी मेरी ओर से बहुत सतर्क रहते थे। 18 नवम्बर 1928 को अल्मोड़ा स्कूल में दिन के करीब 9 बजे जब में क्लास छोड़कर लाला लाजपत राय के शोक जलूस में शामिल होने चला आया तो फिर घर से भी बागी करार हो गया और बहुत डांट-फटकार खानी पड़ी। मेरी सब सहायतायें बंद कर दी गयी। 1929 जून के बाद स्कूली पढ़ाई भी बंद कर दी गयी। पर छिपे-छिपे मैं हमेशा काँग्रेस कार्यकर्ताओं के संपर्क में व सभाओं में आता-जाता रहा। सन् 1934 में घर से बाहर रहने के कारण हल्द्वानी शराब बंदी में धरना देने वालों की टोली में चला गया। पुलिस हमें 90/92 आदमियों (लड़कों) को पकड़ मोटर में बिठा कर बड़े-बड़ों को थाने में बंद कर छोटों को लालकुआ व किच्छा के जंगलों में छोड़ देती थी। 2-3 दिन बाद हम फिर पैदल हल्द्वानी आ जाते थे। 15 दिन तक मैं भी इसी क्रम में रहा। फिर हमें नहीं पकड़ा गया। पिताजी के देहावसान के बाद में प्रकट रूप से राष्ट्रीय कार्यकर्ताओं के संपर्क में चला गया। सन् 1933 से 38 के मध्य तक शैल आश्रम बिनसर (खाली) में सेठ जमना लाल बजाज जी के पास चला गया, जहाँ क्रान्तिकारियों से भेंट हुआ करती थी। 1934 दिसम्बर से 35 के मध्य तक अखिल भारतीय ग्राम उद्योग संघ व हरिजन सेवक संघ की ओर से ग्राम गुलड़िया, जिला बदायूँ में रहा। वहाँ स्वास्थ्य खराब होने के कारण घर चला आया और स्थाई रूप से अपने गाँव में ही सड़क के किनारे मकान तथा दुकान बना कर रहने लगा।
मई 1936 के बाद मल्ला स्यूनरा में ही काँग्रेस के राजनैतिक संगठन का श्रीगणेश किया। सन् 38 के मध्य में ही दुकानदारी काँग्रेस संगठन में लगे रहने के कारण ठप हो गई। फिर श्री गांधी आश्रम चनौदा-सोमेश्वर को चला गया। पारिवारिक परिस्थितियों के कारण घर आना पड़ा और यहीं से सन् 1940 में सत्याग्रह ट्रेनिंग कैम्प में ट्रेनिंग लेकर सत्याग्रह की तैयारी में रहा। सन् 1941 में व्यक्तिगत सत्याग्रह आंदोलन के लिये बापू जी ने मुझे भी छाँट लिया था। अतः 26-2-1941 को ताकुला पड़ाव में युद्ध विरोधी नारे लगाने पर गिरफ्तार कर लिया गया। 28-2-41 को इलाका हाकिम दानपुर की अदालत से मुझको एक साल की सख्त कैद व 40 रुपया जुर्माना कर दिया गया। अल्मोड़ा, बरेली, तथा लखनऊ कैम्प में सजा पूरी काट कर दिसम्बर 41 के आखिर में रिहा हुआ और फिर अगस्त 42 के दिन शाम के 4 बजे अपने निवास स्थान भैंसोड़ी में ही भारत रक्षा विधान की धारा 129 के अनुसार गिरफ्तार कर जिला जेल अल्मोड़ा में नजरबंद कर दिया गया। अल्मोड़ा जिले में आंदोलन ने उग्र रूप धारण कर लिया। आंदोलन में हिंसात्मक कार्यवाहियाँ होने के कारण अल्मोड़ा जेल के समस्त नजरबंदों के साथ बिना पूर्व सूचना के सेना के संरक्षण में दिनांक 30 अगस्त 1942 को जिला जेल बरेली भेज दिया और 29-8-1943 को बिना शर्त जिला जेल बरेली से रिहा कर दिया। जेल से छूटने के बाद फिर मल्ला स्यूनरा में ही काँग्रेस संगठन में जुट गया। 15 अगस्त 1947 को देश भक्तों के बलिदानों से भारत स्वतंत्र घोषित हो गया। अतः आंतरिक कल्पना साकार हो गई मेरे राजनैतिक जीवन की।