‘मंच दि एक्सपेरिमेन्टल थियेटर रैपर्टरी’ द्वारा 13 से 15 मई तक शैले हॉल में मंचित ‘रोमियो जूलियट’ ने उम्मीद बँधाई कि भविष्य में कुछ बेहतर नाटक इस संस्था से नैनीताल के नाट्यपे्रमियों को देखने को मिलेंगे। हालाँकि नाटक में दर्शकों का टोटा रहा, मगर जितने भी दर्शक थे, उन्होंने नाटक को खूब सराहा। युवा रंगकर्मी अजय पँवार, जो इससे पूर्व ‘ओथेलो’ का भी मंचन कर चुके हैं, के निर्देशन में नये व मँजे हुए कलाकारों को एक साथ मंच पर देखना यादगार अनुभव रहा।
विलियम शेक्सपियर द्वारा लिखा गया ‘रोमियो जूलियट’ दुःखान्त नाटक है। बताते हैं कि 1596 में लन्दन के ‘ग्लोब थियेटर’ में जब इस नाटक को खेला गया, तब स्वयं शेक्सपियर ने भी इसमें अभिनय किया था। इटली के दो पुराने इज्जतदार घरानों की आपसी आन-बान व झगड़े के बीच ‘रोमियो जूलियट’ एक दर्द भरी प्रेम कहानी है। गिरीश तिवाड़ी ‘गिर्दा’ व निर्मल पाण्डे की स्मृति में खेले गये इस नाटक में रोमियो की भूमिका में अजय पँवार व जूलियट की भूमिका में गंगोत्री बिष्ट का अभिनय ठीक रहा, लेकिन संवाद ठीक से न बोले जाने से रोमियो का पात्र अपेक्षित प्रभाव नहीं छोड़ पाया। नाटक की गति पहले व दूसरे दिन इतनी मंद थी कि समय की बर्बादी के साथ ही पात्रों के संवादों में गम्भीरता नहीं आ पा रही थी। यहाँ तक कि अनिल घिल्डियाल, धर्मवीर परमार व बीना सुयाल जैसे वरिष्ठ रंगकर्मी भी प्रभाव नहीं छोड़ पाये। तीसरे दिन नाटक ने गति पकड़ ली और संवाद में भी सुधार आ गया। रोहित वर्मा, नीरज डालाकोटी, रेहान अख्तर, संजय कुमार, पवन कुमार, मोहनी रावत, मोम्मद जावेद हुसैन, पूरन सनवाल, अनवर रजा, फार्शिया मलिक, डोमा आदि ने अपने किरदार को बखूबी निभाया।
इन कुछ कमियों को नजरअंदाज कर दिया जाय तो ‘रोमियो जूलियट’ दर्शकों को सवा दो घंटे तक बाँधे रखने पर सफल रहा। मंच-सज्जा, वेश-भूषा, प्रकाश व्यवस्था आदि व्यवस्थित थी। भगवन्त मेहरा के मधुर संगीत से रही-सही कमियाँ भर गई, हालाँकि इस संगीत में मेहरा का मौलिक क्रिएशन नहीं था।
हाल के वर्षों में नैनीताल की मंचीय गतिविधियों में आये ठहराव का एक कारण रंगकर्मियों को रिहर्सल के लिए एक अदद जगह उपलब्ध न हो पाना भी है। इसके बावजूद ‘मंच’ द्वारा कुछ अच्छी प्रस्तुतियाँ की गईं। वरिष्ठ रंगकर्मी इदरीस मलिक द्वारा अपने बलबूते पर कुछ आवश्यक सुविधाओं की व्यवस्था कर रंगकर्मियों को इनका उपयोग करने की सुविधा प्रदान की गई है।