राष्ट्रीय स्वास्थ्य बीमा योजना, जिसे गरीबों का सुरक्षा कवच माना गया है, सही क्रियान्वयन न होने से दम तोड़ने लगी है। 1 अप्रेल 2008 से शुरू हुई यह योजना अब कई तरह की विसंगति से पट चुकी है। जनपद पिथौरागढ़ के दोबाँस इलाके के रहने वाले प्रेमबल्लभ, केशवराम, भागीरथी इसके प्रत्यक्ष प्रमाण हैं। योजना के तहत चार महीने पहले बने इन लाभार्थियों के स्वास्थ्य स्मार्ट कार्ड में नाम, जन्मतिथि, फोटो सहित कई तरह की खामियाँ उजागर हुई हैं। इसकी शिकायत ब्लॉक कार्डिनेटर से मुख्य चिकित्साधिकारी तक पहुँचाए जाने के बाद भी गलतियाँ सही नहीं हो पाई हैं। जिला को ऑर्डिनेटर तो किसी तरह की शिकायत आने से ही मुकर जाते हैं। यह तो रहा योजना को लागू करवाने व योजना का लाभ लेने वालों के बीच का फर्क। इन्हें उपयोग में लाने के लिए जो मशीनें चिकित्सालयों में लगी हैं, उनमें भी यह कार्ड काम नहीं कर रहे हैं।
योजना शुरू हुए चार साल होने को हैं, लेकिन सैकड़ों बीपीएल परिवारों के कार्ड तक नहीं बन पाए हैं। जिन बीपीएल परिवारों के कार्ड बनने हैं, उन्हें समय पर सूचना प्रदान न किए जाने की भी शिकायतें सामने आ रही हैं। ऐसे मामले भी हैं कि व्यक्ति का बीपीएल कार्ड तो बना है लेकिन बीपीएल की सरकारी सूची में उसका नाम नहीं है। स्वास्थ्य विभाग, ग्राम पंचायत व स्मार्ट कार्ड बनाने वाली कम्पनी के बीच तालमेल का अभाव दिखाई देता है, जिसकी कीमत गरीब व्यक्ति भुगत रहा है। कार्ड बनाने के नाम पर अवैध वसूली की शिकायतें भी मिली हैं। जिन बीपीएल परिवारों से 30 रुपया प्रति परिवार लेना था, उसके बदले 100 रुपये प्रति कार्ड लिया जा रहा है। हालाँकि इस तरह की ठगी की लिखित शिकायत दर्ज करने में पीडि़त व्यक्ति डर रहे हैं। अब लोगों में अरुचि भी घर कर गई है कि कार्ड बनाकर होगा क्या ? सवाल यह भी है कि जब इलाज महंगा हो गया है, डाक्टरों की फीस व दवाइयों की कीमतें आसमान छू रही हैं तो तीस हजार रुपए की बीमा धनराशि तो बेहद कम है। कहने को इस योजना को व्यावहारिक रूप से लागू करने के लिए हर राज्य में नेशनल रूरल हेल्थ मिशन की नोडल एजेन्सी है। इसमें डायरेक्टर एनआरएचम नोडल आफिसर हैं। स्मार्ट कार्ड का लाभ लाभार्थियों को देने के लिए एफकेओ, फील्ड आफीसर नियुक्त हैं, जिनका काम लाभार्थियों की पहचान करना है। आरएसवीआई के अंतर्गत जुड़े अस्पतालों में मशीनें भी लगी हुई हैं। इसके लिए कम्प्यूटर कार्डधारक भी रखे गए हैं। लेकिन दुर्भाग्य यह है कि इस सबके बावजूद योजना चलती नहीं दिखाई दे रही है।
इस योजना का उद्देश्य था कि गरीबी रेखा से नीचे जीवनयापन कर रहे परिवारों को स्वास्थ्य बीमा के माध्यम से बिना नगद भुगतान के स्वास्थ्य सुविधायें उपलब्ध करायी जाएँ। इसके लिए इसके तीन भागीदार बनाए गए। केन्द्र सरकार, राज्य सरकार व लाभार्थी परिवार। केन्द्र सरकार द्वारा योजना का 75 प्रतिशत व राज्य सरकार को शेष राशि का भार वहन करना है। भारत सरकार द्वारा राष्ट्रीय स्वास्थ्य बीमा योजना’ की रूपरेखा को निर्मित करते हुए न सिर्फ पिछली असफलताओं के अनुभवों से सीखने का प्रयास किया गया था, बल्कि एक विश्वस्तरीय बीमा योजना निर्मित करने का प्रयास भी किया था। इस योजना में पिछली योजनाओं का आलोचनात्मक मूल्यांकन भी किया गया था। लेकिन तमाम प्रयासों व सीख के बाद भी यह योजना दम तोड़ने लगी है।