तेरहवें वित्त आयोग द्वारा उत्तराखंड की विधानसभा हेतु 88 करोड़ रुपया स्वीकृत किये जाने के बाद गैरसैंण में विधानसभा भवन बनाये जाने की माँग जोर पकड़ रही है। हालाँकि काँग्रेस में सांसद सतपाल महाराज के अलावा कोई बड़ा नेता इस माँग से नहीं जुड़ सका है। भाजपा ने तो इस मुद्दे पर पूरी तरह मौन साध लिया है। उक्रांद इस चिन्ता से कि यह मुद्दा कहीं काँग्रेस उससे झपट न ले, सतपाल महाराज की मंशा पर सवाल उठा रही है। बसपा ने अपने पत्ते नहीं खोले हैं तो सपा देहरादून में विधानसभा बनाने के पक्ष में है। आन्दोलनकारी ताकतें व उत्तराखंड परिवर्तन पार्टी व लोकवाहिनी जैसे दल तो गैरसैण की मांग पर अडिग हैं ही।
राज्य गठन से एक दशक पहले ही गैरसैण पर आम सहमति थी। सन 1994 में उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा गठित रमाशंकर कौशिक की अध्यक्षता वाली मंत्रिमंडलीय समिति की रिपोर्ट में भी यह जनभावना प्रतिध्वनित हुई। तब राजनीतिक लाभ के लिये सन् 1991 में तत्कालीन भारतीय जनता पार्टी की सरकार ने गैरसैंण में अपर शिक्षा निदेशालय खोलने की खानापूरी की। अपर शिक्षा निदेशक की कुछ बैठकें भी यहाँ आयोजित हुईं, किन्तु सहायक निदेशक श्री भट्ट को दो साल का वेतन तक तत्कालीन राज्यपाल मोतीलाल बोरा के हस्तक्षेप पर ही मिल पाया। फिर उस ड्रामा पर वहीं पटाक्षेप हो गया। अपर शिक्षा निदेशक (पर्वतीय) के नाम पर कोई गैरसैंण नहीं आया। गैरसैण में उत्तराखण्ड सचिवालय हेतु भी चमोली के तत्कालीन जिलाधिकारी चन्द्र सिंह की अध्यक्षता में बनी एक समिति के द्वारा सर्वेक्षण कराया गया, जिसके लिये 7 लाख रुपए की टोकन मनी दी गई। सर्वेक्षण का क्या नतीजा निकला, इसकी जानकारी नहीं है।
राज्य गठन से ऐन पहले 23 सितम्बर 2000 को उतराखण्ड महिला मंच द्वारा गैरसैण राजधानी की माँग पर आयोजित रैली ऐतिहासिक थी। बी.बी.सी. के अनुसार उस दिन गैरसैण में 10 हजार आन्दोलनकारी एकत्र हुए थे। बाबा मोहन उत्तराखण्डी ने गैरसैण को राजधानी बनाए जाने के लिए अनेक अनशन किए। आखिरी बार 8 अगस्त 2004 को बेनीताल में अनशन के 38वें दिन उन्हें जबरन उठाया गया और 9 अगस्त की प्रातः वे सामुदायिक स्वास्थ्य केन्द्र कर्णप्रयाग में संदेहास्पद हालत में मृत पाए गए। काँग्रेस की नारायण दत्त तिवारी सरकार ने इस मामले को रफा-दफा कर दिया। 15 सितम्बर 04 से 1 अक्टूबर 04 तक उत्तराखंड समन्वय समिति ने गैरसैण राजधानी की माँग पर धरना दिया तो 2 अक्टूबर 04 से उत्तराखंड महिला मंच ने 67 दिन का आमरण अनशन किया। गैरसैण-देहरादून तथा गैरसैण-बागेश्वर पद यात्रायें भी उत्तराखंड समन्वय समिति ने कीं। उक्रांद ने भी कम से कम आधा दर्जन रैलियाँ गैरसैण में कीं। लेकिन झूठ का पुलिन्दा बनी दीक्षित आयोग की रिपोर्ट ने जनता की इस माँग को बेशर्मी से दरकिनार कर दिया। ![]()
विधान सभा गैरसैण में बनाने की माँग के पीछे सांसद सतपाल महाराज समर कैपिटल का तर्क देते हैं। कहना चाहिए कि वे देहरादून से राजधानी हटाने की माँग नहीं कर रहे। दूसरे सांसद प्रदीप टम्टा गैरसैण का राग अलापते हैं, लेकिन पार्टी में सहमति बनाने के प्रयास शायद वे प्रारम्भ ही नहीं कर पाये हैं। दरअसल इन दलों के लिये जनभावनाओं का कोई स्थान ही नहीं है।
12 वें वित्त आयोग द्वारा राजधानी के लिये मिला एक अरब रुपया लैप्स होने के बाद भी राजनेता इस मुद्दे पर तदर्थ रुख अपनाये हुए हैं। कहीं ऐसा न हो कि इस बार भी निशंक की सरकार जनता की माँग को टालना जारी रखे और यह धनराशि पुनः लैप्स हो जाये। या माफिया, अफसरशाहों और निहित स्वार्थों के दबाव में गुपचुप ढंग से देहरादून में ही विधान भवन बना दिया जाये। हालाँकि उत्तराखंड की जनता यह विश्वासघात बर्दाश्त कर लेगी, ऐसा नहीं लगता।



























प्रदेश का नेतृत्व कर रहे लोगों की भी तो आप मजबूरी समझिये, आलाकमान, संघ परिवार और कोर नेतृत्व और पता नहीं कहां-कहां से उनको अनुमति लेनी पड़ती है। आप भी………………….. अब ऐसा जो क्या होता है कि जनता की सुनो, उसके मन की करो……………..जिसने नेता बनाया है, मुख्यमंत्री बनाया है, उससी पूछेंगे ना, वो जो बतायेगा वह करेंगे। जनता तो रोज ही कुछ न कुछ नया मांगती रहती है, सरकार कहां तक दे? कितन दे? और ये जनवादी मंच कर भी क्या लेंगे, आके एक-दो दिन हंगामा करेंगे फिर चले जायेगें, क्योंकि सरकार को मालूम है कि इनकी जेब में इतना पैसा नहीं है कि १०० लोगों को भी देहरादून में ५ दिन रुकवा सकें। तो फिर ………..आप भी असनोड़ा जी।