सुनीता भास्कर
औली व दून में सम्पन्न हुए साउथ एशियन फेडरेशन गेम्स (सैफ) अपने साथ कई उपलब्धियाँ लेकर आये तो अपने पीछे कई सवाल भी छोड़ गये। सात देशों के खिलाड़ियों की मौजूदगी ने खेलों को यादगार बनाया, तो व्यवस्थाओं ने शिशु राज्य की अपरिपक्वता को जगजाहिर किया। तीस साल की मेहनत से औली को अंतर्राष्ट्रीय मानचित्र पर लाने वाले गढ़वाल मंडल विकास निगम को ऐन वक्त पर खेलों से दूर कर दिया गया। आयोजन से प्रदेश के लोगों को तो छोड़िये, जोशीमठ व दून की जनता तक को दूर रखा गया। खेलों को शत-प्रतिशत फंडिंग कर रही केंद्र सरकार ने अन्त समय में खुद को इससे अलग कर लिया। दून की प्रतिस्पर्धाओं का शुभारंभ तत्कालीन खेल मंत्री एम.एस. गिल को करना था और औली की प्रतिस्पर्धाओं का योजना आयोग के उपाध्यक्ष मोन्टेक सिंह अहलूवालिया को। लेकिन दोनों नहीं आये। उत्सवधर्मी मुख्यमंत्री ने ही दोनों जगह इन प्रतिस्पर्धाओं को हरी झंडी दिखाई। दून में उद्घाटन के दौरान कुछ क्षणों के लिये केन्द्रीय युवा कल्याण राज्यमंत्री प्रतीक पाटिल ने अवश्य औपचारिकता के लिये उपस्थिति दर्ज कराई। सैफ खेलों के ‘सेफ’ होने की कहानी आने वाले दिनों में ही जगजाहिर होगी, लेकिन लोग सैफ को स्टर्डिया, कुम्भ व आपदा के घोटालों की धारावाहिक कड़ी में शामिल कर चुके हैं।
दून में दस से तेरह व औली में चौदह से सोलह जनवरी को सैफ खेल सम्पन्न हुए। यह अन्तर्राष्ट्रीय आयोजन प्रदेशवासियों के लिये अपार गौरव का क्षण था। स्थानीय लोगों ने औली में खूबसूरत लोकनृत्यों की छटा बिखेरी। दून में देश के विभिन्न प्रान्तों से आये कलाकारों ने कार्यक्रम पेश किये। दून में बनी एशिया की पहली आइस रिंक में आइस स्केटिंग, फिगर डांसिंग के करतब व आइस हॉकी का रोमांच दिखा तो वहीं औली की बर्फीली ढलानों में सात देशों के स्कीयरों की दौड़ का। दोनों जगह भारत ने सर्वाधिक गोल्ड झटके। आइस रिंक पर दूसरी टीमों के नौसिखिया होने से भारत की एकतरफा जीत तय थी, लेकिन औली में पाकिस्तानी भारत को काँटे की टक्कर देकर दूसरे स्थान पर काबिज हुआ। पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर से आये पहाड़ी खिलाड़ियों को यहाँ खेलते देखना, अजूबे सरीखा था। सबसे रोचक बात थी, पाकिस्तान के अधिकतर खिलाड़ियों का एक ही परिवार से होना। तीन भाई, दो बहनें व एक कोच के साथ उनकी बेटी इन खेलों में शामिल थे। भारत की ओर से प्रीति डिमरी व वन्दना पवार ने पदक जीतकर उत्तराखंड का मान बढ़ाया। लेकिन सबसे शानदार प्रदर्शन लद्दाख के खिलाड़ियों ने किया। भारतीय सीमान्त के इन खिलाड़ियों की टक्कर का पूरे देश में कोई नहीं। कनाडा सरकार की मदद से यहाँ के युवाओं ने पिछले डेढ़-दो दशक में यह मुकाम हासिल कर दिखाया है। आइस हॉकी और स्कीइंग में इनके प्रदर्शन के संबंध में जब उनसे पूछा गया तो इनका भोला सा जवाब था- हमारे ऊँचे पहाड़ों में और दूसरे खेल तो हो नहीं सकते। इसीलिये हमने इन खेलों को अपना लक्ष्य बना लिया। यही हमारी रोजी भी है और यही हमें देश-विदेश में पहचान दिलाने का जरिया भी। पुरुषों की तरह ही, लद्दाखी बालायें भी साहसिक खेलों में उल्लेखनीय प्रदर्शन कर रही हैं। इन लद्दाखियों में से आधा दर्जन से अधिक यूरोपीय व अमरीकी देशों में खेल चुके हैं। इन्हीं हिमवीरों में से एक चौबटिया का अमित बेलवाल भी था। वे आइस हॉकी की नेशनल प्रतिस्पर्धाओं व इंटरनेशनल के डमी मैचों में सर्वाधिक गोल दागने वाले खिलाड़ी थे। उनके पिता नौकरी की तलाश में भटकते हुए कभी लद्दाख पहुँचे, जहाँ अभी भी वे एक प्राइवेट स्कूल में पढ़ाते हैं।
भारत, पाकिस्तान के बाद तीसरे स्थान पर रहे श्रीलंकाई, हालाँकि बर्फ से इस देश का कोई वास्ता नहीं है। लेकिन बोर्डस्कीइंग में श्रीलंका की एक महिला खिलाड़ी गोल्ड में कब्जा करने में कामियाब रही। नेपाल, बांग्लादेश, भूटान व मालदीव पदकों में अपना खाता नहीं खोल पाये।
उत्तराखंड के लिये ये खेल निराशाजनक रहे। यह खेल हमारी पहचान व भविष्य से जुड़ा है। सैफ खेलों में मीडिया के प्रचार से एक हद तक कुछ ध्यान भी आकर्षित किया। लेकिन बार-बार टलते रहने से इस मौके का फायदा नहीं उठाया जा सका। आयोजकों की संकीर्ण दृष्टि नकद धनराशि पर लगी थी, लेकिन उस धनराशि की ओर उनका ध्यान नहीं था, जो आने वाले दिनों में यहाँ के युवाओं को रोजगार के रूप में मिल सकता है। स्पर्धायें देखने दूर-दूर से जोशीमठ पहुँचे पर्यटकों को रोपवे में जगह न मिलने से हताश लौटना पड़ा। स्थानीय लोग भी सीमित संख्या में ही पहुँच पाये, क्योंकि खिलाड़ियों, अधिकारियों व मीडियाकर्मियों का ऊपर पहुँचना जरूरी था। लंबे समय से इस आयोजन का इन्तजार कर रहे स्थानीय लोगों का धैर्य आखिरकार जवाब दे गया। रोपवे के स्टार्टिंग पॉइंट पर प्रमुख सचिव राकेश शर्मा व सरकार का पुतला फूँका गया। दिन भर लोग नारेबाजी करते रहे। इसे बदइंतजामी की इंतहा ही कहेंगे कि 2005 से चल रही तैयारियों के बावजूद रोपवे की क्षमता नहीं बढ़ाई जा सकी। 25 लोगों को एक बार में ढो सकने वाली ट्रॉली को आयोजन के दिनों में दिन भर में 800 लोग ढोने पड़े। इससे ट्रॉली में खराबियाँ आना स्वाभाविक था। एक बार तो वह बर्फवारी के बीच दो घंटे तक बीच मार्ग में अटक गई। जोशीमठ-औली सड़क पर बर्फबारी की संभावना के बावजूद स्नो कटर की व्यवस्था नहीं थी। सड़क बंद होने से सबसे अधिक फजीहत प्रेस फोटोग्राफर्स को झेलनी पड़ी। औली में शो-पीस बने मीडिया सेन्टर से एक भी फोटो सरक नहीं पा रहा था। सो, आयोजन के तुरंत बाद उन्हें तत्काल जोशीमठ रवाना होने की मजबूरी होती थी। रोपवे में लम्बी कतार होने पर घबराए फोटोग्राफर्स को 14 किमी का बर्फीला रास्ता तय कर जोशीमठ आना पड़ा। अगर औली में अच्छी क्षमता का वी-सेट लग जाता तो यह फजीहत नहीं होती। आयोजन के लिये जिम्मेदार ईवेंट मैनेजमेंट कम्पनी के सदस्य हिमालय का अनुभव न होने से ए.सी. रूम के भीतर दुबक गए। अपमानित होने के बावजूद अन्ततः जीएमवीएन के कर्मचारी ही यहाँ फिर संकटमोचक बने। सेना व आईटीबीपी भी संकट में फँसे लोगों के लिये मददगार साबित हुई। कड़कड़ाती ठंड में काम करना उत्तराखंड पुलिस की क्षमता के बाहर की बात थी।
लोक कलाकारों को दोयम मानने की मानसिकता यहाँ भी नहीं गई। बर्फ के बीच गाँवों से पहुँचे इन कलाकारों को आयोजकों ने चंद सिक्कों में टरका दिया, जबकि बॉलीवुड के गायक कैलाश खेर को बर्फीली वादियों में बार-बार हैलीकॉप्टर से सैर करवाने में सरकार को कोई फिजूलखर्ची महसूस नहीं हुई। जब जोशीमठ में खेर की ‘नाइट’ चल रही थी, तो लोगों ने नरेन नेगी, नरेन नेगी की डिमांड की। क्षेत्र के सांसद सतपाल महाराज समेत कांग्रेस के पाँच में से एक भी सांसद को कार्यक्रम में नहीं बुलाया। भाजपा के ही वरिष्ठ नेताओं तक को भुला दिया गया। इन खेलों की तैयारियों में लम्बे समय से जुड़े रहे बद्रीनाथ के विधायक केदार सिंह फोनिया को घुसपैठिया माना गया। खेल मंत्री खजान दास व पर्यटन मंत्री मदन कौशिक सीएम के ही टोकन के रूप में ही दिखे। अलबत्ता दून में राज्यपाल मारग्रेट आल्वा खुद को आने से नहीं रोक सकीं। वे आईं तो वीआईपी बनकर नहीं रहीं। उन्होंने खिलाड़ियों से खेल व समस्याओं पर बात की व पर्याप्त समय एरीना में बिताया। लेकिन सरप्राइज एंट्री देने वाली महामहिम को देखकर मंचासीन लोगों की छाती पर साँप लोट गये। वह हास्यास्पद दृश्य तो कोई नहीं भूल सकता, जब कृषि मंत्री त्रिवेन्द्र सिंह रावत, फ्रंटलाइन में बैठने को जूझ रहे थे, जहाँ पहले ही दूसरे वीआईपी ठुँसे पड़े थे। जबकि अन्तिम पंक्ति में नगर के प्रथम नागरिक मेयर विनोद चमोली अकेले बैठे तमाशा देख रहे थे।
औली में 31 दिसम्बर को हुई बर्फबारी ने आयोजकों की काली करतूतों को ढँकने का काम किया। 14 जनवरी की रात हुई भारी बर्फबारी ने तो सारा इतिहास दफन कर डाला। 16 जनवरी को खेल समाप्ति के ठीक बाद आयोजन के कर्णधार पूर्व आई.ए.एस. सुरेन्द्र सिंह पांगती ने आर्गेनाइजिंग टीम से इस्तीफा दे दिया। उन्हीं के प्रयासों से ही विदेशी टीमें और अन्तर्राष्ट्रीय ख्याति के निर्णायक यहाँ आये थे। शायद पांगती को सैफ खेलों से पहले ही हट जाना चाहिए था, लेकिन वे लम्बे समय से सैफ का सपना देख रहे थे। चमोली में अपनी सरकारी सेवा के प्रारम्भिक दौर से ही वे औली के विकास व स्थानीय युवाओं के लिये रोजगार का जरिया तलाशने के प्रयासों में जुटे रहे थे। विंटर गेम्स फेडरेशन के अध्यक्ष बनने के बाद वे सैफ को भारत व फिर उत्तराखंड में कराने की लाबीइंग में रहे। तत्कालीन एन.डी. तिवारी सरकार ने फंड देने में असमर्थता जताई तो केंद्र से 110 करोड़ रुपये की जुगत करने वाले भी वही थे। उनकी लगन देख एनडी भी मुहिम में शामिल हो गये। लेकिन 2007 में खंडूरी के मुख्यमंत्री बनने के बाद लगातार तीन आचार संहिताओं से कामकाज प्रभावित रहे। फिर निशंक गद्दी पर सवार हुए। तीन मुख्यमंत्रियों के बदलने के साथ, तीन बार खेल भी टले। मगर पांगती ने अकेले सैफ के झंडे को बुलंदी से उठाये रखा और तमाम लालफीताशाही के बीच इन्फ्रास्ट्रक्चर कार्य को आगे बढ़ाने में कामयाब रहे। डबल्यू.जी.एफ.आई से छीनकर सारे वित्तीय अधिकार प्रमुख सचिव राकेश शर्मा को दे दिये गये, जिन्होंने जी.एम.वी.एन. से औली की व्यवस्थायें छीनकर मुंबई की एक निजी इवेंट कम्पनी को दे दी। शर्मा मानते हैं कि जीएमवीएन वाले अंतर्राष्ट्रीय आयोजन कराने लायक प्रोफेशनल नहीं हैं। बताया जा रहा है कि 16 जनवरी की रात से ही पांगती ने खुद को अपने कमरे में तनहा कर लिया। यह हलाहल वह शिव की तरह पी जाना चाहते थे। औली में आईटीबीपी के साथ 6 नेशनल चैम्पियनशिप सफलता पूर्वक आयोजित कर चुके निगम के बचाव में कोई नहीं आया। वही हश्र स्थानीय लोगों का हुआ। बहरहाल सैफ खेलों का शुभंकर बना दिये गये नेचुरल स्कीयर भरल को इस बात की बेहद खुशी है कि उसने खेलों में भागीदारी न कर अपना दामन बचा लिया।