पहाड़ों से उतरती नदियाँ भाबर में सिंचाई के लिये नहरों में बँध जाती हैं। बरसात में ये नदियाँ बाढ़ के साथ रेता-बजरी का पुनर्भरण कर देती हैं। कोसी, दाबका, गौला, सूखी (नन्धौर) नदियों का बहुत बड़ा क्षेत्र रेता, बजरी, पत्थर चुगान के लिये वर्ष में 6 माह खुलता है। इस दौरान लाखों टन रेता, बजरी, पत्थर की निकासी होती है। वन महकमे को भारी राजस्व मिलता है। पिछले अनेक बरसों से इन नदियों में हो रहे खनन ने इस क्षेत्र को भारी रोजगार दिया।
पिछले 20 वर्षों में भाबर का नक्शा तेजी से बदला है। खेती की जमीन प्लाट-कॉलोनियों में तब्दील होकर नये विस्तार के साथ नदियों के किनारे बसे इन शहरों में बेतरतीब नई बसासत एवं पैसा लेकर आयी। एक के बाद एक क्रशर खुलते गये। ट्रैक्टरों, डम्परों, ट्रकों ने देखते-देखते इस क्षेत्र को उत्तराखण्ड के रूहर (जर्मनी का कोयला खदान क्षेत्र) प्रदेश में तब्दील कर दिया है।
आज मात्र गौला नदी में ही दस निकासी गेट हैं, जिनमें लगभग 15 हजार तक वाहन खनन कार्य में जुटे हैं। दर्जनों स्टोन क्रशर रेत, बजरी, पत्थर को विभिन्न आकारों में छान-तोड़कर उत्तर प्रदेश को भेजते हैं। यहाँ का यह उप खनिज निचली जगहों की बनिस्बत उत्तम कोटि का है, जिससे इसकी माँग लगातार बनी रहती है। खदान कार्य में गौला नदी में लगे मजदूरों की संख्या 15 हजार से भी ऊपर होती है। ट्रक ड्राइवरों की संख्या लगभग बारह हजार और इतने ही डम्पर, ट्रक, ट्रैक्टर मालिक, क्रशर कर्मी, वन विभाग के कारिंदे, काँटा-तौल के लोग प्रत्यक्षतः इस कार्य से जुटे हैं। इसके अलावा दुकानदार, कलारिये, अवैध शराब विक्रेता, मीट व्यवसायी, मकान देने वाले किरायाजीवी, ट्रक-ट्रैक्टर मिस्त्री और बुग्गी घोड़ा चालकों के लगभग 1,000 परिवार। देखा जाये तो केवल गौला नदी के दस गेटों पर भाबर की 60-70 हजार की आबादी स्थायी-अस्थायी रोजगार पाती है। इसके अलावा दीगर महकमों के अधिकारियों, क्षेत्रीय नेताओं, माफियाओं, छुटभैये कारोबारी टाईप दलालों का एक कॉकस तंत्र है, जो इस क्षेत्र की खबरों को मामूली सूचना में बदल देते हैं।
पैसे रोजगार और उद्योग के इस धूसरित सेक्टर ने उत्तराखण्ड के नदी उद्योग को भारी ताकतवर उद्योग में बदला है। क्रशर लॉबी इतनी मजबूत है कि क्षेत्रीय राजनैतिक ताकतें उनके हितों के लिये येन-केन प्रकारेण राज्य मशीनरी से रास्ता प्रशस्त करवा ही देती है। क्रशरों के लिये अनापत्ति प्रमाण पत्र जारी करने पर ग्रामीणों की ओर से भारी विरोध होता है। खनन पट्टों को लेकर तनातनी बनी रहती है। क्रशरों द्वारा फैलाये जा रहे प्रदूषण पर आये दिन हल्ला होता है। रेता-पत्थर आदि के बड़े-बड़े, पहाड़ जैसे स्टॉक खड़े हैं, जिन पर छापे आदि की कार्रवाहियाँ होती हैं, पर फैसला क्रशर मालिकों और खनन उद्योग से जुड़े लोगों के हक में ही हो जाता है। विरोध की आवाजें क्रशरों की गडगडाहट में, ट्रेक्टरों-डंपरों के काँपते, गुर्राते इंजनों कीं धूल-गर्द में दब जाती हैं। चूँकि मामला काश्तकारों के हितों से जुड़ा होता है और भारी रोजगार प्रदान करता है, सो झख मारकर वहीं पर फैसला होता है, जहाँ पर होना होता है। परेशानियाँ हैं, पर परेशान लोगों की तादाद से ज्यादा इस रोजगार से जुड़े लोगों की है। इसलिये परेशान लोग अपनी स्वास्थ्य संबंधी परेशानियों को ताक पर रखे हुए हैं। आने-जाने के रास्ते संकरे हैं, बरसातों में गड्ढे कीचड़ से भरे रहते हैं। स्टोन क्रशर के पास प्राइमरी स्कूल है, गाँव घरों की बसासत है, घर धूल-गर्द से सने हैं। स्टोन क्रशर के इर्द-गिर्द आबाद काश्तकार सब झेलते हुए अभिशप्त और उदासीन हैं।
गौला नदी में चुगान (खनन की यही परिभाषा है) मानकों के अनुसार 4 फुट से ज्यादा नहीं खोदा जा सकता है। मगर गौला में खान लगाने वालों को 4 फुट में पड़ता नहीं आता है। सो खदान 40 से 70 फुट गहरी हो चुकी हैं। प्रतिबंधित क्षेत्र में खनन करते पाये जाने पर डम्पर-ट्रैक्टर सीज कर दिया जाता है, पर नगद पैसा हो तो काम मौके पर ही बन जाता है। गौला नदी के दोनो किनारे अब 80-80 फुट ऊँचे हो चुके हैं। यह वहशियाना दोहन अब नियंत्रित दोहन में तो बदल नहीं सकता। अगर ऐसा हुआ या होगा तो पहले दिक्कत खनन मजदूरों या डम्पर-ट्रैक्टर ड्राइवरों को आयेगी, मालिकों तक तो बाद में पहुँचेगी। इसलिये गौला गेट खुलने में जरा सी देरी होने पर विरोध प्रदर्शन शुरू हो जाते हैं। क्षेत्रीय विधायक, सांसद, प्रदेश सरकार, केन्द्र सरकार के बीच मशक्कत शुरू हो जाती है और बात वहीं पर जाकर सुलटती है जहाँ पर क्रशर लॉबी और क्षेत्रीय दबंग चाहते हैं। वन महकमा राजस्व से इतर भी खूब आय बटोरता है सो वह अपने प्रबंध तंत्र को उतना ही चुस्त रखता है जितना कि उसको सेवाओं की एवज में करना चाहिये।
क्रशर मालिकों के प्लांट से बाहर स्टॉक जमा किया जाता है, बीघे-दो बीघे के खेत से जहाँ साल भर में आठ-दस हजार की फसल होती थी, क्रशर मालिकों ने जमीन मालिकों को 6 माह के लिये साठ-सत्तर हजार देकर वहाँ पत्थर, रेता, दाना स्टॉक करना शुरू कर दिया। जमीन मालिकों ने खेती की जमीनें खुशी-खुशी स्टॉक हेतु दे दीं। पर स्टॉक उठने के बाद अब वे खेत बेकार हो गये हैं। खेती की जहमत उठाने के बजाय काश्तकारों ने उन जमीनों को या किराये की आस में यों ही छोड़ दिया है, या उन्हें बिकाऊ कर दिया है। या फिर वे सोचते हैं कि खुद का स्टॉक करेंगे और बाद में रेट बढ़ने पर मुनाफा कमाएँगे। इस तरह भाबर में सैकड़ों एकड़ फसली जमीनें रेतीली और ऊसर होकर बेकार पड़ी हैं.
हालाँकि नियम और नीतियाँ कागजों में साफ-साफ लिखी गये हैं। क्रशर किस क्षेत्र में स्थापित होगा, प्रदूषण के मानक क्या होंगे, स्कूल-गाँव आदि से कितनी दूरी पर होगा, क्रशर कब से कब तक चलेगा, उत्पादन की सीमा क्या होगी, कितना स्टॉक रखा जायेगा और स्टॉक कहाँ रखा जायेगा, कितनी अतिरिक्त भूमि की आवश्यकता होगी आदि। ये बातें अखबारों की सुर्खियाँ बनती है कि फलाँ क्रशर के फलाँ स्टॉक और फलाँ उल्लंघन पर कार्यवाही। पर मामला वहीं बना रहता है, जमीं पर हालात नहीं बदलते। अलबत्ता तब तक विभागों की कवायद और रहस्यमय चुप्पी के बीच वही होता है, जिसके कयास इस कारोबार से जुड़े लोग लगाते हैं।
भाबर क्षेत्र में इन दिनों क्रशरों की विकास गाथा आपको गौला गेट के किनारे बसे गाँवों में पैदल अथवा मोटर साइकिल से घूमने पर दिख जायेगी। जीवंत फोटो भी मिल जायेंगे। चाहे आप गौला नदी में उतर कर देख लें। धूसरित रास्तों, घरों-खेतों में खड़े डम्पर-ट्रेक्टर….. उदास चटे से गाँव…… मानो धूल से बने हों, आपको दिख जायेंगे। कदरन वे गाँव जहाँ खेती किसानी अभी भी है…..ज्यादातर गौलापार के गाँव व रामनगर क्षेत्र के गाँव। आपको लगेगा कि खाँटी खेती-किसानी पर हैं। यहाँ पर अभी जमीनों की छोटे स्तर पर प्लौटिंग नहीं हुई है, क्योंकि गौला नदी से जुड़े गाँवों से बरेली रोड व रामपुर रोड के अधिकांश काश्तकारों ने जमीनों में फीते लगा (जमीन बेचने को स्थानीय लोग यही कहते हैं) दिये हैं। यह पैसा उन्होंने दूरस्थ जगहों पर खेती की जमीन खरीदने में निवेश किया है। खटीमा, कालाढूंगी, बाजपुर, काशीपुर में यही पैसा निवेश कर 2, 3, 4 एकड़ जमींन जोड़ी हैं। यहाँ के काश्तकारों ने जमीनें बेच डम्पर खरीदे, दुकानें खरीदीं, बाहर जमीनें जोड़ीं, पुराने घरों की मरम्मत कराकर धनियाँ-सब्जियों की क्यारियों की जगह लॉन (मखमली दूब) लगाकर सुविधाजनक मकान बना लिये हैं। अब वे बची खेती को साझेदारी बटाई में देकर बाकी जमीन के ग्राहक ढूँढ रहे हैं।
गौला व अन्य नदियों ने भाबर क्षेत्र में रेता-बजरी पत्थर का जो बड़ा उद्योग खड़ा किया है, वह भाबर को ही धीरे-धीरे खा रहा है। एक अनियंत्रित और अराजक शहर के रूप में बढ़ता हल्द्वानी इसकी मिसाल है। यह उद्योग लंबा चले, नियंत्रित ढंग से चले तो मौजूदा बुनियादी ढाँचे में काफी परिवर्तन लाने पड़ेंगे। हल्द्वानी से लेकर लालकुआँ तक इनर गौला रोड विकसित करनी होगी। सड़कें बनानी होंगी। खनन उद्योग में जन भागीदारी से रास्ते निकालने होंगे, जो थोड़े बहुत प्रयासों से निकाले जा सकते हैं। पर हर उद्योग, चाहे वह कहीं भी लगे, अपने पीछे लाजिम तबाहियाँ लेकर आता है और जब ढहता है तो स्थितियों को और बुरे हाल में छोड़ जाता हैं। फिलहाल हालात तो यह हैं कि बर्बादी भी है और रोजगार भी….