‘‘ये नैनीताल में ‘थर्टी फर्स्ट’ क्यों मनाया जाता है ?’’
‘‘नैनीताल पयर्टक नगरी है, पर्यटन यहाँ का मुख्य धंधा है। इससे शहर की खुशहाली जुड़ी है। अतिथि सत्कार यहाँ की परम्परा है।’’
‘‘थर्टी फर्स्ट में कैसे-कैसे अतिथि आते हैं, तुम जानते ही हो। खाओ पियो, ऐश करो और अंग्रेजी में गाली दो, ये हमारी संस्कृति नहीं है। हमें तो तब सुकून मिलता है जब माल रोड भले ही सूनी हो, पर ताल लबालब होना चाहिए।’’
‘‘पर्यटन व्यवसाय में तुम अतिथि से कुछ नहीं कह सकते। अतिथि चाहे सुबह आ कर शाम को जाने वाला हो या कुछ दिन रुककर प्रशासन चलाने वाला हो या फिर पाँच साल तक रुकने वाला हो। ‘अतिथि देवो भव’ वेद वाक्य ही नहीं सरकारी वाक्य भी है।’’
‘‘वेदों में तो थर्टी फर्स्ट का कोई जिक्र नहीं हैं।’’
‘‘तुम समझे नहीं। मतलब अतिथि की हर इच्छा पूरी करो और उससे ज्यादा से ज्यादा वसूलने की कोशिश करो। इन दो-चार दिनों में जितना कमा सकते हो कमा लो। वरना जिस वेद में अतिथि देवो भव लिखा है उसी में यह भी लिखा है ‘जो आया है सो जायेगा’। तो फिर वेदों के हिसाब से थर्टी फर्स्ट मनाने में क्या हर्ज है। स्पीकर लगते ही सबसे पहले माँ नैना देवी की वंदना होनी चाहिये। फिर शगुन आँखर, मांगल गीत होने चाहिये। छोलिया, चाँचरी की धूम होनी चाहिये लेकिन होता है फूहड़पना।’’
‘‘आयोजक लाखों खर्च करके पर्यटकों को लुभाने की कोशिश करते हैं और तुम इसे फुहड़पना कहते हो।’’
‘‘लेकिन इसके आयोजक हैं कौन ? ये गये साल को विदाई देते हैं या नये साल का स्वागत करते हैं। क्या ये सब किया जाना जरूरी है।’’
‘‘बहुत जरूरी है। लेकिन तुम जैसे नये साल की पहली सुबह बासी मीट-मुर्गा खाने वाले लोग इसे नहीं समझ पायेंगे। तुम्हें तो आयोजकों का शुक्रगुजार होना चाहिये। ऐसे घनघोर ऑफ सीजन में अपने पैसे लगा कर वे तुम्हारे लिये रोजगार लाते हैं।’’
‘‘लेकिन ये कैसी संस्कृति हमारे सामने रख रहे हैं। थर्टी फर्स्ट के नाम पर छोटे-छोटे बच्चे शराब पीने लगे हैं। मुन्नी बदनाम, शीला जवान, जलेबीबाई….. क्या ये सुनाने के लिये ही स्पीकर लगाये जाते हैं ? ये गाने आयोजकों की पसंद है या पर्यटकों की या फिर उस आदमी की पसंद है जो सीडी प्लेयर चला रहा है ?’’
‘‘तो तुम क्या चाहते हो यहाँ झोड़ा, छपेली बजाया जाये ? पीजा, बर्गर की जगह चुड़काणी-जौला परोसा जाये ? विकास का रास्ता पाश्चात्य संस्कृति से जुड़ा है। आगे बढ़ना है तो विकास की संस्कृति के सुर में सुर मिलाओ।’’
‘‘क्या है तुम्हारी संस्कृति ? ‘बबली तेरो मोबाइल’ या छत्तीस जेवर पहनकर घाघरे पिछोड़े में घास काटती ‘साली’ या फिर टोपी पहले, हाथ में छाता लिये मक्खीकट मूछ वाला कार्टून टाइप ‘जीजा’ ? ये शहर उसी दिन से संस्कृतिविहीन हो गया था जिस दिन से हम पहाड़ी में बोलने से शर्माने लगे थे।’’
‘‘तुम सबके लिये ऐसा नहीं कह सकते हो। हर आदमी की सोच अलग है। कई लोग हमेशा संस्कृति को आगे बढ़ाने के सपने देखते हैं।’’
‘‘सपने देखने के लिये सोना जरूरी होता है। बस आँखें मूँद कर इंतजार करो। लेकिन तुम लोग जागते हुए सपने देखना चाहते हो। चलो अब सो जाओ।’’
‘‘ओके गुड नाइट।’’ ‘‘गुड नाइट एंड स्वीट ड्रीम्स।’’ उसने लिहाफ ओढ़ा और अपनी पसंद वाला नव संवत्सर का थर्टी फर्स्ट देखने लगा।