नदी का सम्बन्ध पानी से है और रहिमन पानी राखिये बिन पानी सब सून…….से लेकर तीसरे विश्व युद्ध के पानी के लिए लड़े जाने की आशंकाओं तक पानी की अहमियत जगजाहिर है। पानी जीवन आधारक बुनियादी संसाधन है। पानी के भीतर सूक्ष्म जीवन अंकुरित होता है……कालान्तर में पुष्पित पल्लवित होती है एक पूरी खाद्य-श्रंखला। पानी स्वयं में एक पोषक तत्व तो है ही, साथ ही साथ यह शरीर के लिए आवश्यक पोषक तत्वों के वहन का काम भी करता है। किन्तु दुनिया का दो-तिहाई हिस्सा पानी होने के बावजूद मानव उपयोगी पानी कुल पानी का तीन फीसदी ही है और जो जल स्रोतों में उपलब्ध है वह मात्र दशमलव छः प्रतिशत है। तमाम-तमाम नदियों, गाड़-गधेरों और झीलों-तालाबों आदि के रूप में उपलब्ध पानी, समग्र जल-राशि को एक गैलन मान लिए जाने पर, महज आधा चम्मच के बराबर है।
सब जानते हैं कि इसी जीवन आधारक जल की उपलब्धता के आधार पर ही सभ्यताएँ नदियों के निकट अंकुरित हुईं। किन्तु सभ्यताओं एवं तथाकथित विकास के बढ़ते कदमों के साथ पानी अब स्वयं संकट में है। नदियों का घटता जल प्रवाह, प्रदूषित नदियाँ, विलुप्त हो गये धारे-नौले, सूखते गाड़-गधेरे आदि सब इस संकट के संकेत हैं और दस-पन्द्रह रुपये लीटर बिकता बोतल बन्द पानी इस संकट का प्रतीक चिन्ह।
नदी एक प्रवाह का नाम है। शायद इसीलिए कहा भी जाता है कि एक नदी में दो बार नहाया नहीं जा सकता। पानी की विशाल मात्रा का यह प्रवाह अपने आप में एक बड़ी ताकत है. ….थोड़ी ऊँचाई से गिराओ तो थोड़ी ऊर्जा, घराट चलाने लायक……ज्यादा ऊँचाई से गिराओ तो सैकड़ों-हजारों मैगावाट। जितना बड़ा सच यह है कि बाँध… नहर…. गूल… सिंचाई…. खाद्यान्न सब गाड़-गधेरों-नदियों के जाल की बदौलत है, उतना ही बड़ा और कड़ुवा सच यह भी है कि पूरे देश में यह जल संकट में है। अलग-अलग जगहों, क्षेत्रों में इस संकट की सूरतें जरूर अलग-अलग हो सकती हैं। नदियों का प्रदूषण, नदी जल वितरण को लेकर राष्ट्रों के बीच विवाद, नगर एवं ग्रामीण समुदायों में पेयजल का अभाव और उत्तराखण्डी ग्रामीण जनजीवन एवं जीविका पर उत्तरोत्तर घटते जल प्रवाह के कारण आसन्न संकट पानी पर संकट की ही कुछ तस्वीरें हैं।
गाड़-गधेरों और नदियों पर आसन्न इस संकट की आहट को उत्तराखण्डी समुदाय भी देख-समझ रहा है। लोगों, सामाजिक कार्यकर्ताओं एवं संगठनों का एक समूह इस संकट की आसन्नता एवं तत्सम्बन्धी खतरों को उत्तराखण्डी समाज के सामने रखने और समाधान की खोज में सक्रिय हुआ है। ऐसे स्वर एवं प्रयास उत्तराखण्ड के लिए नये नहीं हैं। जन-अभियानों/आंदोलनों की लगातार मौजूदगी इस क्षेत्र में रही है। जल, जंगल, जमीन और सर्वोपरि जन के लिए एक बेहतर कल की तलाश इस जमीन पर चले तमाम आन्दोलनों / अभियानों के मूल में है और उत्तराखण्ड राज्य की स्थापना को लेकर चला ऐतिहासिक आन्दोलन भी इन्हीं की परिणति था। उत्तराखण्ड में पानी के इस संकट को दो दिशाओं से साफ देखा जा सकता है- एक संकट हिमानी एवं गैर-हिमानी दोनों प्रकार की नदियों एवं गाड़-गधेरों के घटते जल प्रवाह की ओर से है और दूसरा बिजली बनाने और पानी को रुपयों में बदलने और तदनुसार उत्तराखण्ड को ‘ऊर्जा-प्रदेश’ बनाने के सरकारी ठेके के अन्तर्गत राज्य के भौगोलिक-भौतिक संरचना, पारिस्थितिकी, स्थानीय आर्थिकी एवं जीवन की परवाह किये बिना निर्माणाधीन एवं प्रस्तावित ऐसी मध्यम एवं बड़ी जल विद्युत परियोजनाओं की दिशा से, जिन्हें सुरंगों के माध्यम से काम करना है। सरकार एवं सरकारी योजनाकार जिन परियोजनाओं को उत्तराखण्ड को समृद्धिशाली बनाने का एकमात्र माध्यम मानते हैं, उनमें आबादी का बड़ा हिस्सा अपने जीवन के ध्वंस के सूत्र देखता है।
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17 जनवरी 2008 को रामनगर सम्मेलन में पारित प्रस्ताव व कार्यक्रम
1. जल, जंगल, जमीन को बचाने और संवर्द्धित करने का पुरुषार्थ ग्रामीण इस तरह |
मौजूदा सरकारी प्राथमिकताओं में ‘जन’ एवं ‘तंत्र’ आमने सामने खड़े हैं। इस कठिन परिस्थिति में उत्तराखण्डी मानस एक बार पुनः उद्वेलित है और उत्तराखण्ड की परम्परागत आत्मनिर्भर जीवन शैली को पीढ़ियों तक टिकाये रखने वाली जल संस्कृति को इस क्षेत्र के जन जीवन का आधार मानने वाले ग्रामीण समुदाय का एक हिस्सा एवं इस भूभाग के जल आधारित जीवन एवं संस्कृति की समझ रखने वाले सामाजिक कार्यकर्ता एवं संगठन चिंतन, हस्तक्षेप एवं समाधान की दिशा में सक्रिय हुए हैं। उफरैंखाल-प्रयोग एवं चार-पाँच वर्ष पूर्व से सोमेश्वर/बोरारौ क्षेत्र में चलाये जा रहे कोसी नदी बचाओ जैसे कुछ मॉडल सामने भी आये हैं। इसी पृष्ठभूमि में सामाजिक कार्यकर्ताओं एवं जन सरोकारों से सम्बन्धित संगठनों की पहल पर ‘जन’ की ओर से नदी बचाओ वर्ष: 2008 की लोक-घोषणा हुई और विविध नदी बचाओ अभियानों के अन्तर्गत एक से पन्द्रह जनवरी के मध्य उत्तराखण्ड की संकटग्रस्त नदियों, गाड़-गधेरों की ग्रामीण बसासतों एवं जन जीवन के मध्य सोलह नदी बचाओ अभियानों/जागरूकता-पदयात्राओं ने स्वरूप लिया। इन अभियानों के मूल में यही उम्मीद रही है कि जहाँ एक ओर ‘जन’ संकट की बेहतर समझ के आधार पर अपने लिये अपने स्तर पर सक्रिय हो, वहीं तंत्र जनता के बुनियादी मुद्दों से सम्बन्ध रखने वाली प्राथमिकताओं, ठोस नीतियों एवं ईमानदार प्रयासों के निर्धारण के प्रति गंभीर हो।
यह तमाम पदयात्राएँ रामनगर में 16 तथा 17 जनवरी के ‘जल-मिलन सम्मेलन’ में समाहित हुई। सम्मेलन स्थल पर जल-मिलन कलश में रखे उत्तराखण्ड की विभिन्न नदियों के संयुक्त जल को साक्षी रख कर विविध अभियान दलों ने अपने अनुभवों को जहाँ परस्पर बाँटा, वहीं उत्तराखण्ड की संकटग्रस्त नदियों, नदी-घाटियों एवं जीवन के दर्द एवं चिंता को पूरी तरलता के साथ अभिव्यक्ति मिली। तय पाया गया कि सम्मेलन के सहभागियों की कोशिश रहेगी कि ‘जन’ अपने संसाधनों को बचाने एवं संवर्धित करने के लिये प्रेरित हो ताकि संसाधनों पर जन-अधिकार एवं जन-प्रबंधन की अवधारणा की स्थापना हो, जल विद्युत परियोजनाओं से संकटग्रस्त क्षेत्रों एवं नदियों में उत्तराखण्ड स्तरीय पदयात्राओं एवं जन जागरण अभियानों का आयोजन हो। राज्य को सुरंग-बाँधों के निर्माण को बन्द करने सम्बन्धी लोकादेश दिया जाये तथा जल विद्युत परियोजनाओं, घटते जल-प्रवाह के खतरों और सरकार की तत्सम्बन्धी जन विरोधी नीतियों को लोगों तक खोल कर पहुँचाने के लिए सामग्री/साहित्य विकसित किया जाये। समग्रतः कोशिश रहेगी कि ‘जन’ इतना शक्तिशाली एवं जानकार बन कर सामने आये कि ‘तंत्र’ उसे छलने में स्वयं को असमर्थ पाये। उपस्थित सामाजिक कार्यकर्ताओं एवं संगठनों ने भविष्य में निरंतर विमर्श एवं तदनुसार सक्रियता का भी संकल्प लिया। नदी बचाओ अभियान का अनवरत मूल्यांकन भी इस एजेण्डे का हिस्सा था।
विविध नदी-अभियानों, जल मिलन सम्मेलन के दौरान के विमर्श एवं जन-सहभागिता के इस समग्र परिदृश्य में साफ महसूसा जा सकता था कि उत्तराखण्डी जन में नदियों के संकट के रास्ते जीवन पर आ रहे संकट एवं गलत सरकारी नीतियों के विरोध सम्बन्धी एक स्पंदन या एक अन्तर्धारा (अण्डरकरेंट) आकार ग्रहण कर रही है। आवश्यकता इसे एक दिशा देने, एक दबाव-समूह में बदलने या ‘सतत प्रवाहमान ऊर्जा’ में बदलने की है। स्वाभाविक रूप से यह जिम्मेदारी उन्हीं संगठनों एवं कार्यकर्ताओं की थी, जिन्होंने इसकी शुरूआत को आधार दिया था।
28 मार्च को उत्तराखण्ड के मुख्यमंत्री को तीन हजार हस्ताक्षरों से युक्त जनादेश सौंपने एवं अन्य गतिविधियों के बाद अप्रेल के अन्त में श्रीनगर (गढ़वाल) में कार्यकर्ता एवं संगठन एक विमर्श एवं मूल्यांकन हेतु एकत्र हुए। जनवरी से अब तक की समीक्षा में पाया गया कि नदी बचाओ अभियानों/पदयात्राओं के बाद ‘जन’ की दिशा से आ रहे प्रतिरोध को जल विद्युत परियोजनाओं से सम्बन्धित निजी निर्माण एजेंसीज ने महसूसा है और उनकी ओर से रोजगार के झूठे आश्वासनों और रुपये बाँट कर लोगों को एकजुट न होने देने की कोशिशें तेज हुई हैं। बाँधों हेतु जमीनों के अधिग्रहण के बदले भूस्वामियों को भले ही मुआवजा और पुनर्वास के आश्वासन मिले हों किन्तु इन जमीनों पर जीविका हेतु निर्भर हरिजनों के लिए न मुआवजा है न पुनर्वास। जल, जंगल और जमीन परियोजनाओं की भेंट चढ़ रहे हैं। ब्लास्टिंग के कारण जल-स्रोत सूखे हैं और लागों के सम्मुख जीविका और अस्तित्व का संकट गहराया है। जल-संवर्द्धन में महिलाओं की भागीदारी को बढ़ाने, कुछ गाड़-गधेरा के जलागम क्षेत्र में ‘चाल’ बनाने, जन सुनवाई द्वारा जनता के पक्ष को मजबूत करने सम्बन्धी प्रयासों के अतिरिक्त कुछ संगठनों ने निर्माणाधीन परियोजनाओं पर जनपक्षीय रपटें प्रस्तुत की हैं, नदी गीतों का कैसेट निकाला है, प्रभावित क्षेत्रों में अभियानों को तेज किया है और मीडिया के माध्यम से समस्या को प्रदेश-देश के स्तर पर लोगों के सामने रखने की कोशिश की है। समग्रतः बाँधों पर पुनर्विचार में लोगों की हिस्सेदारी, भविष्य में उत्तराखण्ड में बड़े बाँधों पर रोक, निर्माणाधीन परियोजनाओं की कमाई में प्रभावित लोगों की हिस्सेदारी, सुरंग-बाँधों पर रोक एवं प्रभावित जन-समुदाय की पूर्व सहमति के बिना परियोजना-प्रस्तावों तक पर रोक जैसी नीति एवं दृष्टि पर इस विमर्श मूल्यांकन में बल रहा।
नदी बचाओ वर्ष की घोषणा से श्रीनगर में आयोजित बैठक तक एक कमी निश्चिततः सामने आई है कि नदी बचाओ अभियान संकट से सीधे प्रभावित लोगों एवं क्षेत्रों से बाहर निकल कर, शेष देश-प्रदेश की बात तो अलग, सामान्य उत्तराखण्डी तक जन-संकट की इस परिस्थिति को पहुँचाने में असमर्थ रहा है। जैसा मीडिया, प्रिंट एवं इलैक्ट्रोनिक, अस्तित्व में है, उसके भरोसे यह काम नहीं किया जा सकता। बढ़िया कागज पर कुछ संगठन या एन.जी.ओ. जो थोड़ा-बहुत साहित्य निकालते भी हैं, वह सामान्य जन की पहुँच में नहीं है (उन पर पहले ही ‘सीमित वितरण के लिए’ छपा होता है)। प्रस्तावों एवं सुझावों के अभियान के सहभागियों के बीच वितरण, बैठकों की रपटों का परस्पर वितरण या सीमित वितरण हेतु प्रकाशित साहित्य का परस्पर वितरण संगठनों का आपस में एक-दूसरे की पीठ ठोंकना जैसा है। बृहद उत्तराखण्डी समाज के लिए सारा कुछ अबूझा ही रह जाता है। अब अभियान की पहली प्राथमिकता इस दुरूह परिस्थिति को सामान्य उत्तराखण्डी एवं शेष प्रदेश-देश के सामने ले जाने की होनी चाहिये….तत्सम्बन्धी जानकारी एवं सामग्री (भले ही सस्ते से सस्ते कागज पर) की व्यवस्था अनिवार्य है। इतना निश्चित है कि ‘तंत्र’ के खिलाफ खड़े होने की तुलना में उसे पराजित कर पाना कहीं कठिन होता है। सामान्य जीवन पर आसन्न संकट का उसकी भयावहता के साथ प्रभावी ढंग से ‘जन’ के सम्मुख रखे जा सकने पर ही गलत सरकारी नीतियों के विरोध में जनता के खड़े होने की आशा करनी चाहिये। अन्यथा नदी बचाओ अभियान की बाँधों के बारे में जो दृष्टि एवं नीति है उसे पाने के लिए उत्तराखण्ड में सत्ता परिवर्तन (जस नागनाथ तस साँपनाथ) नाकाफी होगा। अभियान के सहभागियों को समझना चाहिये कि बहुत दिन नहीं हुए हैं जब इसी पर्वतीय क्षेत्र में जंगल पर जनता के परंपरागत हक-हकूकों के लिये चलाये गये वन आंदोलन को ‘तंत्र’ ने कितनी धूर्तता से पर्यावरण के नाम पर ‘जन’ को जंगल से बेदखल कर देने वाले वन अधिनियमों का कारण बना दिया। ![]()
समझा यह भी जाना चाहिये कि जनता के बीच जनता के ही सरोकारों को लेकर जाना भी सरल नहीं होता। राजनीति के पेशेवर खिलाड़ियों ने आजादी के बाद से जैसे छद्म लोगों के नाम सामने रखे हैं और जिस तरह उनको छला है उसका सीधा परिणाम है कि जनता उसे सम्बोधित करने वाली प्रत्येक पहल पर शक ही करती है। सम्बोधनकर्ता के निजी फायदे तलाशे जाते हैं। यह उसी तरह की स्थिति है कि ईमानदार गैर-सरकारी संगठन (एन.जी.ओ.) आज एक अविश्वसनीय चीज लगती है और जब तक गहरी जानकारी न हो हर एन. जी.ओ. धंधा ही माना जाता है। जनता के बीच जाने वाले सभी लोग जनता के पक्षधर ही नहीं होते, जनता को छलने वाले भी जनता के ही बीच जाते हैं। ‘आम जनता’ बड़ी अमूर्त अवधारणा है। मौजूदा राजनीतिक परिदृश्य में जनता के बीच जाने के प्रत्येक प्रयास से पहले इस वास्तविकता की गहरी समझ आवश्यक है। उत्तरकाशी में जून के मध्य में गंगा की गोमुख से धरासू तक अविरल बहने दिये जाने की माँग को लेकर एकाएक आमरण अनशन पर बैठ गये प्रोफेसर जी.डी. अग्रवाल को आस्था का प्रश्न (अस्तित्व का नहीं) मानने वालों ने यदि ‘हाईजैक’ कर लिया और जनित कोलाहल में यदि जल विद्युत परियोजनाओं का मूल मुद्दा कहीं खो जैसा गया तो जिम्मेदारी उनकी भी बनती है जो नदी बचाओ अभियान का हिस्सा तो थे, मगर अनशन स्थल पर ‘निजी हैसियत’ में उपथित रहने के बावजूद षडयंत्र को समझ नहीं पाये या नासमझ बने रहे। अभियान साझे होते हैं, अभियान में ‘व्यक्तिगत’ क्या होता है ? या तो आप अभियान में होते हैं या नहीं होते।
‘जी.डी. अग्रवाल-प्रकरण’ ने नदी बचाओ अभियान को क्षति पहुँचाई है। इस प्रकरण की छाया अभियान की कौसानी में आयोजित जुलाई प्रथम सप्ताह की बैठक पर पड़ी भी। अभियान से जुड़े लगों एवं संस्थाओं/संगठनों को लेकर ‘माटेर संतान बनाम बहिरागत’ का प्रश्न वहाँ उछालने की घातक कोशिश हुई। साफ-साफ दिखाई दिया कि अभियान के सहभागियों के बीच पारस्परिक अविश्वास अंकुरित हो रहा है। घर के भीतर का यह सूपड़ा भीतर ही नहीं रहा। अखबारों, पत्रिकाओं में इसे चटखारे लेकर परोसा भी गया। अभियान को यदि किसी सार्थक परिणति तक पहुँचना है तो इस सबसे बचना जरूरी है। निकट इतिहास में प्रमाण हैं कि नदी-बचाओ अभियान की तुलना में कहीं सशक्त आंदोलनों की इसी जमीन पर निरर्थक परिणति हुई है। छोटे से पर्वतीय युवा मोर्चा से शुरू कर उत्तराखण्ड संघर्ष वाहिनी ने जिस तरह की जन चेतना इस क्षेत्र में एक समय विकसित की एवं जैसा वन आन्दोलन चलाया उसकी कम ही मिसालें हैं। किंतु उस स्पंदन या जन चेतना को पारस्परिक अविश्वास से उत्पन्न आपसी मतभेदों एवं ‘इगो’ के टकरावों में वाहिनी आगे ले जाने में असमर्थ रही। किसी समय वाहिनी में साथ सक्रिय लोग अभी भी परस्पर आरोप-प्रत्यारोप से मुक्त नहीं हो पाये हैं। वाहिनी एक सशक्त राजनैतिक विकल्प बनने में असमर्थ रही। एक ऐसे दबाव समूह के रूप में भी विकसित नहीं हो पाई जो आर्थिक एवं प्रशासनिक मुद्दों पर जनता के सरोकारों को केन्द्र में ला सकने में सफल होती।
अभियानों/आन्दोलनों के भीतर के आपसी-अविश्वास एवं अन्य कमजोरियों की ‘तंत्र’ निरन्तर टोह में रहता है और अपना काम कर जाता है। ‘जन’ एक बार फिर छला जाता है। समय इस सच्चाई को समझने का है कि जन सरोकारों के लिए प्रतिबद्ध संगठनों को एक दबाव समूह के रूप में विकसित होना है। निकट अतीत में ऐसा नहीं हो पाया और इसी कारण जनता का उत्तराखण्ड उत्तराखण्ड राज्य की स्थापना के बाद भी एक सपना ही है। जल, जंगल और जमीन पर विविध माफियाओं का विरोध करने एवं स्थानीय जन को उसका अधिकार दिलाने जैसे मुद्दों पर उत्तराखण्ड में अलग-अलग आवाजों/आन्दोलनों/अभियानों की मौजूदगी निरन्तर रही है किन्तु कालान्तर में इनके बिखर जाने के कारण जनता वहीं खड़ी रह जाती है।
आइये! प्रार्थना करें कि नदी बचाओ अभियान की परिणति ऐसी न हो।

























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