सुमगढ़ गॉँव में सन्नाटा सा पसरा हुआ है। हर किसी की आँखें नम हैं। प्रकृति के गुस्से से हर कोई सहमा है। बारिश लगातार जारी है। जगह – जगह भूस्खलन हो रहा है। सड़कों का नामोनिशाँ मिट गया है। कई परिवारों ने अपने घर छोड़ बाहर रह रहे अपने संबंधियों के वहाँ शरण ली है। इस आपदा से प्रशासनिक अमला भी तालमेल के अभाव में असहाय सा दिखा।
18 अगस्त की सुबह कुछ अच्छी नहीं लग रही थी। रात भर लगातार बारिश थी और सुबह भी। करीब दस बजे लोगों का जत्था बागनाथ मंदिर को भाग रहा था। पता लगा कि सरयू नदी पूरे उफान में है। जल स्तर खतरे से ऊपर आ चुका है। जाकर देखा तो सरयू के प्रवाह में मवेशी, गैस सिलेंडर, विशालकाय हरे पेड़…..न जाने क्या-क्या बहा जा रहा है। 25-26 साल बाद सरयू भयानक गुस्से में थी। किसी अनहोनी की आशंका से मन घबराने लगा। इसी बीच सौंग से सवा दस बजे घबराए हुए राजेन्द्र सिंह टाकुली ‘राजू’ का फोन आया कि सौंग में बादल फटने से तबाही मच गई है। एक स्कूल में 20-25 बच्चे दब गए हैं। जल्दी से मदद भेजो। मैंने तुरंत ही डी.एम डी.एस. गर्ब्याल को फोन कर यह दुःखद सूचना दी। ![]()
इस घटना की जानकारी कई जगह दे हम प्रदीप परिहार की जीप बुक करा सौंग को भागे। प्रदीप को पहाड़ के कच्चे रास्तों में चलने का काफी अनुभव है। सरयू के किनारे-किनारे ही मोटर मार्ग है। कई जगहों पर सरयू सड़क के किनारे को तोड़ चुकी थी। भराड़ी से आगे सौंग की सड़क कई जगहों पर खतरनाक बनी हुई थी। सौंग से करीब चार किमी. पहले तुड़तुड़िया के बाद कई जगहों पर सड़क गायब हो चुकी थी। प्रदीप को यहीं जीप में छोड़ यहाँ से पैदल बढ़े। रास्ते में कई गधेरे उफान पर थे और पहाड़ी में कई जगहों से स्रोत फूट पडे़ थे। इन झरनों के साथ ऊपर से पत्थर इस तरह आ रहे थे कि पैदल चलना कम, भागना ज्यादा हो रहा था। अचानक पूरे वेग से आये एक गधेरे ने हमारा रास्ता बंद कर दिया। दस मिनट इंतजार के बाद घटनास्थल पहुँचने की बेचैनी होने लगी तो घनश्याम और मैंने एक-दूसरे का भरोसा कर, जोखिम उठा कीचड़ से लथपथ हो इसे पार कर ही लिया। नीचे सरयू के किनारे हाइड्रो पावर हाऊस की मशीनों पर नदी की तूफानी लहरें अपना गुस्सा उतार रही थीं। सुरंग बनाने के लिए आवागमन को बनाये गए दो पुलों को सरयू रौंद रही थी। कई जगहों पर दौड़ने के बाद हम तप्तकुंड पहुँचे। लोग बदहवास से पार सुमगढ़ स्कूल को दौड़ रहे थे। नीचे सरयू भयंकर वेग से गरज रही थी। मंदिर के किनारे भी नदी के प्रवाह में बह गए थे। नदी पर बने पुल का रास्ता इस ओर से गधेरे ने ध्वस्त कर दिया था। एक मोटा रस्सा पुल में लगाया गया था। बमुश्किल पुल पार कर स्कूल पहुँचे तो कदम ठिठक गए। तीन कमरों में स्कूल के पीछे की पहाड़ी से हुए भूस्खलन का मलवा पटा पड़ा था। इसी मलवे में तीन से आठ साल के 18 मासूम दफन थे। गाँव वालों के साथ पुलिस के कुछ जवानों ने अंदर का मोर्चा संभाला। हर कोई बदहवास था। बारिश लगातार जारी थी। कोई भी महिला न दिखने पर पता लगा कि आगे गाँव को जाने वाला 50 मी. रास्ता भी भूस्खलन की चपेट में आ गया है, जिससे महिलाएँ गाँव में ही बच्चों की खबर सुन बेसुध पड़ी हैं। दरवाजे के पास एक बच्ची का सिर व हाथ दबा देख मन विचलित हो पड़ा। एक कमरे में कुछ घायल बच्चों का इलाज हो रहा था। इतने में नंदू मिश्रा की नजर हम पर पड़ी तो वह सुबकते हुए हमारे पास आ गया। पता लगा कि इस हादसे में उसने अपने तीन मासूमों को खो दिया। दो वर्ष पूर्व सौंग विद्युत परियोजना के विरोध में चले आंदोलन में नंदू मिश्रा की भूमिका अहम रही थी।
एक कमरे में दो अध्यापक दफन हो चुके बच्चों की लिस्ट बना रहे थे। भरे गले से एक शिक्षक ने बताया कि…… ‘‘सुबह का स्कूल था। सुबह से ही भयानक बारिश हो रही थी। बारिश के बंद होने पर बच्चों की छुट्टी करने का विचार था। पीरियड के खत्म होते ही जोरदार आवाज हुई तो वे बाहर को भागे। अंदर का मंजर देख हम सभी काँप उठे। पीछे पहाड़ी खिसक गई थी और उसका मलवा तीन कमरों को पीछे से तोड़ अंदर आ गया था। सभी बच्चे मलवे में दब गए थे……. घुटी-घुटी सी कुछ आवाजें आ रही थीं….. दरवाजे के पास से मलवे में दबे दो बच्चों को बमुश्किल निकाला। इस बीच अनहोनी की आशंका के चलते बच्चों के बाप-दादा भी स्कूल को आ रहे थे। यहाँ का मंजर देख वे सभी सकते में आ गए। कुछ ने मदद के लिए सौंग कस्बे की ओर दौड़ लगाई और कुछ गाँव की ओर भागे औजार लाने। गाँव का रास्ता भूस्खलन की चपेट में आने से ऊपर पहाड़ी से बमुश्किल वे गाँव को निकले। नीचे सरयू पर बने पुल की एक दीवार भी सौंग गधेरे ने तोड़ दी। कुछ लोगों ने चिल्ला-चिल्ला कर पार बताने की कोशिश की कि स्कूल में बच्चे दब गए हैं। लेकिन सरयू के शोर में आवाज दब कर रह गई।
मूसलाधार बारिश जारी थी। नीचे पुल पर आने पर देखा कि आपदा की टीम ने आपस
में जोड़ कर दो सीढ़ियाँ लगा दी हैं। पुल से उतरना-चढ़ना आम जन के लिए अभी भी खतरनाक बना हुआ था। गधेरे का वेग कुछ कम होने पर पीडब्ल्यूडी का दल उसके ऊपर तख्ते लगा रहा था। सौंग कस्बे की ओर जाते सड़क में तबाही के निशाँ दिखे। गधेरों की बाढ़ में बह कर आए विशालकाय पेड़ों की गत देख हम हैरान थे। सौंग गधेरे के किनारे खड़क सिंह के दोमंजिला मकान का एक हिस्सा तबाह हो गया था। एक बाईक सरयू नदी में जा समाई थी और एक कार को गधेरे की बाढ़ ने दूर किनारे जा पटका था। मकान के किनारे खड़ी बस भी मिट्टी में दबी थी। मकान के निचले हिस्से में चक्की व दुकान को काफी नुकसान पहुँचा था। रौद्र रूप धारण किये गधेरे को बमुश्किल पार कर आगे बढ़े। आगे फिर सड़क टूटी मिली। रास्ता बदला, लेकिन अब भी आगे बढ़ना कठिन लगा। सामने मिट्टी का दलदल बना था। दलदल की गहराई का अनुमान लगाने के बाद इसे भी पार कर ही लिया।
लोहारखेत-कर्मी-सौंग सड़क भूस्खलन की चपेट में आ गायब हो गई थी। लोहारखेत को जाने वाले मार्ग में सड़क के किनारे के मकानों को देख कर लग रहा था कि ये भी बस गिरने ही वाले हैं। चीख-पुकार मची थी। घबराए लोग जल्दी में अपना जरूरत का सामान ले कर घर छोड़ भाग रहे थे।
वापसी की राह पकड़ी। सामने से डीएम व एसपी आते दिखे। उन्हें वस्तुस्थिति की जानकारी दी। तुड़तुड़िया में सैकड़ों गाड़ियों का रैला लग गया था। बालीघाट के पास आईटीबीपी की गाड़िया भी दिखीं। बागेश्वर भी हर कोई शोकाकुल दिखा। व्यापार मंडल के पूर्व अध्यक्ष शंकू राना की आवाज गूँज रही थी, ‘‘…..सौंग के सुमगढ़ हादसे में मासूम बच्चों के शोक में कल बाजार बंद रहेगा।’’ कई व्यवसायियों ने शोक में अपनी दुकाने बंद कर दी थीं। आज कई घरों के चूेल्हे नहीं जले।
देर रात तक पुलिस, आईटीबीपी व ग्रामीणों की मदद से सभी बच्चों के शव निकाल लिए गए थे। सुबह फिर प्रदीप को ले सौंग का रुख किया। तुड़तुड़िया से फिर पैदल चलना हुआ। आज मुख्यमंत्री का दौरा था, इस क्षेत्र का। जाने वालों में वीआईपी भीड़ कुछ ज्यादा ही थी। मुख्यमंत्री के आने को लेकर भी कई चर्चाएँ हो रही थीं…..‘‘अरे! स्कूल आरएसएस का हुआ….. तभी आ रहे ठहरे…..और फिर कोश्यारी का गढ़ हुआ…..आगे चुनाव भी तो ठहरे….गाड़ी से ही आ रहे हैं बल…..बारिश भी तो बंद नहीं हो रही ठहरी….खाली ठहरा इनका आना यहाँ… जो इन्होंने करना था वहीं से जो कर देते…. अरे! यार नेतागिरी भी तो चमकानी हुई….उत्तराखंड पर आपदा आ रही है करके क्या पता बाहर से कुछ पैसा-वैसा ही आ जाए झोली में…..!’’
सुबह नौ बजे तक बच्चों को स्कूल के नीचे गधेरे के किनारे धरती की गोद में हमेशा के लिए सुला दिया गया था। स्कूल के आस-पास गुमसुम से लोग खड़े-बैठे थे। डीएम व एसपी ने रात यहीं बरामदे में बैठ कर गुजारी। हमने सुमगढ़ गाँव जाने की राह पकड़ी। आगे भूस्खलन की चपेट से रास्ता बंद था। खड़ी चढ़ाई में रास्ता बना घास पकड़ते हुए आगे रास्ते तक पहुँचे। गाँव की बाखलियाँ सन्नाटे में डूबी हुई थीं। आवाजें थीं तो जानवरों की। कई दिनों से बँधे इनकी दहाड़ से लग रहा था कि मानो ये भी बच्चों के गम में तड़प रहे हैं। गाँव के बीच में नंदू मिश्रा व हरीश जोशी के एक छत के नीचे बसे आशियाने में से अपने बच्चों को याद कर माँ के तड़पने की आवाजें दिल को दहलाने लगीं। कई जगहों पर भूस्खलन हुआ था। स्कूल के पास काफी गहमागहमी थी। नीचे पुल के पास एक 30 फीट की नई सीढ़ी लग गई थी। पुल की जड़ में पत्थर डाल कर पुल तक पहुँचने के मार्ग को कम किया जा रहा था। पीडब्ल्यूडी ने अपनी पूरी ताकत झोंकी थी। खुद एक्सन साहब पत्थर लाने में लगे थे। लेकिन यह चिंता ग्रामीणों की नहीं….नौकरी बचाने की थी। शाम तक घटनास्थल पर मुख्यमंत्री को पहुँचना था। सौंग से भराड़ी के रास्ते में करीब आठ जेसीबी मशीनें लगी थीं सड़क मार्ग खोलने के लिए। ये मुख्यमंत्री का खौफ था….?
तप्तकुंड के पास जगह-जगह ग्रामीणों के झुण्ड थे। पटवारीजी रजिस्टर खंगाल कर मुआवजा राशि के चैक बनाने में लगे थे। मृतक एक लाख, घायल पैंतीस हजार। बच्चों को पालने-पोसने की अनुमानित सरकारी धनराशि थी ये! सरकार की नजरों में मानवीय संवेदनाओं के लिए कहीं कोई जिक्र नहीं होता। एक दुकान में क्षेत्रीय विधायक शेर सिंह गड़िया पत्रकारों से वार्ता कर रहे थे। वापसी में भूस्खलन से बचने के लिए फिर वही दौड़ना-भागना। सुमगढ़ हादसे की खबर सुन बाहर रहने वाले नाते-रिश्तेदार भी भागे चले आते दिखे। आईटीबीपी का दल वापस जा रहा था। एयर फोर्स दिल्ली में तैनात कृष्ण चन्द्र त्रिवा मिल गया। वह काफी हैरान-परेशान था यहाँ की प्रशासनिक व्यवस्था को लेकर। बीते शाम को रैसक्यू दल में वह भी था। उसका मानना था कि यदि ‘फर्स्ट एड’ समय पर मिल जाती तो शायद कुछ बच्चों को बचाया जा सकता था।
सौंग से भराड़ी की बाजार तक सड़क के किनारे लक्जरी गाड़ियों का कारवाँ लग रहा था धीरे-धीरे। बाँसे गाँव में कई मकानों में दरारें आ गई हैं। यहाँ गाँव के बीचोंबीच से सुरंग गई है।
सौंग क्षेत्र में हुई व्यापक तबाही कई सवाल खड़े कर गई है। भूकम्प व भूस्खलन की दृष्टि से यह क्षेत्र संवेदनशील है। बावजूद इसके इस क्षेत्र को जोड़ने वाली सड़कों का बुरा हाल है। सूचना मिलने के बाद भी राहत दल को वहाँ पहुँचने में घंटो लग गए। खुद जिलाधिकारी व पुलिस कप्तान को भी काफी परेशानियाँ उठानी पड़ी। भराड़ी से सौंग के मध्य तुड़तुड़िया, तप्तकुंड, सलिंग, बाँसे तथा रीठाबगड़ से हरसिंग्याबगड़ को जोड़ने वाली सड़क का नामोनिशान मिट गया है। प्रकृति से छेड़छाड़, जलविद्युत परियोजनाओं का अंधाधुंध निर्माण तथा पेड़ों का कटान अब लोगों की जिंदगी लील रहा है। सरकार चेतेगी या फिर सुमगढ़ जैसे हादसों को चुनावी नजर से देखेगी…?