प्रस्तुति : विनोद पाण्डे
हमारे यहाँ आमतौर पर विज्ञान उसी को कहा जाता है, जो विज्ञान की परिभाषाओं, प्रयोगशालाओं, आधुनिक शोध पत्रों, खोजों व खर्चीले संसाधनों के अंर्तगत हो। हमारी जीवन पद्धति, कृषि, परम्परागत ज्ञान, लोक चिकित्सा ज्ञान आदि विषयों को ‘आधुनिक विज्ञान’ में एक दकियानूसी से अधिक नहीं माना जाता है। हालाँकि इन विषयों व लोक त्यौहारों में कहीं न कहीं वैज्ञानिकता व सार्थकता जुड़ी रहती है। अब विज्ञान व संस्कृति के सम्मिलित प्रयासों से एक नये विषय का प्रादुर्भाव हुआ है, जिसे ‘लोक विज्ञान’ कहा जाने लगा है। वनस्पति विज्ञान से जुड़े ऐसे ही लोक विज्ञान को ‘इथनो बॉटनी’ का नाम दिया गया है।
कुमाऊँ विश्वविद्यालय के देबसिंह बिष्ट परिसर के जगदीश चन्द्र, सुधीर चन्द्रा, किरन बर्गली व वाई.पी.एस. पांगती द्वारा लिखित पुस्तक ‘इथनोबोटनिकल स्टडी ऑफ अ कुमाऊँनी फैस्टिवल- हरेला’ इसी दिशा में एक प्रयास है। विभिन्न अध्यायों में कुमाउँनी त्यौहारों, हरेले पर विशेष अध्याय, कृषि का इतिहास, स्थानीय देवताओं, फसलों, हरेले का लोक विज्ञान, हरेले के बीजों का लोक विज्ञान का महत्व, बीजों की जैव विविधता आदि विषयों पर जानकारी दी गई है। लेखकों का मानना है कि हरेला वास्तव में मूलतः कृषक समाज का त्यौहार है। हरेले के माध्यम से किसान अपने संग्रहीत बीजों की जैव- विविधता व अंकुरण संबधी गुणों का अध्ययन करता है। इस दुःखद पक्ष का उल्लेख हुआ है कि हरेले का महत्व धीरे-धीरे समाप्त हो रहा है। हमें पता चलता है कि चावलों की ही सैकड़ों किस्मों की जैव विविधता उपेक्षा के चलते संकट में है। लेखकों ने एक कृषि वैज्ञानिक को उद्धृत करते हुए विश्वास व्यक्त किया है कि संरक्षण का संदेश भूक्षरण या जीवांश क्षरण जैसी बातों के बजाय विश्वास व परम्परा को माध्यम बनाकर किया जा सकता है।
पुस्तक एक शोध पत्र के रूप में अधिक प्रतीत होती है। हालाँकि इस नवीन विषय पर रोचकतापूर्ण लेखन की अपार संभावनाएँ हैं। पुस्तक में महत्वपूर्ण व प्रामाणिक जानकारियों का समावेश करने का प्रयत्न किया गया है। यदि कुछ प्रयत्न और किया गया होता तो पुस्तक एक बड़े पाठक वर्ग को आकर्षित कर सकती थी। फिर भी लेखक एक अभिनव विचार को प्रस्तुत करने के लिए निश्चित रूप से प्रशंसा के पात्र हैं। प्रकृति विज्ञान और लोक संस्कृति में रुचि रखने वाले व गैर सरकारी संगठनों के कार्यकर्ता भी अपने कार्य क्षेत्र की गंभीरता व सार्थकता जैसे उद्देश्यों के लिए इस पुस्तक को उपयोगी पायेंगे। आशा करनी चाहिये कि इस पुस्तक के बाद पंरपराओं में वैज्ञानिकता ढूँढने का प्रयास तेज होगा और पीढ़ियों से संजोये लोक विज्ञान की वर्तमान संदर्भों में सार्थकता विकसित की जा सकेगी।

























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