श्रीदेव सुमन जयन्ती
‘‘जिस राज्य की नीति अन्याय, अत्याचार व स्वेच्छाचारित पर अवलंबित हो, उसके विरुद्ध विद्रोह करना प्रत्येक नागरिक का मूल कर्तव्य है। यही मैंने भी किया है और शरीर में दम रहते हुए मैं बराबर यही करता रहूँगा। माँ, बहिन, भाई व पत्नी के प्रेम पर देश प्रेम ने और घर-बार, बच्चों व सम्बन्धियों के कष्टों पर पीड़ितों व शोषितों की आहों ने विजय प्राप्त कर ली है। मैं क्या करूँ ? अंतरात्मा की आवाज यही है।’’ 84 दिन की भूख हड़ताल के बाद शहीद हुए श्रीदेव सुमन ने अपनी युवा पत्नी विजय लक्ष्मी को आगरा सेन्ट्रल जेल से 21 अक्टूबर 1943 को लिखे गये पत्र में यह संकल्प व्यक्त किया था।
टिहरी रियासत आन्दोलन के जन नायक श्रीदेव सुमन जयन्ती के अवसर पर ‘मौलिक त्रिहरि’ संस्था द्वारा टिहरी के प्रेस क्लब में 26 मई को ‘महिलायें एवं मीडिया’ विषय पर एक गोष्ठी आयोजित की गई थी, जिसकी अध्यक्षता अल्मोड़ा की सेवानिवृत्त अध्यापिका रेवती बिष्ट ने की। गोष्ठी का आरम्भ करते हुए ‘जनपक्ष’ पाक्षिक के संपादक चारु तिवारी ने चिन्ता व्यक्त की कि मीडिया महिलाओं का उपयोग भी बाजार की वस्तु की तरह कर रहा है। वरिष्ठ साहित्यकार रामशरण जोशी ने कहा कि पचास वर्ष पहले की तुलना में पत्रकारिता में महिलाओं की संख्या में सुधार हुआ है, परन्तु यह उच्च वर्ग की महिलाओं से ही है। आदिवासी व पिछड़े क्षेत्रों में यह सुधार नहीं के बराबर है। महिलाओं के नाम से निकलने वाली प्रमुख पत्रिकाओं गृहशोभा, फैमिना आदि महिलाओं की मूल समस्याओं के बारे में ध्यान देने की बजाय महिला सौन्दर्य की बातें करती हैं। पिछले 20 वर्ष में भारत में मध्यवर्ग बढ़ कर 20 करोड़ से ऊपर हो गया है। इस मध्यम वर्ग को ध्यान में रखकर ही पत्रकारिता की जाती है, क्योंकि बाजार का ध्यान इन्हीं पर होता है।
‘समयांतर’ के संपादक पंकज बिष्ट ने कहा कि आज शराब, जो महिलाओं की सबसे बड़ी दुश्मन है, के खिलाफ आवाज उठाने की स्थिति भी मीडिया में नहीं है। महिलाओं के दुःख-दर्द के बारे में कम उनके शरीर के बारे में अधिक जानकारी खबरों में रहती है। 1980 के बाद महिलाओं को मीडिया में स्थान तो मिला, परन्तु इस रूप में कि कैसे उसके शरीर को अधिक से अधिक दिखाया जाये या अश्लील विज्ञापन दिये जायें। मीडिया ने उस धर्म को भी खूब महिमामंडित किया, जो हमेशा से ही औरतों के खिलाफ रहा है। देश के कोने-कोने में महिलाओं द्वारा किये जा रहे महत्वपूर्ण कार्यों को महत्व देने में मीडिया की रुचि नहीं है। क्षेत्रीय मीडिया इस दिशा में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है। चिपको आन्दोलन को प्रमुख महिला गौरा देवी को स्थान क्षेत्रीय मीडिया ने ही दिया। गोष्ठी में वरिष्ठ कथाकार प्रदीप पंत, क्षितिज शर्मा, मीरा सकलानी, गीता गैरोला, मीरा रतोड़ी आदि ने भी अपने विचार व्यक्त किये।
























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