( जनकवि गिर्दा के साथ योगेश पंत की बातचीत)
प्रश्न:- आपकी पहचान राजेन्द्र रावत ‘राजू’ से कब हुई ?
उत्तर:- उनके लेखन और देश के विभिन्न परिवर्तनकामी समूहों से उनके जुड़ाव के बारे में तो जानता था, उनसे मुलाकात भी थी। लेकिन घनिष्ठता ‘नैनीताल समाचार’ के ‘पौड़ी अंक’ के दौरान ही हुई।
प्रश्न:- उनकी राजनीति और सामाजिक सरोकारों के बारे में क्या कहना चाहेंगे ?
उत्तर:- सत्यनारायण गुट (एस.एन.) जैसे कई परिवर्तनकामी समूहों के साथ उनके जुड़ाव ने उन्हें सामाजिक कार्यों व जनांदोलनों का मार्ग दिखाया। जन सरोकारों के प्रति उनके समर्पण के लिए उन्हें हमेशा जाना जायेगा। राजू स्टेट बैंक में सेवाकाल के दौरान एक कर्मचारी नेता के रूप में भी कर्मचारियों के हितों के लिए सदैव संघर्षरत रहे। आज के अधिकांश ट्रेड यूनियन नेताओं की तरह उनकी पहचान एक समझौतावादी/दलाल किस्म के स्वार्थी नेता की नहीं, वरन् जुझारू, ईमानदार व निर्णयवादी नेता की थी। कर्मचारियों के आपसी अन्तर्विरोध के बीच स्वच्छ व ईमानदार छवि उनके जनसरोकारों के कारण ही संभव हुई।
प्रश्न:- उमेश डोभाल प्रकरण में उनकी भूमिका पर आपकी क्या राय है ?
उत्तर:- शराब माफिया की दहशत पूरे गढ़वाल मण्डल में थी। उमेश डोभाल की हत्या ने इस दहशत को और बढ़ा दिया। लेकिन कुछ परिवर्तनकामी समूहों ने इस दहशत और हत्या के विरोध में आंदोलन शुरू कर दिया। माफिया ने इस विरोध को दबाने के लिए पूरे पौड़ी शहर को मनमोहन सिंह नेगी (शराब माफिया) के पक्ष में छपे पोस्टरों से पाट दिया। लोग और अधिक भयभीत हो गये। आन्दोलन कमजोर पड़ता जा रहा था। जब राजू और उनके साथियों ने उमेश डोभाल के गाँव सिराई और राजू के गाँव च्वींचा के ग्रामीणों को संगठित कर प्रदर्शन किया, तभी दहशत टूटी और आन्दोलन में उभार आया। ![]()
प्रश्न:- उनके लेखन के विषय में कुछ और बताइये ?
उत्तर:- राजू बहुत अच्छा कवि था। चंद पंक्तियों में ही बहुत बड़ी बात कह जाता था। मुझे याद आता है कि 1993 के नये साल के उपलक्ष्य में उसने कार्ड के स्थान पर अंतर्देशीय में एक कविता लिखकर अपने मित्रों को भेजी थी ‘…. .अयोध्या जाकर मैं चुल्लू भर पानी में डूब गया…’। याद करें 6 दिसम्बर 1992 बाबरी मस्जिद कांड और लालकृष्ण आडवाणी की रथ यात्रा, साथ में तत्कालीन मुख्यमंत्री उ.प्र. कल्याण सिंह का केन्द्र सरकार को दिया शपथ पत्र। यह कविता बहुत ही मर्मस्पर्शी है। राष्ट्रीय एवं तथाकथित बड़े पत्र-पत्रिकाओं में जन सरोकारों के प्रति लिखने के बावजूद स्थानीय पत्रों को उन्होंने हमेशा ही अधिक महत्व दिया।
लेखन, कविता, पोस्टर के अतिरिक्त जन चेतना को धारधार बनाने के लिए श्रव्य और दृश्य (ऑडियों विजुअल) माध्यम को लेकर भी उनकी खूबसूरत और वजनदार कल्पनाएँ थी। सुप्रसिद्ध लोकगायक नरेन्द्र सिंह नेगी के साथ मेरी काव्य जुगलबंदी का स्वप्न 12 जून 1999 को पौड़ी में ‘गढ़वाल सांस्कृतिक संस्थान’ द्वारा बड़ी सफलता के साथ सम्पन्न हुआ।
आज जब राजू नहीं है तो हम सब उसे अपनी पूरी चेतना के साथ याद करते हैं। उसके तार्किक जनसरोकारों को याद करते है। हम उसके स्नेह-प्रेम को नमन करते हुए उसकी प्रेरणादायी स्मृति को संजोने, उसे स्थायित्व देने का भरसक प्रयास करना चाहते हैं।