तो कवि-साहित्यकार निशंक जी गये और जनरल साहब एक बार फिर से उत्तराखंड की गद्दी पर आ विराजे। इसका क्या अर्थ लगाया जाये ?
भारतीय जनता पार्टी वाले कह रहे हैं कि नहीं, भ्रष्टाचार के कारण निशंक को नहीं हटाया गया। भ्रष्टाचार के कारण नहीं हटाया गया तो विधानसभा चुनाव से पाँच महीने पहले ऐसी क्या मजबूरी आन पड़ी थी कि आपने एक अच्छे-भले आदमी को निकाल बाहर कर दिया ? क्या आपने चुनावी जंग से पहले ही हथियार डाल दिये हैं ? फिर भी….. भाजपा वाले कहते हैं…….खंडूरी निशंक की तुलना में ज्यादा कड़क और ईमानदार हैं। यदि सचमुच ऐसा है तो जून 2009 में क्यों आपने उन्हें एकाएक कान पकड़ कर बाहर का रास्ता दिखा दिया ? निशंक यदि भ्रष्ट थे……..अब मान भी लें साहब कि आपने उन्हें इसी कारण हटाया है….. तो जो नुकसान वे कर गये हैं उसकी भरपाई जरनल कैसे कर लेंगे ? या आप चाहते हैं कि जरनल निशंक के किये-धरे का सिला इस तरह दें कि चुनाव में भाजपा पूरी तरह चौपट हो जाये और फिर आप उन्हें हमेशा के लिये अज्ञातवास में डाल दें ?
गजब की पार्टी है साहब यह भारतीय जनता पार्टी भी!
चलिये, जो भी हुआ। एक नया मुख्यमंत्री आया। हमें उसका खैर मकदम करना चाहिये। कुछ फर्क तो सरकार में पड़ेगा ही। पिछली और अब की सरकारों के एक कैबिनेट मंत्री ने हमें आश्वस्त किया है कि राजकाज में लगभग 25 प्रतिशत फर्क तो वे इन चन्द दिनों में ही महसूस करने लगे हैं। अच्छा है। हम तो चाहेंगे कि जनता को भी यह फर्क महसूस हो।
लेकिन कुछ बुनियादी बातों से आँखें नहीं मूँदी जा सकतीं। उत्तराखंड राज्य की माँग इसलिये की गई थी कि एक विशिष्ट भूगोल में रहने वाले सांस्कृतिक दृष्टि से अल्पसंख्यक लोग अपनी जरूरतों के हिसाब से अपना विकास कर सकें। वह अवधारणा तो कांग्रेस-भाजपा के इस राज्य में प्रभुत्व प्राप्त करने के बाद ही धूल धूसरित हो गई। उत्तराखंड का मुख्यमंत्री अब एक तरह का मनसबदार होता है और अपनी पार्टी के केन्द्रीय नेताओं की कृपादृष्टि पर ही उसका अस्तित्व संभव है। यह दुःखद सच्चाई राज्य बनने से पहले उसी दिन स्पष्ट हो गई थी, जब अडवाणी- सुषमा स्वराज ने अकारण और अनावश्यक रूप से हरिद्वार को उत्तराखंड में जोड़ दिया था। अब तो विधानसभा में पहाड़ों का प्रतिनिधित्व भी घट गया है। लोकतंत्र नरमुंडों की गिनती का खेल होता है और इसकी कीमत उसे देनी ही होती है, जो अल्पसंख्यक होता है……..भले ही धार्मिक अल्पसंख्यक हो, भौगोलिक या सांस्कृतिक। अब तो होता यह है कि उत्तराखंड के मुख्यमंत्री को अपनी पार्टी के चुनाव फंड में रकम पहुँचानी पड़ती है, पार्टी के केन्द्रीय नेताओं को डालियाँ पहुँचानी पड़ती हैं और उनके चहेतों को सरकारी संस्थाओं में एडजस्ट करना पड़ता है। इसी पैमाने पर मुख्यमंत्रियों की कार्य कुशलता आँकी जाती है। ऐसा किये बगैर किसी मुख्यमंत्री की कोई गति नहीं हो सकती। इस काम के लिये चैनल होते हैं, जो समझदार होने पर अपने हाथ भी गीले करते चलते हैं। ये चैनल कभी मंत्रियों के रूप में होते हैं तो कभी नौकरशाहों के रूप में। नारायणदत्त तिवारी की सरकार में नैनीताल जनपद की एक मंत्री के जिम्मे यह काम था तो निशंक सरकार में हरिद्वार के एक मंत्री के। पाठक अभी भूले नहीं होंगे कि भुवन चन्द्र खंडूरी की पिछली सरकार में एक चर्चित अधिकारी थे, प्रभात कुमार सारंगी। पाठक अपनी याददाश्त को दुरुस्त कर लें कि सारंगी ऐसा क्या करते थे कि न सिर्फ विपक्षी कांग्रेसियों को बल्कि सत्तारूढ़ भाजपाइयों को भी खंडूरी के खिलाफ सारंगी बजा-बजा कर प्रदर्शन करना पड़ा था। यह सिलसिला तब तक चला, जब तक खंडूरी से कुर्सी छिन नहीं गई। उस वक्त भी भाजपाइयों ने आज जैसा ही उत्साह दिखाया था।
पिछले कार्यकाल में खंडूरी की असफलता का एक कारण उनके द्वारा अपने पार्टी कार्यकर्ताओं पर अंकुश लगाने की कोशिश करना भी था। अब पार्टियों में लोग सर पर बभूत डाल कर जोगी बनने तो आते नहीं। वे दिन कभी के लद गये। अब तो आते हैं कि लोकतंत्र में गंगास्नान कर अपनी दो-चार पीढि़यों के खेलने-खाने का सुभीता कर जायें। चुनाव भी इसीलिये लड़े जाते हैं और एक चुनाव में दो-चार करोड़ इसलिये फूँक डाले जाते हैं कि फिर जीत जाने पर दस-बीस करोड़ रुपये का डौल बैठा लिया जाये। सीधा व्यापार ! खंडूरी बावजूद सारंगी के तमाम कौशल के, न तो अपने केन्द्रीय नेताओं की जरूरतें पूरी कर पा रहे थे और न अपने जिला स्तरीय कार्यकर्ताओं की। लिहाजा वे पार्टी में नीचे से ऊपर तक अलोकप्रिय हो गये। और फिर उनका वह व्यवहार, जो हर व्यक्ति के साथ समान रूप से अक्खड़ होता था।
इस नये कार्यकाल में खंडूरी कितने समझदार साबित होते हैं, भाजपा के पार्टी फंड में पैसा, पार्टी के केन्द्रीय नेताओं को डाली और कार्यकर्ताओं को ठेके पहुँचाने तथा वास्तविक विकास कार्यों के बीच किस तरह संतुलन साधते हैं, यह देखना दिलचस्प होगा। शपथ लेते ही उन्होंने अण्णा हजारे के नाम की माला जपनी शुरू कर दी है। लेकिन अण्णा की जरूरतें सीमित हैं और उन्हें ऐसी किसी पार्टी की जरूरत भी फिलहाल नहीं है, जिसका सबसे छोटा कार्यकर्ता भी पैसा बटोरने के लिये राजनीति में आया हो। व्यक्तिगत रूप से ईमानदार होने का राजनीति में कोई मतलब नहीं है। प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के बारे में यह कहना बहुत मुश्किल है कि उन्होंने अपने निजी हितों के लिये कोई हेराफेरी की है, लेकिन उनके कार्यकाल में सबसे ज्यादा घोटाले सामने आये हैं। जरूरत इस राजनीति को बदलने की है, जिसके बारे में अभी अण्णा हजारे भी बात नहीं कर रहे हैं।