बधाई आप सबको। नहीं, बड़ा दिन या नये साल की नहीं। वह तो हर साल आते रहते हैं। यह तो खास-उल-खास मौका है…..
दरअसल बधाई तो आपने देनी चाहिये थी मुझे। लेकिन आपको खबर हो तभी न आप बधाई देंगे ? बात यह है कि मैं अब ‘पत्रकार’ बन गया। हाँ…..हाँ मैं तो अपने को पत्रकार समझता ही था, आप को भी ऐसी गलतफहमी थी कि मैं पत्रकार हूँ। मगर सरकार तो मुझे भड़भूँजिया ही समझती थी।नहीं….नहीं मेरा इरादा भड़भूँजियों का अनादर करने की बिल्कुल नहीं है। आखिर वे भी मेहनत करते हैं और कुछ तो अच्छा-खासा पैसा भी कमा लेते हैं। सरकार की नजरों में भी वे मुझसे ऊँची हैसियत रखते ही हैं। लेकिन यह तो मुहावरे वाली बात ठहरी इसलिये।
हाँ तो अब उत्तराखंड सरकार ने भी मान लिया है कि मैं पत्रकार हूँ करके। मुझे ‘मान्यता’ यानी कि ‘एक्रेडिशन’ दे दिया है। अब मैं सरकार की नजरों में भी पत्रकार हो गया हूँ। बसों में, ट्रेनों में किफायती दरों पर यात्रा कर सकता हूँ, सरकारी कमेटियों में पत्रकार के रूप में बैठ सकता हूँ और तमाम-तमाम सुविधायें जो सरकार समय-समय पर पत्रकारों के लिये घोषित करती हैं, उसका फायदा उठा सकता हूँ। और जो सरकार घोषित नहीं करती…..खैर उसका फायदा पत्रकार तो क्या कोई भी समझदार आदमी उठा ही लेता है।
वैसे बड़ी शर्म जैसी भी आ रही है इस उम्र में अपनी मान्यता मिलने पर। जैसे संन्यास लेने की उम्र में कोई शादी करने की घोषणा करे! ‘नैनीताल समाचार’ का प्रकाशन शुरू होने के सालों बाद जो पैदा हुए होंगे, ऐसे लड़के-लड़कियाँ देहरादून में हुक्का जैसा माईक थामे उछलते-कूदते घूमते हैं और यदि विधानसभा या सचिवालय में कहीं हम उनके सामने पड़ गये तो मुँह बिचका देते हैं कि यह कौन सा जानवर आ टपका सत्ता के इस केन्द्र में। वैसे अनगिनत लोग हैं, जिन्होंने समाचार से पत्रकारिता का ककहरा सीखा। उनमें बहुत सारे ऐसे भी हैं, जिनमें लियाकत बची है और जो नामीगिरामी अखबारों में बड़े-बड़े पदों पर पहुँच जाने के बावजूद सार्वजनिक रूप से समाचार को अपना ‘आल्मा मेटर’ मानने से नहीं हिचकिचाते। ऐसे शुभचिन्तक उत्तर प्रदेश के दिनों से ही हमें धकियाते रहते थे कि चुप क्यों बैठे हैं, कोर्ट में जाइये। क्यों नहीं देंगे आपको मान्यता ? क्या मतलब कि पाक्षिक समाचार पत्र के सम्पादक को नहीं मिलेगी, साप्ताहिक को ही मिलेगी ? क्या माया वालों को नहीं देते, इंडिया टु डे वालों को नहीं देते ? फिर आपको क्यों नहीं देते ? मगर हम इतराये घूमते थे कि क्यों इस सरकार से भीख की तरह माँगे ? बनने दो हमारा अपना राज्य। घर आ कर मान्यता भी देंगे और एक अदद शॉल भी ओढ़ा कर जायेंगे। आखिर इतना कुछ कर रहे हैं हम यह राज्य बनाने के लिये। लगातार आन्दोलनों में रहे हैं। आखिर दूसरा कौन सा इतना दबंग और आन्दोलनकारी अखबार है उत्तराखंड में ?
तब किसे मालूम था कि ऐसा राज्य बनेगा करके ? जहाँ किसी तरह की कोई व्यवस्था, नियम-कानून ही नहीं होगा। सिर्फ लूट-खसोट होगी। जिस राज्य में अपना पंचायती राज्य कानून ही नहीं बना हो, वहाँ समाचार पत्रों या पत्रकारों को लेकर क्या नीति बननी थी ? हम जैसे आन्दोलनकारियों, जिन्होंने इस राज्य को लेकर बड़े-बड़े सपने देखे थे, धीरे-धीरे ठंडे पड़ गये। शुरूआत के दिनों में तो हमने एक बार हूटर बजाने और गाडि़यों का काफिला लेकर चलने के लिये पहले मुख्यमंत्री नित्यानंद स्वामी को झाड़ लगा दी थी।
लेकिन इधर ऐसा कौन सा चमत्कार हो गया होगा ? जब हमने कोई उम्मीद ही नहीं रखी थी, बल्कि अब कोई जरूरत भी नहीं रह गई थी कि एकाएक सूचना विभाग से फोन आया कि अपने दो फोटो दे दीजिये। हम आपको मान्यता दे रहे हैं करके। तो भगवन्, अब जब हमारे सारे समवयस्क जिन्दगी भर सरकारी नौकरियाँ करके धीरे-धीरे रिटायर हो कर लौट रहे हैं, तो यही सरकार हमें पत्रकार मान रही है। है न मजे की बात ?
तो इसीलिये कहते हैं कि हमें बधाई दीजिये…..
नैनीताल समाचार के संपादक को मान्यता मिलना, बधाई की बात तो है ही। सरकारी तंत्र को आई इतने बरस बाद शर्म। इसमें एक लेकिन, भी है, इसे यो भी कहा जा सकता है- जैसे यह जिद्दी सरकारी तंत्र की हार है। उस सरकारी तंत्र की जो कि समाचार के प्रकाशित होने के दिन से आज तक पूरी तरह समाचार की रपटों को पचा पाने की कूबत नहीं रखता था। खैर इस तंत्र को भी अब लगने लगा होगा कि ये बज्जरकांठी हैं, मानने वाले कहां हैं, चाहे कैसे ही परेशान कर लो। बात तो कुछ है जो हस्ती मिटती नहीं हमारी, या इसे यो भी कहा जा सकता है कि तमाम कारनामे दिखाने के बाद खुद ही ससुरों का शर्म आने लगी होगी, कि पिछले दो एक वर्ष के नए, आए-गए और फर्जी अखबार के संपादकों को तो मान्यता रेवड़ी की तरह बांट दी गई और नैनीताल समाचार जो पिछले तीस-पैतीस वर्षों से छप रहा है और वह भी लालफीताशाहों की छाती पर मूंग दलते हुए, उसे नहीं मिली। वैसे हमें सरकारी मान्यता चाहिए क्या थी, जनता की मान्यता तो हमें कब की मिल चुकी। चलों इस मान्यता को भी मान लिया जाए तो कोई बुराई नहीं। मेरा सुझाव है कि इस मान्यता मिलने के उपलक्ष्य में इस प्रकार का आयोजन अखबार के भीतर ही किया जाए जिससे इन सरकारी तंत्र को संचालित करने वालों को शर्म आए, या खड़ी बोली में इसे चिरोड़ी लगाने जैसा कुछ किया जाए, जो ससुरों को आगे के लिए सबक दिलाता हो बस इतना ही। बधाई, देर आयद दुरुस्त आयद…
राजीव दा सादर प्रणाम
आपको बहुत बहुत बधाई की आपको मान्यता मिल गयी है…में भी पिछले 10 साल से लगा हुआ हूँ लगता है की अगले 10 साल में मुझे भी मान्यता मिल जायेगी. वैसे जिनको लिखना सिखाया उन सभी को मान्यता मिल गयी है…पर अपने से किसी की चमचागिरी नहीं हो सकती ऐसे में मान्यता तो दूर कुछ भी उम्मीद करना बेवकूफी होगी….इसी लिए अपने काम धंदे पर ज्यादा ध्यान दे रहा हूँ ता की पैसा कमा कर मान्यता खरीद सकूँ …ऐसे नहीं तो वैसे..
प्रेम अरोड़ा
काशीपुर
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