(भगत दा द्वारा सम्पादित/प्रकाशित ‘बनरखा’ के प्रवेशांक का शकीय वक्तव्य। – सम्पादक)
प्रकाशकीय ‘वनरखा’ का यह अंक हम केवल एक अनियतकालिक पत्रिका (स्मारिका) के रूप में ही प्रकाशित कर पा रहे हैं। इसके प्रकाशन के पूर्व हमने ‘अरण्या’ नाम से इसके प्रकाशन की घोषणा की थी, परन्तु कतिपय कारणों को ध्यान में रखते हुए, हमे इसमें परिवर्तन करना पड़ा है। हमारा निरन्तर प्रयास रहेगा कि ‘बनरखा’ हर मौसम में एक पाठकों तक पहुँचाई जा सके।
सैद्धान्तिक रूप में ‘बनरखा’ जैसी पत्रिकाओं की आवश्यकता को नजरअन्दाज नहीं किया जा सकता। लेकिन जब साधनहीनता की स्थिति में एक स्वच्छ वैचारिक स्तर पर, इस प्रकार के आयोजनों की व्यावहारिक रूप में बातचीत की जाती है तो यह कितना कठिन हो जाता है इसका अनुभव हमें इस अंक से हुआ है। फिर भी हम अपने कृपालु सहयोगियों व पाठकों के सहयोग से ‘बनरखा’ का यह अंक, जिसे हमारे पाठक केवल स्मारिका के रूप में स्वीकार कर सकेंगे, प्रकाशित करने का गौरव प्राप्त कर रहे हैं। हमारा भावी प्रयास उनकी उदारता व सहयोग पर निर्भर है।
इन्हीं परिस्थितियों में ‘बनरखा’ अनेक महत्वपूर्ण सामग्री इस अंक में प्रकाशित नहीं कर सकी है। पर्वतीय क्षेत्रों में उगने वाली बाँज प्रजाति, गुजरात की संगठित वन मण्डलियाँ, तरुण (डाइस्कोरियाँ) के प्रयोग व उपलब्धि आदि अनेक लेख प्रकाशित होने से रह गये हैं। इस सामग्री का प्रकाशन आगामी नियमित अंकों में ही किया जा सकेगा।
इस अंक में प्रसिद्ध समाज सेवी सरला बहन, श्री भानुप्रकाश श्रीवास्तव, श्री सुन्दरलाल बहुगुणा आदि के लेखों के अतिरिक्त वन श्रमिक चेता व वनोपज पर आधारित लघु उद्योगों के प्रतीक में पैंसिल उद्योग पर महत्वपूर्ण सामग्री प्रकाशित की गई है…। ‘वनरखा’ को अधिक उपयोगी बनाने के लिए हम आपके सुझावों का स्वागत करेंगे।
(उत्तराखंड के संदर्भ में विकास के सोच की पड़ताल करता यह लेख आज भी उतना ही प्रासंगिक है, जितना अपने प्रकाशन 1 जून 1980 के समय था। – सम्पादक)
चुनाव, वोट और नारेबाजी की राजनीति में विकास का संदर्भ कहीं न कहीं अवश्य जोड़ लिया जाता है और जनता या मतदाता वह उत्तराखण्ड की हो या पूर्वांचल की, हमेशा बहकती रह जाती है कि अमुक व्यक्ति, या पारटी में कहीं न कहीं उसके विकास में बेहतर भूमिका निभाने की क्षमता है। पिछले दशकों का अनुभव बताता है कि ऐसा कभी नहीं हुआ। अब तक जितने भी विकास हुए हैं- उनमें व्यवस्था की एक प्रक्रिया शामिल है किसी पार्टी या व्यक्ति का चिन्तन नहीं। इस तथाकथित विकास की प्रक्रिया को पूर्ण करने में अनेक घोटाले, हेराफेरियाँ, तिकड़में आती हैं। योजना आयोग द्वारा कल्पित विकास इन चरणों से गुजरता हुआ जब प्रत्यक्ष में जनता के सामने आता है तब लगता है खोदा पहाड़ निकली चुहिया।
उत्तराखण्ड की विकास यात्रा का सर्वेक्षण करें तो यह बात बहुत अधिक स्पष्ट हो जाती है, पर्वतीय क्षेत्र की भूमि कृषि के लिए अधिक उपयुक्त नहीं है और यहाँ की कृषि व्यवस्था पर्वतीय कृषक को आत्मनिर्भर नहीं बना सकती। औसत तीन-चार नाली जमीन वाला कृषक पहाड़ में इसलिये नहीं रह रहा है कि उसे वहाँ रोजी या रोटी मिल रही है, बल्कि उसे अपने पहाड़ से लगाव है जो उसे तमाम दुविधाओं के बाद भी नहीं काट सका है। इस मिट्टी के मातृत्व की रक्षा और पेट की हिफाजत के लिए उसने अपने बेटों को फौज में भर्ती कर दिया था या मैदानी इलाकों में नौकरी की तलाश हेतु भेज दिया है (अपने गाँव से या तहसील से बाहर का इलाका उसे अब मैदानी लगने लगा है)।
किसी सरकारी विकास एजेन्सी ने उसकी इस मानसिक स्थिति का सर्वेक्षण नहीं किया और उसे जबरदस्ती पहाड़ का कृषक माना जाता रहा। कृषि विकास के नाम पर जर्मनी पैटर्न में बने आयातित हल मुफ्त देने के निर्णय लिये गये। हल बाँटने का प्रस्ताव महानगरों में पढ़े और विदेशियों से प्रभावित अधिकारी विद्वानों के थे। तथाकथित पर्वतीय कृषक की दृष्टि में अनुपयुक्त हल से चार नाली जमीन वाला काश्तकार फिर से आत्मनिर्भर नहीं हो सकता।
आज पहाड़ में रेडियो, ट्रांजिस्टर, टेलिविजन हैं और माना जा सकता है कि वह दिल्ली, लखनऊ या बम्बई की राजनीति से बेखबर नहीं हैं। रेडियो, टेलिविजन जैसी चीजें सरकारी विकास प्रक्रिया का परिणाम न होकर उसकी अपनी विकास प्रक्रिया का परिणाम है। सरकारी विकास प्रक्रिया उसकी 4 नाली जमीन के लिये उन्नत किस्म के मडुवे की किस्में, सोयाबीन इजाद कर रही हैं या बौने गेहूँ, संकर मक्का जैसी फसलें उगाने की सिफारिश कर रही हैं- ये कार्यवाहियाँ सरकारी विकास की उस छिछली और सतही कार्यप्रणाली को उजागर कर रही हैं, जो पर्वतीय कृषक को कभी आत्मनिर्भर नहीं बना सकतीं।
कालांतर में रेडियो, अखबार, बाजार भाव ने उसे बताया है कि किस फसल का आर्थिक पक्ष कैसा है। उसे अपने खेत से बाजार तक पहुँचाने में कितने श्रम और साधनों की आवश्यकता है। लेकिन कृषि महकमे की बड़ी-बड़ी फौजों द्वारा दिये गये अव्यावहारिक ज्ञान ने उसे यह सोचने को विवश किया है कि 4 नाली जमीन में उगने वाले सोयाबीन की कीमत कृषि अफसरों की कार के पैट्रोल की कीमत से शायद निकल सके। सरकारी एजेंसी द्वारा कृषक के लिये किया जा रहा खर्चा और एवज में जो कृषक कमा पता है, उसका अन्तर दशकों से चले आ रहे विकास को उद्घाटित कर रहा है। प्रश्न यह है कि उसके पास जो सीमित जमीन है, नई मडुवे की किस्मों को उगाने से वह आत्मनिर्भर हो जायेगा और मनीआर्डरी अर्थव्यवस्था से उसे मुक्ति मिलेगी।
उद्यान विभाग के नाम पर जो घोषणायें हो रही हैं, वह भी यथार्थ से बहुत दूर हैं। यदि उद्यान विभाग के अधिकारियों को अपने वेतन, पेट्रोल, कार आदि खर्चों को स्वयं उद्यानकर्मियों के सहयोग से निर्मित सरकारी उद्यान की वार्षिक आमदनी से प्राप्त करने को कहा जाये तो उद्यानों का आर्थिक पक्ष स्वतः ही ठीक हो जायेगा। मौसम, पूरे वर्ष की देखरेख, औजार आदि को ध्यान में रखते हुए औसत उद्यानपति एक पूर्ण विकसित वृक्ष से 20 प्रतिशत की दर तक की भी कमाई नहीं कर पाता। इस तरह एक हेक्टेयर भूमि में लगे पौधों से आय केवल पाँच सौ रुपया प्रति वर्ष आती है।
विकास के नाम पर अनुदान की परम्परा चल पड़ी है। हर कृषक अपने अनुभवों से जानता है कि 4 नाली जमीन की फसल या बगीचे से उसका परिवार आत्मनिर्भर नहीं हो सकता। उसे अपनी आजीविका के लिए मजदूरी, शिल्पकला जैसे कुछ व्यवसाय करने ही पड़ते हैं। लेकिन अनुदान के लालच में कुछ न कुछ करने को विवश किया जाता है- उद्यान लगाने, मधुमक्खी पालने, मवेशी पालने यानी बहुउद्देशीय योजनाओं (जो हर वर्ष आती है) में उलझता जाता है और किसी उद्योग विशेष में योग्यता हासिल नहीं कर पाता है। क्योंकि विकास कर्मचारी के निर्धारित तथ्यों की पूर्ति होती है- कृषक के नाम से उसे अनुदान मिल जाता है और योजना आयोग की कल्पित योजना गाँव में मटियामेट हो जाती है।
पंचवर्षीय योजनाओं में सामुदायिक विकास कार्यक्रम के अन्तर्गत पेयजल योजनाओं को प्रारम्भ किया गया। गाँव के सभापति/सरपंचों ने गाँव के सार्वजनिक स्रोतों व नौलों को हथियाया और अपने घर तक पाईप लाईन बिछवा दी। पानी की क्षमता का मूल्यांकन किये बगैर मीलों तक पानी के कोरे पाईप बिछा दिये। वित्तीय वर्ष का भौतिक लक्ष्य भी पूरा हुआ। पानी के नल सूखे रहे। अब गाँव वाले सामुदायिक विकास कार्यक्रमों के अन्तर्गत लगे नलों का उपयोग कपड़े सुखाने वाले हैंगरों के रूप में दिखते हैं- जो सामुदायिक विकास कार्यक्रम के विकास की एक झाँकी है।
स्थानीय लोगों के विकास के नाम पर स्थानीय सहकारी समितियों की बात कही जा रही है। किस समिति में कितने हिस्से हैं, इसका कहीं खुलासा नहीं है। सहकारी समिति के उत्पादन कर्मचारियों का वेतन, फण्ड, स्थानीय रोजगार सम्बन्धी नियंत्रण का कहीं कोई पता नहीं है। वन्य समितियों को ही देखा जा सकता है। सहकारी समितियों ने ही कितने स्थायी व अस्थायी वन श्रमिक नियुक्त किये हैं, उनका वेतन क्या है, श्रम विभाग की सूचना के अनुसार उनके द्वारा फण्ड व दूसरी क्या सुविधायें दी जा रही हैं जो उन्हें ठेकेदार नहीं देता था ?
विकास की यह प्रक्रियायें चुनावों के प्रारम्भ से आज तक चली आ रही हैं। देश और प्रदेश के सफेद, पीली, लाल व अन्य रंगों की टोपियाँ धारण करने वाले, गांधी, लोहिया, नेहरू, अम्बेडकर आदि सिद्धान्तवादियों अनुयायियों को सत्ता सौंपी। इस कुर्सियों में सिद्धान्तवादी बदलते रहे और खो-खो की तरह आते रहे परन्तु विकास प्रक्रिया में कोई अन्तर नहीं आया। कभी पार्टी अध्यक्ष का नाम कभी संयोजक का। नामों के बदलने या बदलवाने की खींचातानी होती रही। चुनाव इसी खींचातानी के परिणाम है। चुनावों से छोटे-बड़े का अन्तर अवश्य कम हो रहा है, परन्तु पहाड़ की 4 नाली भूमि वाला कृषक यह नहीं सोच सकता कि वह गाँव में ऐसा क्या करे, जिससे उसकी आमदनी कम से कम सरकारी दफ्तर में दी जाने वाली न्यूनतम तनख्वाह के बराबर न सही, लगभग उसके बराबर तो हो। ऐसा चिन्तन किसी विकास ऐेजेन्सी के मेनीफेस्टों में नहीं है।
(नैनीताल समाचार वर्ष 3, अंक 19-20, 15 मई – 1 जून 1980)