सरजु-गुमती संगम में
गंगजली उठूँलो,
उत्तराखण्ड ल्ह्यूँलो भुलू उत्तराखण्ड ल्ह्यूँलो![]()
उतरैणी कौतीक हिटौ
वैं फैसाल करूँलो,
उत्तराखण्ड ल्ह्यूँलो भुलू उत्तराखण्ड ल्ह्यूँलो
धन मयेड़ी छाति उनरी
धन त्यारा ऊँ लाल
बलिदानैकी जोत जगै
ढोलि गै जो उज्याल
खटीमा, मँसुरि, मुजफ्फर कैं
हम के भुली जूँलो
उत्तराखण्ड ल्ह्यूँलो भुलू उत्तराखण्ड ल्ह्यूँलो
बैणी फाँसि नि खाली जाँ
रौ नि पड़ाल भाई
मेरि बाली उमर नि माजैलि
तलि उनाँ कढ़ाई
रम, रैफल, लैफ्ट-रैट कसि हुँ छो बतूँलो
उत्तराखण्ड ल्ह्यूँलो ज्वानो उत्तराखण्ड ल्ह्यूँलो
मैसन हुँ घर कुड़ी हो
भैंसन हुँ खाल
गोरु-बाछन हुँ गोचर हो
चाड़-प्वाथन हुँ डाल
धुर-जंगल फूल फुलौ,
यस मुलुक बणूँलो
उत्तराखण्ड ल्ह्यूँलो भुलू उत्तराखण्ड ल्ह्यूँलो
कास ह्वाल पधान गौंका,
कास हमार नेता
कसि होली विकास नीति,
कैसी होली व्यवस्था
जड़ि कंजड़ि उखेलि भलीकै
पुर बहस करूँलो
उत्तराखण्ड ल्ह्यूँलो भुलू उत्तराखण्ड ल्ह्यूँलो
पाणिक नल में पाणि ए जौ,
बलफ में उज्याल
दुख बिमारी में मिलि जौ दवाई अस्पताल
सबनै हूँ बराबरी हौ, सबनै कैं बतूलो
उत्तराखण्ड ल्ह्यूँलो भुलू उत्तराखण्ड ल्ह्यूँलो
साँच नि मराल झुरिझुरी जाँ,
झुट नि डौरी पाला
लिस, लाकाड़, बजरि चोर
जाँ नि फौंरि पाला
जदिन जालै यस नि है जौ,
हम लड़ते रूँलो
उत्तराखण्ड ल्ह्यूँलो भुलू उत्तराखण्ड ल्ह्यूँलो
जाति-पाति, नान-ठुल को
नी होलो सवाल
सबै उत्तराखण्डि भया
हिमाला का लाल
यो धरती सबनकी छू, सबै यती रूँलो
उत्तराखण्ड ल्ह्यूँलो विकैं मनकसो बडूँलो
यस मुलुक बणैं आपुण
उनन कैं देखूँलो उत्तराखण्ड ल्ह्यूँलो भुलू उत्तराखण्ड ल्ह्यूँलो
- गिर्दा
(कुली बेगार आन्दोलन के 75 वर्ष पूरे होने पर वर्ष 1995 की उतरैणी के अवसर ’पहाड़’ द्वारा निकाली गई यात्रा के लिये गिरदा ने यह गीत लिखा और यात्रा में गाया भी। बाद के दौर में भी, शुरू की 4 पंक्तियाँ निम्नानुसार बदलकर यह गीत काफी लोकप्रिय रहा।)
अर्जुनै थैं कृष्ण कूँछो,
सारि दुनी भै रणभूमि यो
रण बैं काँ बचूँलो…
अल्फ्यारैकि लम्बी छू रण,
लड़ बेर जितूँलो