प्रस्तुति: राजेन्द्र तिवारी
औद्योगीकरण के प्रसार से पिछले 50 वर्षो में कृषि योग्य भूमि के क्षेत्रफल में लगातार कमी हो रही है। मगर खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित करने में श्रीविधि (System of Rice Intensification – SRI)वरदान साबित हो सकती है। उत्तराखण्ड के पहाड़ी भूभाग के परिपे्रक्ष्य में कृषि जोतें छोटी एवं बिखरी होने के साथ-साथ कुल नाप भूमि (लगभग 7 प्रतिशत) भी विकास कार्यो के चलते सिकुड़ती जा रही है। कम जमीन में अधिक फसल देने वाली श्रीविधि यहाँ के काश्तकारों के लिए अच्छी पहल हो सकती है।
आईआईटी मुम्बई के स्नातक एवं लोक विज्ञान संस्थान के संस्थापक डॉ. रवि चोपड़ा के अथक प्रयासों एवं प्रयोगों से हिमांचल, झारखण्ड तथा उत्तराखण्ड में 2006 से इस विधि के प्रयोग धान, गेहूँ, मडुवा, राजमा की फसलों में किये गये। संस्थान के एसआरआई प्रभारी अनिल गौतम और रिसर्च असिस्टेंट हरेन्द्र कुमार ने बताया कि 80 के दशक में मेडागास्कर के पादरी के प्रयोगों को पहाड़ी वातावरण में लागू करना वास्तव में चुनौती का कार्य था। उन्होंने बताया इस विधि में कम बीज, कम पानी तथा समय की बचत के साथ फसल में दोगुनी तक बढत देखी जा रही है।
वर्तमान में गरुड़, कौसानी, सोमेश्वर, चौखुटिया, उत्तरकाशी, चमोली आदि जगहों पर हजारों किसान इस विधि को अपना रहे हैं। बीवीवीएम चैखुटिया के सचिव आनन्द किरौला ने बताया कि श्रीधान पद्धति में पंचगव्य तथा मटका खाद अपनाकर किसान जैविक उत्पादन में मात्रात्मक अन्तर से सन्तुष्ट हैं। इसी कार्य से जुड़े मदन रावत ने बताया बीडर और वर्मी कम्पोस्ट के प्रयोग से महिलाओं के कार्य बोझ में कमी आई है और वे खेती से समय बचाकर बच्चों की परवरिश तथा अन्य व्यवसायों में उसका उपयोग कर रही हैं।
पारम्परिक तरीके से धान की रोपाई में नर्सरी में पौधा 30 से 45 दिनों तक रखा जाता है। श्रीविधि में मात्र 8 से 12 दिन का पौधा लगाने से अनावश्यक श्रम से बचा जा सकता है। दूसरी तरफ 8 से 10 इंच के वर्ग में पौध रोपण से खेत में रोपाई दु्रत गति से हो जाती है। श्रीविधि से जुड़े किसान श्याम सिंह का कहना है कि समय की बचत को देखते हुए इसे हुड़किया बौल की संज्ञा दी जा सकती है। आज जरूरत है श्रीविधि और इससे सम्बन्धित यंत्रों को काश्तकारों तक समय पर पहुँचाकर, कृषि विमर्श समूहों के साथ नियमित चर्चा तथा तकनीकी ज्ञान देने की। आने वाले वर्षो में श्रीधान विधि सिंचित व असिंचित भूमि में वर्षा के जल संचय के प्रयोगों द्वारा वरदान साबित हो सकती है।