उत्तराखण्ड राज्य स्थापना के सात वर्षों के भीतर खटीमा, मसूरी, मुजफ्फरनगर, श्रीयंत्र टापू, देहरादून, नैनीताल व कोटद्वार में हुई शहादतों का स्मरण औपचारिकता मात्र रह गया है। आन्दोलनकारियों की शहादत को ‘बलिदान दिवस’ के रूप में मनाने वालों की संख्या अब अंगुलियों पर गिनी जाने लगी है। शहीदों को याद करने के लिए आयोजित कार्यक्रम शक्ति प्रदर्शन के लिये रह गये हैं। आज के विद्यार्थियों को यह तक पता नहीं है कि ‘उत्तराखण्ड राज्य’ हासिल करने के लिए कितने लोगों ने अपना बलिदान दिया। आन्दोलन का ऐतिहासिक संघर्ष किस्से-कहानियों और बीते कल की बात हो चुका है। जो भी सरकार सत्ता में आयी, उसने आन्दोलनकारियों के लिये सिर्फ वायदे ही किये। कांग्रेस सरकार ने अपने कार्यकाल में बाकायदा ‘उत्तराखण्ड राज्य आन्दोलनकारी कल्याण परिषद’ का गठन तक किया। किन्तु आज तक राज्य आन्दोलनकारियों के चिन्हीकरण के लिए कोई ठोस नीति नहीं बन पाई। जो व्यक्ति गोलियों का शिकार हुए या जेल गये और उनके पास गिरफ्तारी का प्रमाणित रिकार्ड था वे तो आन्दोलनकारियों की श्रेणी में आ गये। किन्तु जो व्यक्ति वर्षों तक धरने, प्रदर्शनों में शिरकत करते रहे किन्तु जेल नहीं गये ऐसे लाखों व्यक्ति आज भी अधिकृत आन्दोलनकारियों की श्रेणी में नहीं हैं। जबकि बड़ी तादाद उन लोगों की रही है जो जेल तो नहीं गये, लेकिन महीनों तक धरने, प्रदर्शन करते रहे, जुलूस निकालते रहे, भूख हड़ताल की, पुलिस की लाठियाँ खाई, उत्पीड़न झेला, लेकिन हिम्मत नहीं हारी। महिलाओं ने अपने खेत-खलिहानों को छोड़ कर आन्दोलन में भागीदारी की, ग्रामीणों के पशु भूखे-प्यासे खूँटे से बँधे रहे। कर्मचारियों ने अपनी नौकरी दाँव पर लगाई, व्यापारियों का व्यापार चौपट हुआ, अधिवक्ताओं ने अपनी प्रैक्टिस छोड़ी तो विद्यार्थियों ने अपना कैरियर और भविष्य दाँव पर लगाया। लेकिन वे आन्दोलनकारी नहीं माने जा रहे हैं।
13 साल पहले विभिन्न दूरस्थ और दुर्गम आन्दोलन के ऐसे केन्द्रों में जहाँ पुलिस और स्थानीय अभिसूचना इकाई ने अपने अभिलेखों में आन्दोलनकारियों को ‘अज्ञात’ दर्शाया है वह ‘ज्ञात’ कैसे होगा ? हरिद्वार जनपद का ही उदाहरण लें तो यहाँ 8000 ‘अज्ञात’ आन्दोलनकारी होने की बात पुलिस विभाग स्वयं स्वीकार करता है। पर वे आठ हजार आन्दोलनकारी कौन से हैं ? देहरादून जनपद में 3,804 आन्दोलनकारी चिन्हित हुए हैं। इनमें 1184 महिलायें और 2640 पुरुष हैं। अल्मोड़ा जनपद में 107, चम्पावत में 61, उत्तरकाशी में 2,275 आन्दोलनकारी चिन्हित हुए हैं जबकि जिलाधिकारी के अनुसार यह संख्या 117 है। ये संख्यायें अपने आप में विरोधाभासी हैं। क्या उपरोक्त वर्णित लोगों ने ही पृथक राज्य के लिए आन्दोलन लड़ा था ? यह तय है कि अगर ‘राज्य आन्दोलनकारी’ की उचित परिभाषा तय नहीं हुई तो आने वाला इतिहास यही बतायेगा कि आन्दोलनकारी सिर्फ गिनती के वही लोग हैं, जो सरकार द्वारा चिन्हित हैं। ज्ञातव्य है कि पृथक राज्य के लिए छिटपुट आन्दोलन साठ के दशक से शुरू हो गये थे। उक्रांद के जन्म के बाद आन्दोलनों की एक लम्बी श्रृंखला चली। 1994 में तो बच्चे, बूढे़, जवान सभी आन्दोलनकारी बन गये थे। लेकिन राज्य सरकार द्वारा आन्दोलनकारियों के कल्याण के लिए जो नीतियाँ तय हुई इसमें निम्न बातें प्रमुख रूप से शामिल थीं:-
1. राज्य आन्दोलन के दौरान घायल तथा 7 दिन से अधिक की अवधि के लिए जेल भेजे गये आन्दोलनकारियों को आयोग की परिधि से बाहर समूह ‘ग’ तथा समूह ‘घ’ के पदों पर नियुक्ति प्रदान करना।
2. 7 दिन के कम जेल जाने वाले आन्दोलनकारियों को राजकीय सेवा में छूट, चयन में 5 प्रतिशत का अधिमान तथा आगामी 5 वर्षों के लिए 10 प्रतिशत क्षैतिज आरक्षण की सुविधा देना।
3. घायल तथा जेल भेजे गये आन्दोलनकारियों को पहचान पत्र देना।
4. घायल तथा जेल भेजे गये आन्दोलनकारियों को विधानसभा तथा सचिवालय में वरीयता के आधार पर प्रवेश पत्र दिया जाना।
उत्तराखण्ड आंदोलन के दौरान घायल एवं जेल में निरुद्ध आंदोलनकारियों को सेवायोजित किए जाने के सम्बन्ध में हरिद्वार जनपद से तीन व्यक्तियों को नियुक्ति मिली। इसी जनपद से प्रकाश चन्द कांति, जो आंदोलन के दौरान गोली लगने से 80 प्रतिशत विकलांग हुए थे, की पत्नी ने नौकरी करने से इंकार कर दिया था। बागेश्वर जनपद में भी तीन लोगों को राज्य आन्दोलनकारी होने के नाते राजकीय नियुक्ति मिलीं। जनपद के ही खिलानन्द जोशी पुत्र गोपालदत्त जोशी की आयु 50 वर्ष से अधिक आयु होने के कारण उन्होंने पेंशन देने का निवेदन किया। यह प्रकरण गृह विभाग के विचाराधीन है।
पिथौरागढ़ जनपद में चार आन्दोलनकारियों को सेवायोजित किया गया। देहरादून जनपद में 294 लोगों के नाम आन्दोलनकारियों की उस सूची में अंकित हैं, जो शासन ने सेवायोजन सम्बन्धी प्रक्रिया के लिए तैयार की है। सूची के अनुसार 62 आन्दोलनकारियों ने योग्य आयु न रहने, आन्दोलनकारी की मृत्यु होने अथवा अन्य कारणों से अपने आश्रितों की नियुक्ति के लिए आवेदन हुए हैं। अगस्त 2007 तक जनपद के 141 आन्दोनकारी सेवायोजित हो चुके थे और 10 आन्दोलनकारियों के नाम प्रस्तावित थे। सेवायोजन सम्बन्धी प्रक्रिया के अन्तर्गत रोजगार चाहने के लिए 60 आन्दोलनकारियों ने शासन के समक्ष सम्बन्धित प्रमाण-पत्र प्रस्तुत नहीं किये।
चमोली जनपद में उन 16 आन्दोलनकारियों को राजकीय सेवा में सेवायोजित किया गया जो तृतीय एवं चतुर्थ श्रेणी के पदों हेतु निर्धारित अर्हता पूर्ण करते थे। टिहरी जनपद में अब तक 44, उत्तरकाशी जनपद में 28, रुद्रप्रयाग जनपद में 16, अल्मोड़ा में 12 और चम्पावत जनपद में 39 राज्य आन्दोलकारियों को सरकारी नौकरियों में नियुक्ति प्रदान की जा चुकी है। शेष जिलों में भी कुछ आन्दोलनकारी राजकीय सेवाओं में सेवायोजित किए गये हैं लेकिन यह संख्या राज्य आन्दोलनकारियों की वास्तविक संख्या के अनुपात का एक प्रतिशत भी नहीं है।
पिछले 12-13 वर्षों में कई आन्दोलनकारी ‘राज्य आन्दोलनकारी’ घोषित हुए बिना दुनिया छोड़ गये हैं। अनेक शरीर से इतने अशक्त और बीमार हैं कि सेवा के योग्य नहीं हैं। दर्जनों लोगों ने स्वयं के स्थान पर आश्रितों को रोजगार देने के लिए आवेदन किया, लेकिन उन पर ‘विचाराधीन’ का लेबल लगा कर रख दिया गया है। शेष जो आन्दोलनकारी दुरुस्त हैं, वे राज्य आन्दोलनकारियों की श्रेणी में ही नहीं हैं।


























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