प्रवीन कुमार भट्ट
हिन्दू मान्यताओं के अनुसार महाकुंभ का आयोजन 14 पूर्णकुंभों के पूरे होने पर 144 सालों में एक बार किया जाता है, लेकिन अखिल गायत्री परिवार ने अपने संस्थापक आचार्य श्रीराम शर्मा का जन्मशताब्दी समारोह गायत्री महाकुंभ के नाम से आयोजित कर इस आयोजन को एक तरह से महाकुंभ के समकक्ष ही खड़ा करने की कोशिश की। आयोजन की भव्यता और इसके विशाल स्वरूप को भी कुंभ के बराबर ही दिखाने में गायत्री परिवार ने कोई कसर नहीं छोड़ी। 6 से 10 नवम्बर तक आयोजित गायत्री महाकुंभ के लिए 28 देशों से प्रतिनिधियों के पहुँचने के साथ ही देश भर से लाखों लोग हरिद्वार पहुँचे थे। इस आयोजन के लिए पूरे कुंभमेला क्षेत्र को अधिगृहित कर 24 अस्थाई नगर बसाए गए थे। लेकिन इतना बड़ा आयोजन करना शांतिकुंज को तब महंगा पड़ गया, जब आयोजन के तीसरे दिन 8 नवम्बर को लालजीवाला क्षेत्र में बनी यज्ञशाला में मची भगदड़ के बाद 20 लोगों की मौत हो गई और 50 से अधिक लोग घायल हो गए। गायत्री परिवार इतने अतिविश्वास में रहा कि उसने पुलिस और प्रशासन को भरोसे में लेने की भी जरूरत नहीं समझी। प्रशासन भी गायत्री परिवार के हजारों पीतवस्त्रधारी स्वयंसेवकों को देखकर आश्वस्त रहा, लेकिन यह बेपरवाही बहुत महंगी साबित हुई।
घटनास्थल पर 4 घंटे बाद ही पहुँच पाये जिलाधिकारी हरिद्वार मृतकों और घायलों की संख्या के बारे में कुछ बता पाने में भी असमर्थ थे। आयोजन में अति विशिष्ट हस्तियों की आवाजाही के कारण भी प्रशासन गायत्री परिवार के संचालन में दखलअंदाजी की स्थिति में नहीं रहा। आयोजन के स्थगित होने से पूर्व महज तीन दिनों तक चले इस महाकुंभ में भुवन चंद्र खंडूड़ी, डॉ. रमेश पोखरियाल ‘निशंक’, भगत सिंह कोश्यारी, हरीश रावत, हिमाचल के मुख्यमंत्री प्रेम कुमार ‘धूमल’, मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान, भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन गडकरी, गुजरात की राज्यपाल कमला बेनीवाल के साथ ही फिल्म अभिनेता गोविंदा भी यहाँ पहुँचे। हरीश रावत ने तो दुर्घटना के पहले दिन पहले गायत्री महाकुंभ को बीते साल हुए कुंभ से भी बेहतर आयोजन करार दिया था। उनका कहना था कि ‘अगर प्रणाम करना हो तो मैं दोनों आयोजनों में से इसी आयोजन को प्रणाम करना चाहूंगा।’
महीने भर से चाक चौबंद दिख रही गायत्री परिवार के स्वयंसेवकों की व्यवस्था मंगलवार की सुबह अधिक भीड़ होने के कारण पूरी तरह से चरमरा गई। लालजीवाला में बनाई 1551 कुंडीय यज्ञशाला में हवन करने के लिए हादसे के समय 50 हजार से अधिक श्रद्धालु कतार में लगे हुए थे। एक किमी से अधिक लंबी इस कतार को संभालने के लिए गायत्री परिवार के 25 सौ स्वयंसेवक लगे हुए थे। 1551 कुंडों में प्रत्येक कुंड में 10 श्रद्धालुओं के एक साथ यज्ञ करने की व्यवस्था की गई थी। जिस समय वहाँ भगदड़ मची यज्ञशाला के भीतर लगभग 20 हजार लोग मौजूद थे। प्रवेश करने के लिए केवल एक गेट का प्रयोग किया जा रहा था जिस कारण इस गेट के बाहर हजारों लोगों की भीड़ जमा हो गई, जबकि भीतर कुंडों से निकल रहे धुएँ से यज्ञशाला के अंदर भी दम घुटने जैसे हालात बन गए। जो लोग चारों ओर से टैंट लगाकर तैयार की गई इस यज्ञशाला में यज्ञ कर चुके थे उन्हें बाहर निकलने की जल्दी थी और जो लोग बाहर थे वे जल्दी अंदर पहुँचकर यज्ञ करना चाहते थे। इसी अफरातफरी में करीब पौने ग्यारह बजे बाहर की तरफ से आती भीड़ ने धक्कामुक्की शुरू कर दी। कुछ लोगों ने बाँस का सुरक्षा घेरा तोड़ दिया और वहां से भी लोग अन्दर जाने लगे। धक्कामुक्की की चपेट में आकर जो भी नीचे गिरा उसे संभलने का मौका नहीं लगा। मारे गए लोगों में 18 महिलाएं व दो पुरुष शामिल हैं। इस हादसे से 50 से अधिक घायल अभी भी हरिद्वार के अलग-अलग अस्पतालों में अपना इलाज करा रहे हैं जबकि कई लोग अब भी लापता हैं, जिन्हें उनके परिजन अस्पतालों में खोज रहे हैं।
इस हादसे के दौरान गायत्री परिवार से जुड़ी सामाजिक, राजनीतिक हस्तियों ने भी कम संवेदनहीनता नहीं दिखाई। 20 लोगों की मौत के बाद भी हवन जारी रहा और हिमांचल के मुख्यमंत्री प्रेम कुमार ‘धूमल’ यज्ञशाला में हवन करते रहे। जिस समय मृतक और घायलों को अस्पताल ले जाया जा रहा था, उस समय भगत सिंह कोश्यारी व बिशन सिंह चुफाल निकट ही एक मंच पर भाषणबाजी कर रहे थे। उनके बाद देर शाम तक उस मंच पर नितिन गडकरी, भाजपा के राष्ट्रीय संगठन मंत्री रामलाल और मदन कौशिक आदि बड़े नेताओं की मौजूदगी बनी रही। गायत्री परिवार दुनिया भर में फैले अपने लाखों मानने वालों को हरिद्वार तक पहुँचाकर अपनी शक्ति प्रदर्शित करने में तो कामयाब रहा लेकिन उसके डिजास्टर मैनेजमेंट के दावे उस समय हवाई साबित हो गए, जब घायलों को बेस अस्पताल में ले जाया गया। उस अस्पताल में न तो सपोर्टिंग स्टाफ की व्यवस्था थी, और न उपकरणों की। घायलों को स्ट्रेचर न होने के कारण कंबलों में रखकर वार्डाें तक पहुँचाया गया। हादसे के बाद गायत्री परिवार के एक प्रवक्ता दिव्येश व्यास ने बाद में यह तक कह डाला कि यह मामूली हादसा था जिसमें केवल 4-5 लोग मरे हैं। महाकुंभ के सारे कार्यक्रम जारी हैं और हिमाचल के मुख्यमंत्री ने उसके बाद यज्ञ किया है। दरअसल गायत्री परिवार प्रबंधन घटना को कम बता कर कार्यक्रम को जारी रखना चाहता था, लेकिन इतनी मौतों के बाद उपजे गुस्से के कारण उसे यह महाकुंभ बुधवार को समाप्त करना पड़ा।
पुलिस ने घटना के बाद आयोजकों के खिलाफ गैर इरादतन हत्या का मामला दर्ज किया है, लेकिन घटना से पहले लाखों लोगों की मौजूदगी वाले इस आयोजन में प्रशासन की स्थिति मूकदर्शक जैसी ही रही। कुंभ, अर्द्धकुंभ जैसे आयोजनों के लिए तो शासन-प्रशासन महीनों से तैयारी करता है। लेकिन जब गायत्री परिवार पिछले एक साल से यह दावा कर रहा था कि महाकुंभ में 50 लाख से अधिक लोग भाग लेंगे तो प्रशासन ने इस बात को गंभीरता से क्यों नहीं लिया ? मुख्यमंत्री ने पूर्व में गायत्री परिवार को हर संभव सहायता का भरोसा दिलाया था, लेकिन बावजूद इसके सैक्टर मजिस्ट्रेट नियुक्त किए गए अधिकारी अपने सैक्टरों मंे नहीं पाए गए। इस तरह के आयोजनों से पहले संभावित आतंकी घटनाओं को रोकने की रणनीति भी बनाई जाती है, लेकिन यहाँ ऐसा कोई होमवर्क नहीं दिखाई दिया। जबकि गायत्री महाकुंभ में पहुँची भीड़ अर्द्धकुंभों के दौरान पहुँचने वाली भीड़ से अधिक थी। 6-7 नवम्बर को इस आयोजन में 15-20 लाख लोगं पहुँचे और 9-10 नवम्बर को पूर्णाहुति के समय 80 लाख तक पहुँचने की बात कही जा रही थी। इसके बावजूद प्रशासन ने कोई हस्तक्षेप नहीं किया और शांतिकुंज ने ही कमान संभाले रखी। अब जिलाधिकारी डी. सैंथिल पांडियन ने हादसे के बाद मामले की मजिस्ट्रेट जाँच एडीएम प्रशासन जीएस रावत को सौपी है। लेकिन पुलिस द्वारा दर्ज की गई रिपोर्ट में सिर्फ धुआँ अधिक होने और दम घुटने से मची भगदड़ को ही आधार बनाये जाने से साफ है कि इस मामले को टालने की तैयारी है।
लगातार फैलते ईंट-कंकड के जंगल और सिमटते मैदानों के कारण अब हरिद्वार की स्थिति बड़े मेले कराने की नहीं रही है। 1996 में सोमवती अमावस्या के दिन शताब्दी पुल पर हुए हादसे के बाद गठित राधाकृष्ण आयोग भी इसी निष्कर्ष पर पहुँचा था। हरिद्वार में इससे पहले 1962 में सोमवती अमावस्या के दिन हर की पैड़ी के पास मची भगदड़ में 70 लोगों की मौत हुई। 1974 में भी हर की पैड़ी के पास दर्जनों लोगों की जानें गईं। 1986 में महाकुंभ के दौरान चमगादड़ टापू पुल के पास मची भगदड़ में 35 लोग मारे गए जबकि 1996 में सोमवती अमावस्या के दिन संजय पुल पर मची भगदड़ में 29 लोग मारे गए। 1998 की कार्तिक पूर्णिमा के दिन मंसा देवी मंदिर के पास मची भगदड़ में 18 और 2010 में हुए महाकुंभ के दौरान ललताराव पुल के पास हुई भगदड़ में भी सात लोगों की मौत हुई थी। 2010 महाकुंभ में हुए हादसे के बाद मेलाधिकारी ने शासन को जो प्रतिवेदन भेजा था उसमें भी कुंभनगरी हरिद्वार को बड़े आयोजनों के लिए कम बताया गया था। इस प्रतिवेदन में आयोजनो में वीआईपी का आना भी व्यवस्था के लिए परेशानी पैदा करने वाला बताया गया था।
अब इस मामले में राजनीति भी शुरू हो गई है। संत समाज से भी विरोधाभासी बातें सामने आ रही हैं। मामले को लेकर अखिल भारतीय अखाड़ा परिषद भी टूटा हुआ है। अखाड़ा परिषद के महामंत्री हरिगिरी महाराज ने प्रशासन को जिम्मेदार बताते हुए उस पर सुरक्षा व्यवस्था न करने का आरोप लगाया है तो परिषद के राष्ट्रीय अध्यक्ष महंत ज्ञानदास ने इस हादसे के लिए गायत्री परिवार के प्रमुख डा. प्रणव पंड्या को जिम्मेदार बताया। उन्होंने पंड्या का स्वयं को सर्वश्रेष्ठ साबित करने की मानसिकता को हादसे की वजह बताया। उन्होंने इस तरह के किसी एक सम्प्रदाय विशेष के आयोजन को कुंभ नाम देने की भी आलोचना करते हुए पूछा कि यदि यह कुम्भ था तो क्यों इसमें एक भी संत शामिल नहीं हुआ ? उधर डा. प्रणव पंड्या जाँच में पूरा सहयोग देने को तैयार हैं। उन्होंने हादसे की नैतिक जिम्मेदारी भी स्वीकार की। उत्तराखंड सरकार, मध्य प्रदेश सरकार, केन्द्र सरकार व गायत्री परिवार ने मिलाकर अब तक हादसे में मारे गए लोगों को 7-7 लाख के मुआवजे का ऐलान कर दिया है।