यह सच है कि औद्योगिक विकास से इस क्षेत्र की बेरोजगारी हल हो सकती है, लोगों का जीवन स्तर सुधरा जा सकता है, लेकिन अब तक यहाँ स्थापित हुए उद्योगों के हश्र से जाहिर होता है कि भारी उद्योगों के लिए भाबर अनुपयुक्त है। सबसे बड़ा उद्योग सेंचुरी पल्प एण्ड पेपर मिल, लालकुआ जन्मकाल से ही विवादों में घिरा रहा है। कई एकड़ जमीन, जिस पर भूमिहीन परिवार बसाये जा सकते थे, पर फैली इस औद्योगिक इकाई में क्षेत्र के कुछ ही लोगों को रोजगार मिल पाया है। जंगलों को इस उद्योग के हवाले होना पड़ा है, प्रदूषण से वातावरण प्रदूषित होता गया है। इस मिल से निकलने वाले रसायन धरती में समाकर भूगर्भीय जल को प्रदूषित कर चुके हैं। तराई की फसलों को इससे नुकसान पहुँचा है। सोयाबीन एवं वनस्पति उद्योग जिस उद्देश्य से स्थापित किया गया, परिणाम उसके विपरीत निकले। एचएमटी घड़ी कारखाना सदैव आर्थिक संकट से ही जूझता रहा। प्रबंधन ने इसे यहाँ बनाए रखने में कभी रुचि भी नहीं दिखाई। दस हजार लोगों को रोजगार देने की घोषणा के साथ स्थापित ‘जेम पार्क’ भूमि घोटालों की लपेट में आकर समाप्त हो गया। 21 एकड़ भूमि पर स्थापित 73.30 करोड़ की लागत का नोवा स्टील प्लांट 17 करोड़ रुपये के विद्युत बिलों की देनदारी व बैंक बकाया छोड़ कर पलायन कर गया। सब्सिडी और अन्य सुविधाओं के लोभ में यहाँ स्थापित किए गए तमाम उद्योग इस बात के उदाहरण हैं कि यह क्षेत्र इस तरह के उद्यागों के लिए अनुपयुक्त है। अब ठगी को भी उद्योग में शामिल कर रहे उद्योगपति राजनीति में घुसपैठ कर अदूरदर्शी राजनेताओं को बहला-फुसला कर पन्तनगर विश्वविद्यालय की भूमि को हड़पने में लगे हैं। रुद्रपुर में स्थापित सिडकुल इस का उदाहरण है। तराई की हरीभरी भूमि, जो 80 के दशक में सोना उगलती थी, अब कंक्रीट के जंगल में तब्दील हो रही है।
सत्तर के दशक तक शादी-ब्याह की रस्में ठेठ ग्रामीण परिवेश में हुआ करती थीं। न्योतिये अलस्सुबह पहुँच कर साग-सब्जी काटने, मसाले घोटने, टेंट-कनात लगाने में जुट जाते। पहाड़ी मूल के लोग भोजन व्यवस्था ग्रामीण ढंग से मिलजुल कर करते थे। 1985 तक हिन्दू धर्मशाला रामपुर रोड, राम मंदिर धर्मशाला और भोलानाथ धर्मशाला व सत्यनारायण धर्मशाला कालाढूँगी रोड के अलावा ऐसा कोई बड़ा स्थान नहीं था, जहाँ बारात की व्यवस्था की जा सके। अधिकांश लोग अपने ही आँगन या आसपास की खाली पड़ी भूमि या सड़क पर छोटा सा टेंट लगा कर शादी की रस्म पूरी कर लेते थे। आज की जैसी सजावट का प्रचलन नहीं था।
अब हर गली में विवाह गृह खुल गए हैं, जिनका किराया ही उस वक्त की पूरी शादी के खर्च से अधिक बैठता है। एक लाख रुपये से ऊपर तो लोग सजावट में खर्च कर रहे हैं। इसका प्रभाव सीमित आमदनी वाले तबके पर पड़ रहा है। बिजली विभाग में काम करने वाले रामदत्त पन्त और नगरपालिका पुस्तकालय की देखरेख करने वाले चन्द्रबल्लभ पांडे जी उन दिनों पहाड़ी पंडितों की ही तरह अधिकांश घरों में रसोइये हुआ करते थे। वणिक वर्ग खाना बनाने के लिए हलवाई बुलाता था। शेष अन्य घरों में भी अपनी-अपनी सामथ्र्य व परिचय के दायरे के अनुसार रसोई का इंतजाम हुआ करता था। टेंट हाउस से बर्तन तभी मँगाए जाते थे, जब किसी कारणवश गुरुद्वारे से बर्तन न मिल पायें। लड़की की शादी में दिन भर काम करने के बाद न्योतिये बारात आने के बाद बिना भोजन किए ही वापस लौट जाते थे। लड़की की शादी में भोजन करना अच्छा नहीं माना जाता था। अब बारातियों से पहले घराती भोजन पर टूटते हैं।
किसी की मृत्यु होने पर श्मशान घाट जाने वाले मलामी को ही बारहवें दिन भोजन के लिए बुलाया जाता था। यदि वह न पहुँचता तो उसके घर चावल-दाल वगैरह पहुँचा दिया जाता। उस भोजन को सिर्फ वही व्यक्ति खाता जो श्मशान घाट गया हो। अब बारहवें दिन के आयोजन को ‘ब्रह्मभोज’ नाम दे कर तमाम परिचितों को स्वादिष्ट पकवान खिलाये जाते हैं। इस दिन सिर्फ बारह दिन तक क्रिया कर्म में बैठे लोग पीपल में पानी देते हैं ताकि इस क्रिया के बाद वे शुद्ध हो सकें। अब एक पीपल की टहनी तोड़ कर आंगन में रोप दी जाती है और हर आमंत्रित से अपेक्षा की जाती है कि वह उस टहनी में पानी डालें। यह बदलती प्रथा भी ‘भबर्योव’ का एक उत्कृष्ट नमूना है।
80 के दशक तक यातायात व्यवस्था बहुत कमजोर थी। आज की तरह रात-दिन सरपट भागने वाले छोटे वाहन नहीं थे। पहाड़ से मैदानी शहरों को तथा मैदान से पहाड़ जाने वालों को हल्द्वानी रुकना पड़ता था। होटल कम थे और अपनी जेब के हालात देख यात्री उनमें टिकना भी पसन्द नहीं करते थे। वे अपने किसी परिचित के घर का रुख करते थे। कुछ घरों में अक्सर मेहमानदारी ही रहती थी। केनाल विभाग में चिटगल (गंगोलीहाट) के नित्यानन्द व मोहन चन्द्र पन्त, दो भाई चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी के पद पर थे। मोहन पन्त जी के क्वार्टर में रोज ही पाँच-सात मेहमान होते। वे बहुत आत्मीयता से उनके खाने, रहने की व्यवस्था करते, बाजार से सामान खरीदने में मदद करते और चूँकि सुबह रिक्शा भी नहीं मिल पाता था, अतः उनका सामान कंधे पर ढोकर उन्हें गाड़ी में बैठा जाते। पहाड़ की ओर जाने वाली गाडि़याँ प्रातः चार बजे से शुरू हो जातीं, उसके बाद कोई वाहन नहीं मिलता था। मेरे आवास पर भी नित्य ही मेहमानदारी बनी रहती थी। मगर स्थान की कमी के बावजूद परेशानी महसूस नहीं होती थी। अपने घर-इलाके के लोगों से मिलने पर आत्मीयता की अनुभूति होती थी। अब तेज रफ्तार जिन्दगी में सरपट भागे चले जाते लोगों में वह लगाव खत्म हो गया है।
सन् 70 तक बहुत से घरों में बिजली नहीं थी। 1956 में नैनीताल रोड पर एक डीजल पावर हाउस लगाया गया था। अब उस स्थान पर विभाग का बहुत बड़ा काम्लेक्स बनाने का प्रस्ताव है। गर्मियों में लोग घरों से बाहर सड़क के किनारे बाण से बुनी बाँस की चारपाइयाँ बिछा कर सोते थे। मच्छरों से बचने के लिए मच्छरदानी लगाते थे। न कोई डर था न भय। घरों के किवाड़ भी खुले रखते थे। पंखा तो बिरले ही घरों में चलता था। हाथ के पंखों की काफी चैल थी। कई सरकारी कार्यालयों में छत पर एक डंडा बाँध कर उस पर एक मोटा कपड़ा लटका दिया जाता था और एक आदमी रस्सी से उसे झलता रहता था। कई घरों में खस की पट्टी लगा कर उस पर पानी छिड़का जाता। अब पंखे छोड़ें, कूलर और ए.सी. सामान्य हो गये हैं। बावजूद इसके लोगों को गर्मी सताती है। पहले हल्द्वानी में लू नहीं चलती थी, अब चलने लगी है। कारण साफ हैं। पेड़ कट गए हैं। न गर्म हवा को रोकने का प्राकृतिक साधन रह गया है और न जाड़ों में तराई से उठ कर आने वाले कोहरे को रोकने का। पहले नैनीताल से लोग जाड़ों में यहाँ आ जाते थे, अब कहते हैं कि जाड़ों में नैनीताल में अच्छी धूप रहती है।
साठ-सत्तर साल पहले मच्छरों का प्रकोप तराई-भाबर में बसने में बाधक था। लोग अक्सर मलेरिया से पीडि़त हो जाते थे। मलेरिया खत्म कर दिया गया और भाबर भी बस गया। मगर अब भी मलेरिया होता है। उससे भी आगे डेंगू आदि का प्रकोप बढ़ गया है। शहर के विस्तार के साथ ही लाइलाज बीमारियाँ भी फैलने लगी हैं। अस्पतालों की संख्या दिन पर दिन बढ़ती ही जा रही है। हर गली, मुहल्ला अस्पतालों से भर गए हैं। इनमें इलाज करा पाना आसान नहीं है। जिसे आज शोबन सिंह जीना बेस अस्पताल कहा जाता है, वह जिला बोर्ड का ‘नागरिक अस्पताल’ था। महिलाओं का अस्पताल नैनीताल रोड पर बाद में बना। मैंने इस अस्पताल में देवकी नन्दन पन्त को एकमात्र डाक्टर के रूप में देखा है। बड़े सेवा भाव से वे मरीजों को देखते थे। उनके पुत्र डॉ. बिपिन चन्द्र पन्त ने मंगल पड़ाव में सन् 68 में दाँतों का निजी अस्पताल खोला। तब हल्द्वानी शहर और आसपास की जनता इसी नागरिक चिकित्सालय पर निर्भर थी। अब यह बहुत बड़ा अस्पताल है। डाक्टरों-नर्सों की लम्बी कतार है, व्यवस्था चौपट है और मरीज असन्तुष्ट।
अब हल्द्वानी में अस्पतालों की संख्या गिनती से बाहर हो गई है। एक से एक काबिल डाक्टर और अनेक विशाल हाइटेक क्लीनिक। जटिल बीमारियों के इलाज के लिए अब पहले की तरह दिल्ली-लखनऊ नहीं जाना पड़ता। लेकिन ऐसी लाइलाज बीमारियाँ भी पहले नहीं हुआ करती थीं। बीमारियाँ बढ़ गई हैं, इलाज का खर्च बढ़ गया है और एक तबके के पास धन भी कम नहीं है। अजवाइन की एक फँकी से अच्छा हो जाने वाला मरीज हजार रुपये इलाज में खर्च करता है। उस जमाने में डाक्टर के पास जाने की कोई फीस नहीं होती थी। अब सरकारी अस्पताल में भी पाँच-दस रुपये की पर्ची कटती है और हर तरह की जाँच के पैसे देने होते हैं।
तब डाक्टरी का पेशा जन सेवा से जुड़ा था। साठ के दशक तक हल्द्वानी में डॉ. रामलाल साह और डॉ जी.डी. पांडे के निजी अस्पताल थे। सीताबर पंत वैद्य, उनके पुत्र उमेश पन्त व डॉ. यमुनादत्त सनवाल नया बाजार, गंगासिंह वैद्य पटेल चौक, मधुसूदन लेाहनी वैद्य कालाढूंगी चौराहे के पास बैठते थे। मेहरा जी का अस्पताल, डॉ. किशन सिंह के अलावा दयाल फार्मेसी और भसीन मेडिकल स्टोर था। सरकारी अस्पताल के सामने एकमात्र दवाइयों की दुकान शिवदत्त पन्त की थी। हर बात पर आलराइट कहने वाले पन्त जी ‘ऑलराइट’ नाम से ही विख्यात हो गये। दयाल फार्मेसी में तेजोनिधि पांडे, भवानीगंज की कपिल क्लीनिक में जगदीश चन्द्र कांडपाल का इलाज चलता था। डॉ. कुन्दन लाल ने 1968 में निजी क्षेत्र की पहली बार एक्स-रे मशीन लगाई थी। उन्हें अमेरिकन मशीनों में कार्य करने का अनुभव था। उनके दादा बद्रीदास का अल्मोड़ा में व्यापार था। कानपुर से एम.बी.बी.एस. कर सन् 1964 में डॉ. कुन्दन लाल ने मीरा मार्ग में क्लीनिक शुरू की। वे आज भी शहर के प्रतिष्ठित चिकित्सकों में से गिने जाते हैं। बाद में मंगल पड़ाव में डॉ. खुराना और उनकी पत्नी ने एक क्लीनिक खोला। सरकारी सेवा छोड़ कर डॉ. पी.सी जोशी ने कालाढूंगी रोड पर ‘कल्याणिका’ नाम से अस्पताल खोला। इलाज के नाम पर कुछ टिंचर-झिंझर बेचने वाले भी हुआ करते थे। सन् 1968 में इसी तरह के एक टिंचरी डाक्टर के इलाज से 21 तथा कुछ ही दिन बाद 8 लोगों की मौत हो गई।
स्टेशन रोड पर डॉ. रामलाल साह और रेलवे बाजार में डॉ. जी.डी. पांडे की गिनती उन दिनों योग्य चिकित्सकों में हुआ करती थी। मूल रूप से पांडेगाँव (भीमताल) के रहने वाले जी.डी. पांडे एक अनुशासित चिकित्सक थे। उनके बैठने का समय नियत था। मरीज को देखने का कोई शुल्क नहीं था। दवा की कीमत आम आदमी के पहुँच के भीतर होती थी। मुम्बई से एमबीबीएस की डिग्री लेकर 1939 में उन्होंने हल्द्वानी में डॉक्टरी शुरू की। वही यहाँ थर्मामीटर लेकर आये थे। मलेरिया, डायरिया जैसी बीमारियों के कारण भाबर से आतंकित लोगों को उन्होंने भरोसा दिलाया कि वह रोग नहीं फैलने देंगे। उन्हें ‘भाबर की लाइफलाईन’ कहा गया। वे आईएमए हल्द्वानी शाखा के संस्थापक प्रेसिडेंट रहे। आज लोग उन्हें भूल गए हैं। ‘भाबर की लाइफलाईन’ की कोई मूर्ति मूर्तियों से पटे इस शहर में नहीं लगी। उनके पुत्र डॉ बी.सी. पांडे उनकी परम्परा निभा रहे हैं।
डॉ. रामलाल साह अच्छे चिकित्सक तो थे ही, सामाजिक कार्यों में भी उत्साह से लगे रहते थे। उन्हें भनक भी लग जाती कि मरीज लाये जाने की स्थिति में नहीं है तो जाड़ा हो, गर्मी हो या बरसात, डॉ. रामलाल साह अपनी साइकिल पर मरीज तक पहुँच जाते। उसे आत्मीयता से देखते, घर के हालचाल पूछते और यदि मरीज आर्थिक रूप से अक्षम होता तो दवा भी मुफ्त में दे देते। तिकोनियां स्थित मनोहर पेट्रोल पम्प से लगे वन विभाग के क्वार्टर में रहते हुए मैंने स्वयं उनसे यह उपकार कृतज्ञतापूर्वक प्राप्त किया। वे एक पोस्टकार्ड हाथ में लिए तलाशते हुए मेरे जैसे एक अपरिचित छात्र के पास चले आये थे। डॉ. रामलाल साह का जन्म 1910 में हुआ था। उनके पिता नैनीताल से आ कर 1890 में हल्द्वानी बस गए। उस समय के बिरले एम.बी.बी.एस. डाक्टरों में से वे एक थे। 1935 में भवाली सेनीटोरियम में तैनात रहे। बेतालघाट में जन सहयोग से उन्होंने एक अस्पताल बनवाया। केजीएमसी लखनऊ के सेंचुरी फाउंडेशन इयर वर्ष 2005 में राष्ट्रपति अब्दुल कलाम ने उन्हें सम्मानित किया। वे आयुर्वेद के भी अच्छे ज्ञाता थे। एलोपैथी और आयुर्वेद के समन्वय से इलाज करते थे। बाद के वर्षों में एक्यूपंक्चर में भी उनकी रुचि बढ़ी। ‘सुश्रुत एण्ड ह्वांग टी नी चिंग’ पुस्तक उन्होंने लिखी। 24 अक्टूबर 2008 को उनका निधन हुआ। तिकोनियां स्थित उनके आवास के पास ही उनके द्वारा स्थापित श्रीराम हॉस्पिटल को उनके ज्येष्ठ पुत्र डॉ. उमेश साह व बहू डॉ. कृष्णा साह चलाते हैं।
सामाजिक वानिकी के लिए पड़े करोड़ों रुपये की धनराशि को ठिकाने लगाने के लिये आग से झुलसे हुए रोगियों का इलाज करने का मुद्दा उठा तो ‘फॉरेस्ट हास्पिटल ट्रस्ट’ बना कर एक वन चिकित्सालय खोल दिया गया, जिसमें आज तक जले हुए मरीजों के लिये कोई विभाग नहीं है। ट्रस्ट के कर्ताधर्ता वन विभाग और वित्त विभाग के अधिकारी हैं। नारायणदत्त तिवारी की पत्नी की मृत्यु हुई तो चापलूसी में आकंठ डूबे कांग्रेसियों ने इस अस्पताल को उनके नाम करवा दिया, जबकि इन्दिरा गांधी ने यह स्पष्ट निर्देश दिये थे कि ‘कोई मुख्यमंत्री सरकारी खजाने से अपने किसी परिजन के नाम से कोई संस्था न खोले।’ सुशीला तिवारी न स्वतंत्रता सेनानी थीं और न ही कोई सामाजिक कार्यकर्ता। शुरू से ही यह अस्पताल विवादास्पद रहा है और इन दिनों अपनी अराजकता के कारण विख्यात है।
जिस भूमि पर ट्रस्ट ने कब्जा कर मेडिकल कालेज बनाया है, वह कृषि विभाग की है। पीपुल्स कालेज नाम की एक संस्था भी वहाँ पर थी। इस कालेज और इसके साथ तिवारी जी के कारनामों का एक लम्बा और घटनापूर्ण इतिहास रहा है। अनुसूचित जाति-जनजाति के लोगों को एक सप्ताह के प्रशिक्षण के बाद प्रधानाचार्य की हैसियत से नारायणदत्त तिवारी के हस्ताक्षर से एक प्रमाणपत्र दिया जाता था। तब यह आरोप लगा था कि पीपुल्स कालेज सीआईए से प्राप्त धन से बना है। उ.प्र. विधान सभा में प्रजा सोशलिस्ट पार्टी ने तथा सोशलिस्ट पार्टी ने इस मुद्दे पर हंगामा किया। यह प्रश्न लोकसभा में भी उठा। उस समय तिवारी जी ने सीआईए से धन लाने की बात स्वीकार भी की। तब मुख्यमंत्री गोविन्द बल्लभ पन्त और चन्द्रभानु गुप्त ने तिवारी को बचाया। कहा गया कि पीपुल्स कालेज का सरकार ने अधिग्रहण कर लिया है। अब वहाँ पंचायती राज प्रशिक्षण केन्द्र बनेगा। उस वक्त तो पीपुल्स कालेज का अध्याय बन्द हो गया। परन्तु उप्र का मुख्यमंत्री बनते ही तिवारी जी ने अपने पिता पूर्णानन्द जी की मूर्ति पीपुल्स कालेज में लगा दी।
बहुत ही रोचक जानकारी से भरा यह क्रम हल्द्वानी की सही पहचान दे रहा है – लेखक पुन: बधाई के पात्र हैं !