15 अगस्त 1978 का दिन। एक ग्राहक मेरे सामने खड़ा था, ‘‘मुझे अखबार छपवाना है।’’ एक छोटा छापाखाना कैसे नियमित रूप से किसी दूसरे का अखबार छाप सकता है ? यही बात मैंने उसे समझानी चाही। अलबत्ता सीमान्त मुनस्यारी के दुर्गासिंह मर्तोलिया को मैं पहचान गया था। वह एक जमाने में नैनीताल के डी.एस. बी. कालेज छात्र संघ का अध्यक्ष रह चुका था। मैं बोलता रहा, वह मिट्टी का माधो बना सब कुछ सुनता रहा। अन्त में हँसते हुए बोला, मैं जो तलाश कर रहा था, मुझे मिल गया। तेरा जैसा बेवकूफ नहीं मिल पा रहा था। कहाँ से बातें शुरू हुई थीं कहाँ पहुँच गईं! एक विशुद्ध घाटे के सौदे को स्वीकार कर लिया हम दोनों ने। न अखबार उसका रहा, न मेरा। एक मिशन बन गया।
30 अक्टूबर सन् 1978 को ‘पिघलता हिमालय’ को हमने साप्ताहिक के रूप में शुरू किया। एक ही वर्ष में मर्तालिया ने उसे सीमान्त के दुर्गम गाँवों तक पहुँचा दिया। उन गाँवों के पाठकों का दबाव ऐसा रहा कि 19 दिसम्बर 1979 को हमें इसे दैनिक का रूप देना पड़ा। इसके पीछे मर्तालिया की जिद थी। लेकिन वह पटु व्यवसायी भी अखबार के व्यावहारिक पक्ष को नहीं समझ पाया। यातायात की सुविधायें कम थीं, समाचार संकलन आसान नहीं था। उस वर्ष विद्युत संकट भी असाधारण था। समाचार भारती का टेलीप्रिंटर बिजली न होने से बहुत उपयोगी नहीं रहा। अखबार को सही समय व स्थान पर पहुँचाना सबसे बड़ी समस्या थी। संसाधन हमारे पास थे नहीं और हम बड़ा स्टाफ नहीं रख सकते थे। मगर चूँकि कम्पोजीटर, मशीनमैन आदि कामगारों पर मालिकाना रौब गाँठने वाला कोई नहीं था, अतः वे अन्य संस्थानों से कम वेतन पर भी यहाँ काम करना पसन्द करते थे। दुर्गा सिंह दौरे पर रहा करता था और सम्पादन से लेकर प्रबंधन तक के काम मुझे अकेले सँभालने पड़ते। कभी-कभी तो रात ढाई बजे पहाड़ को जाने वाली गाड़ी में समाचार पत्र पहुँचाने के लिए मशीनमैन के जागने तक मुझे मशीन पर छपाई भी खुद करनी पड़ती थी। आज स्वयं मुझे इस बात पर विश्वास करना कठिन होता है कि इस पूरे एक साल तक मैं चारपाई पर नहीं सोया! कुर्सी पर बैठे-बैठे काम करते हुए ही, जो मिलता खा लेता और जब कभी मौका मिलता, मेज पर सिर रख कर झपकी ले लेता। मेरे चारों ओर दीमक ने अपना अड्डा बना डाला था। मेरे कोट की जेब तक भी दीमक ने पहुँच बना ली और मुझे कोट झाड़ने की भी फुर्सत नहीं मिली। मेरे व्यवसाय और पारिवारिक जीवन पर इस दीवानगी का बहुत बुरा प्रभाव पड़ा।
एक रात लिखते-लिखते आँखें झपक गईं, प्रातः जब नींद खुली तो सामने नाटककार गोविन्द वल्लभ पन्त को बैठा पाया। वे बोले, मैं आज पहली बार किसी को नींद में कुछ लिखते देख रहा हूँ। मैंने जवाब नहीं दिया, लेकिन मैं सचमुच नींद में ही लिख रहा था, क्योंकि मुझे सम्पादकीय लिख कर तत्काल कम्पोजीटर को देना था। एक वर्ष में ही समाचार पत्र का प्रकाशन बन्द कर देना पड़ा, मगर इस एक साल में मेरे दुर्द्धर्ष संघर्ष के साक्षी रहे राजीव लोचन साह, गिरीश तिवारी ‘गिर्दा’, शेखर पाठक, गोविन्द पंत ‘राजू’, महेश पांडे, हरीश पंत, एन.सी. तिवारी तथा बलवन्त सिंह चुफाल जैसे लोग मेरे मुरीद हो गये। अपने को पूरी तरह उजाड़ने वाली इस पत्रकारिता को आज की पीढ़ी तो निखालिस बकवास ही मानेगी।
‘दैनिक पिघलता हिमालय’ बंद हो गया और मैं घोर आर्थिक संकट में पड़ गया। छोटे-छोटे बच्चों की देखरेख और पत्नी का लम्बी बीमारी से तीन साल तक अस्पताल में रहना। तनाव से मैं टूट जाता। मगर किसी तरह अपने को सम्हाले रहा। फिर मैं नैनीताल समाचार के लिए लिखने लगा। अपने को आर्थिक रूप से व्यवस्थित कर 1 दिसम्बर सन् 1986 से मैंने पुनः ‘पिघलता हिमालय’ का प्रकाशन साप्ताहिक के रूप में पुनः शुरू कर दिया। इस बार दुर्गासिंह मेरे संघर्ष में शामिल नहीं था। कुछ ही समय बाद उसका देहान्त भी हो गया। मगर इस काँटों भरी राह में मुझे धकेलने के लिये मैं आज भी उसे ‘संस्थापक’ के रूप में संजोए हुए हूँ। समाचार पत्र प्रकाशन की यह पारी भले ही पिछली बार की तरह आत्महंता नहीं थी, मगर सूचना विभाग में पनप चुके माफिया तंत्र के कारण मुझे सरकारी विज्ञापन की मान्यता मिलने में बारह साल लग गये।
सन् 1959 में हाईस्कूल पास कर अल्मोड़ा से काठगोदाम जाने के लिये मैं पहली बार कुमाऊँ मोटर्स ऑनर्स यूनियन लिमिटेड (के.एम.ओ.यू.) की गाड़ी में बैठा। उन दिनों अपर और लोअर में विभाजित, सँकरे पर्वतीय मार्गों पर धीमी गति से लम्बी-लम्बी छींक सी मारती चलती इन गाडि़यों में उलटियाँ करने वाले यात्रियों के साथ सफर करना ऐसा दिलचस्प अनुभव हुआ करता था, जिसे मुक्तभोगी ही जानते हैं। गाडि़यों के रंग रोगन का भी अपना अलग ही महत्व था। यूनियन की गाडि़यों का रंग हरा हुआ करता और उन पर निराले स्लोगन लिखे रहते थे। पेन्टर गाड़ी के आगे जूते का निशान बना देता और लिख देता, ‘जलने वाले तेरा मुँह काला’। किसी गाड़ी में जीभ बाहर निकाली हुई काले रंग की विकराल खोपड़ी बनी रहती। किसी गाड़ी में घुटनों तक की धोती पहने, लम्बी चुटिया वाले एक गोलमटोल आदमी का चित्र होता और गाड़ी के पीछे लिखा होता ‘फिर मिलेंगे, जै हिन्द’। गाड़ी के एक कोने पर पेंटर का नाम लिखा होता, ‘हिमतुवा पेंटर।’ किसी गाड़ी में बाबू पेंटर भी लिखा होता, मगर उस जमाने में हमारे लिये हिमतुवा पेंटर का नाम अद्भुत आकर्षण का केन्द्र था।
कुमाऊँ मोटर ओनर्स यूनियन लि. शेयरों की बुनियाद पर नहीं, बल्कि सहकारी भावनाओं को लेकर बनी बस मालिकों के परस्पर विश्वास पर खड़ी सामूहिक व्यवस्था की कम्पनी थी। विदेशियों के बाहुल्य वाली ‘नैनीताल मोटर ट्रांसपोर्ट’ नामक कम्पनी के टूटने के बाद 1939 में इसका गठन हुआ। पं. गोविन्द वल्लभ पन्त जैसे लोगों का इसे बनाने में हाथ रहा। शुरू में एक ऐंग्लोइंडियन, ई. जेड. फौन्सिका इसके महाप्रबंधक रहे। हरबंश पेट्रौल पम्प के मालिक, काठगोदाम निवासी स. हरबंश सिंह व लाला बालमुकुन्द कम्पनी के डाइरेक्टर थे। धीरे-धीरे कम्पनी में 250 वाहन शामिल हो गए। उसी अनुपात में ड्राइवर, क्लीनर आदि कर्मचारी प्रत्यक्ष रूप से तथा सैकड़ों मैकेनिक, मोटर पार्ट्स विक्रेता हल्द्वानी, रामनगर, टनकपुर आदि स्थानों में परिवहन व्यवसाय से जुडे़। उस जमाने के हिसाब से यह बहुत बड़ा व्यवसाय था। टेड़ी पुलिया के पास फौंसिका स्टेट आज भी मौजूद है, लेकिन फौंसिका के अवकाश प्राप्त करने के साथ ही कुमाऊँ क्षेत्र की यह सबसे बड़ी और पुरानी परिवहन कम्पनी कुप्रबंधन और घटिया राजनीति में फँस गई। काठगोदाम में रोडवेज वर्कशाप व परिवहन निगम का कार्यालय था। परिवहन निगम का कार्यालय अब कुसुमखेड़ा स्थानान्तरित हो गया है।
अल्मोड़ा से काठगोदाम की, जिन्दगी की उस पहली बस यात्रा में, जब मैं ज्योलीकोट पहुँचा तो मैंने सड़क के दोनों ओर बने पैरापिटों, चट्टानों व दीवारों पर चूने से लिखे गये राष्ट्रीय बचत के नारे देखे। कहीं-कहीं ‘चाय छोड़ो’, ‘बीड़ी- सिगरेट- शराब छोड़ो’ जैसे वाक्य भी लिखे गये थे। बस रानीबाग से नीचे उतरी तो गांधी जी जैसी वेशभूषा में एक आदमी दिखाई दिया। उसके एक हाथ में चूने की बाल्टी थी और दूसरे में कूची। वह एक दीवार पर अंग्रेजी का बहुत बड़ा क्यू लिख कर उसके आगे ‘यू’ लिख रहा था। गाड़ी तेजी से आगे निकल गई। बहुत से अन्य लोगों की तरह तब तक मैं भी यह समझता था कि इस तरह के नारे कोई सरकारी विभाग लिखवाता होगा। सन् 62 में जब मैं दुबारा हल्द्वानी आया तब मेरी मुलाकात उस गांधी बाबा से हुई। तब पता चला कि शिवदत्त जोशी नाम का यह जुनूनी व्यक्ति सब कुछ छोड़ कर इस तरह के कार्यों में लगा हुआ है। ‘चाय छोड़ो महाराज’ नाम से प्रख्यात शिवदत्त जोशी 1908 में ग्राम जाख (अल्मोड़ा) में जन्मे थे। गुरुकुल कांगड़ी में पढ़ने के बाद उन्होंने नैनीताल में चाय की दुकान खोली, किन्तु फिर ज्योलीकोट के निकट शिव डाइजेस्टो आश्रम की स्थापना कर एकाएक उन्होंने चाय, बीड़ी, शराब आदि व्यसनों के खिलाफ अभियान छेड़ दिया। वे सामयिक तथा चुटीले नारे लिखने में सिद्धहस्त थे। भारत-चीन युद्ध के दौरान उन्होंने लिखा, ‘चाय-बीड़ी छोड़ो, चीनियों को खदेड़ो’ या ‘राष्ट्रीय सुरक्षा कोष में दान दो’ तो नैनीताल के सीवर पर तंज किया, ‘नैनीताल का मल, हल्द्वानी का पेय जल।’ रिश्वतखोरी पर टिप्पणी की, ‘अरे भई क्यों बैठे हो उदास, हरा नोट दिखाओ झट गाड़ी पास।’ जवाहर लाल नेहरू से लेकर बड़ी-बड़ी शख्सियतों के 600 से अधिक प्रशंसा पत्र उनके पास थे। हल्द्वानी में वे सखावतगंज में रहते थे और अन्त तक अपने मिशन में लगे रहे।
बहुत समय तक मैंने लम्बा चोगा और दाहिने हाथ में लोहे के कड़े पहने, कंधे पर लम्बा झोला टाँगे सफेद दाढ़ी वाले एक फकीर को हल्द्वानी के मुहल्लों में गाना गाते हुए देखा है। नाम था उसका अब्दुल शकूर शाह। वह अपनी पैदाइश 1914 की बताता था। डंडे से कड़ों में मार कर ताल के साथ वह नजीर की बानी गाता था, जो उसे पूरी तरह याद थी- ‘‘ऐसा था बाँसुरी के बजैया का बालपन, क्या-क्या कहूँ मैं तुमसे कन्हैया का बालपन।’’ वह बताता था कि बचपन से उसे गाने- बजाने का शौक था। तब ‘हिन्दू-मुस्लिम’ न था। यह तो बँटवारे के आसपास का मैल है। अमृतसर में रज्जब अली की शागिर्दी करते हुए उन्हीं की शागिर्दी में पेशावर बिलोचिस्तान तक पहुँचे, फिर अपने वतन हिन्दोस्तान लौट आए। यह पूछने पर कि मुसलमान होते हुए वे कृष्ण कन्हैया का भक्ति गीत इतने भावपूर्ण ढंग से कैसे गा लेते हैं तो उनका जवाब होता, ‘बानी’ तो ‘बानी’ होती है। उसमें हिन्दू-मुसलमान का सवाल कहाँ ? काफिर तो वह है जो ईमान को न माने, बाकी तो सब अपना तरीका है माँगने का। कोई हाथ जोड़ कर माँगता है कोई हाथ फैला कर।
जीवन का शतक पूरा करने के बाद बताशे बनाने का कारोबार करने वाले रियायत हुसैन उर्फ लल्ला बताशे वाले पुरानी हल्द्वानी के गवाह हैं। मूल रूप से जिला बदायूँ के दातागंज निवासी रियायत हुसैन 13 साल की उम्र में अपने पिता विलायत हुसैन के साथ हल्द्वानी आ गये थे। रियायत हुसैन ने अपने पिता के अलावा बरेली के हबीब ‘हब्बी’ उस्ताद से बतासे का काम सीखा था। कुछ समय किशन लाल रतन लाल फर्म में काम कर 1930 में इन्होंने अपना कारखाना खोल लिया। अब इनके तीनों पुत्र- इनायत हुसैन, वली मुहम्मद और नूर अहमद उनका हाथ बँटा रहे हैं। लल्ला बताते हैं कि मंगल बाजार को विशेष रूप से लोग घोड़ों, बैलगाडि़यों में आया करते थे। पुराने लोग आज भी दीपावली के मौके पर उनसे आकर मिलते हैं। बरेली के फूटा दरवाजा, किला थाने के समीप रहने वाले कल्लू मियाँ रामलीला में रावण परिवार के पुतले बनाने के लिए परिवार सहित यहाँ आते हैं। पिछले 45 वर्षों से वे पुतले बनाने का काम कर रहे हैं। उन्होंने बरेली के मलपुर बदरिया के उस्ताद शंकर लाल से पुतले बनाने का हुनर सीखा था।
इस वक्त हल्द्वानी में बीस से अधिक बैण्ड हैं। आजादी से पहले बिजनौर के गाँव नगला से शगीर अहमद ने बैण्ड ग्रुप की शुरूआत की थी। उनकी पत्नी पिथौरागढ़ की थीं। शगीर मियाँ सहारनपुर से तालीम लेकर हल्द्वानी में क्लैरिनेट लेकर आये थे। शगीर ने अपने बड़े पुत्र अलताफ के नाम से ‘अलताफ बैण्ड’ की शुरूआत की। इसी परिवार के 54 वर्षीय जाहिद हुसैन आज उस व्यवसाय को आगे बढ़ा रहे हैं। जाहिद हुसैन बताते हैं कि उन दिनों बारातें पैदल और घोड़ों पर जाया करती थीं। बैण्ड वालों को भी 40-50 किमी तक की यात्रा करते थे। उनके ताऊ अलताफ की चोरगलिया की किसी बारात में जाते समय ”दिल का दौरा पड़ने से मौत हो गई थी। इसके बाद पिता तालिब हुसैन ने ‘आजाद बैण्ड’ नाम से नया ग्रुप बना लिया। तब ड्रेस की कोई बाध्यता नहीं हुआ करती थी। वे लोग महिला अस्पताल के सामने सड़क किनारे बैंच डालकर बैठा करते थे और मंगल बाजार में घूमा करते थे। आजाद बैण्ड ग्रुप बनने के बाद ड्रेस का प्रचलन हुआ। बैंड का रेट भी 2 रुपये से धीरे-धीरे बढ़ कर 25 रुपये तक हुआ।
पहले बैण्ड वाले अपना रियाज बगीचों में बैठकर किया करते थे। अब हल्द्वानी में बाग-बगीचे कहाँ ? ऐसे में अपनी नई धुनों के अभ्यास के लिये बैंण्ड ग्रुप खाली समय में सूखी हुई गौला नदी में चले जाते हैं।
बंजारा बिरादरी…..
अंग्रेजों के जमाने में घोड़ों से व्यापार करने आई इस बिरादरी ने अपना रुतबा जमा दिया। इनके बुजुर्ग आलीशान भवन और नक्काशीदार कामकाज को बेहद पसंद करते थे। बात करें अब्दुल्ला परिवार की, जिसमें आज भी सौ साल उम्र के पाँच बुजुर्ग हैं और बेतहाशा बड़ा कुनबा। इनकी कहानी ताजपुर (बिजनौर) से 1860 के करीब हल्द्वानी आये अल्लाबख्श साहब से शुरू होती है। बरेली रोड पर 42 बीघे पर अल्लाबख्श के नाम का बगीचा बना, घने जंगलों से घिरे हल्द्वानी में खेती-किसानी से लेकर घरेलू कारखाने जैसे कार्य यहाँ होने लगे। इनके पुत्र अब्दुल्ला साहब बड़े नामी आदमी हुए। अन्य भी सभी हुनरमन्द। अब्दुल्ला साहब के 60 वर्षीय पुत्र अब्दुल माजि़द बुजुर्गों से सुने हल्द्वानी के बारे में बताते हुए भावुक हो जाते हैं। उनके अनुसार आज जो बरेली रोड है तब यहाँ गौला का रेला था। शहर के बीचोंबीच पीने के साफ पानी की व्यवस्था के लिये नहर थी। नहर में हर पाँच सौ मीटर पर पानी पीने व भरने के लिये सीढ़ी बनाई गई थी। अंग्रेजों का सख्त कानून था कि कोई भी पानी को गन्दा न करे। पतरौल बराबर नहर का निरीक्षण करते थे। निरीक्षण भी ऐसा-वैसा नहीं, कर्मचारी नहर के भीतर उजाला लेकर चैक करता था और फँसे हुए पत्थर-पत्ते हटाता था। आज तो शहर का भगवान ही मालिक है। तब पढ़ाई-लिखाई के लिये घरेलू पाठशाला पर्याप्त थी, लोग हुनर को महत्व देते थे।
माजिद साहब बताते हैं कि उनके परिवार का पूरे तराई-भाबर में सबसे बड़ा कारोबार था। सन् 62 में चीन की लड़ाई के समय अब्दुल्ला साहब ने मुख्यमंत्री से कहा था- पहाड़ में गल्ले की कमी नहीं होने देंगे। तब घोड़ों से नैनीताल, बीरभट्टी सामान जाया करता था। बुजुर्गों से सुने के आधार पर माजिद साहब बताते हैं कि अंग्रेजों के जमाने में जब बंजाराना बिरादरी हल्द्वानी आई, कालाढूंगी चौराहे में सैयद बाबा की मजार के पास उनके घोड़ों का पड़ाव था। हर समय घोड़े-खच्चरों की हिनहिन से परेशान अंगे्रजों ने दर्जी लाइन में घुड़साल खुलवा दी। अब पुराने निशान भी नहीं रहे। बाजार की एक खाली जगह अंग्रेजों ने मस्जिद के लिये दी। बाद में नगरपालिका के अध्यक्ष डी.के. पाण्डे ने भी बनभूलपुरा के जम-जमाव को लेकर बड़ी मेहनत की। तब लोग झोपड़-पट्टियों में रहते थे और हमेशा आग लगने का खतरा बना रहता था। इसलिये आजाद नगर में 16 लाइनें बनाई गईं और चार लाइन के बाद फायर लाइन बनाई गई। वर्तमान में वह फायर लाईन सड़क बन गई है। अलबत्ता सड़क के बीचोबीच होने पर भी ‘बिलाली मस्जिद’ को छोड़ दिया गया।