अथ पौड़ी गाथा-7
पौड़ी नगर में 1981 से 1990 का दौर नये लेखकों का रहा। इससे पहले तक का लेखन पुरानी पीढ़ी के लोगों तक ही सीमित था। किन्तु उसके बाद पत्रकारिता व लेखन में नये रचनाकार सामने आने लगे। संक्रमण के इस दौर में सन्नाटे को सबसे पहले तोड़ने वाले रमेश पोखरियाल ‘निशंक’ थे। पहले जोशीमठ व बाद में पौड़ी में शिशु मन्दिर में अध्यापक रहे निशंक एक प्रेस खोलना चाहते थे, ताकि स्वाध्याय भी हो सके और उनका रचनाकर्म भी प्रकाशित हो सके। 1985 में लक्ष्मीनारायण मन्दिर के समीप ‘निंशंक प्रिन्टिंग प्रेस’ की स्थापना हुई। कुछ समय बाद वे शिक्षण कार्य छोड़ पूरा समय प्रेस को देने लगे। 1986 में पौड़ी से निशंक की त्रैमासिक शोध पत्रिका ‘नवराह नई चेतना’ निकली। इसके पहले अंक का विमोचन गढ़वाल विश्वविद्यालय के तत्कालीन कुलपति एच.एच.ए. बौड़ाई के द्वारा किया गया था। इस अवसर पर अन्य लोगों के अलावा इतिहास लेखक कैप्टेन शूरवीरसिंह पँवार को सम्मानित किया था। इसी साल के अन्त में निशंक का पहला कविता संग्रह ‘तुम भी मेरे साथ चलो’ प्रकाशित हुआ। लेकिन वित्तीय संकट, सामग्री के अभाव व दैनिक पत्र निकालने की चाहत के कारण इस पत्रिका के चार ही अंक निकल पाये। हालांकि निशंक इस नाम से एक संस्थान का गठन कर इसे आगे बढ़ाना चाहते थे जिसके लिये बाद में उन्होंने कोटद्वार में लीज पर भूमि भी ली, किन्तु राजनीति में आने के कारण उनका यह संस्थान जमीन पर न उतर सका। महत्वाकांक्षा के धनी निशंक’ ने एक कदम आगे बढते हुए 1988 में कोटद्वार से दैनिक पत्र ‘सीमान्त वार्ता’ निकाला। आरम्भ में इसमें तीन भागीदार थे। लेकिन मतभेद हो जाने से वे इस पत्र को स्वयं पौड़ी से चलाने लगे। पत्र के पौड़ी से निकलने के कारण उनका छोटा सा कार्यालय नये पुराने कवियों, लेखकों व सृजकों का एक ठौर बनने लगा था। इससे उनके सम्पर्क सूत्र बढ़ते चले गये। इसी प्रेस से निशंक ने अपने आरम्भिक दौर की रचनाओं को पुस्तकाकाररूप देते हुए प्रकाशन किया, जिनमें ‘मुझे विधाता बनाना है’, ‘देश हम जलने न देंगे’ व कहानी संग्रह ‘बस एक ही इच्छा’ प्रमुख हैं।
आरम्भ में निशंक की पुस्तकों की कम ही चर्चा हुई। अलबत्ता संघ की पृष्ठभूमि, वाक्पटुता और पुस्तकों का विमोचन कराने के तरीकों से निशंक चर्चा में आ गये। भाजपा हाईकमान, जो दिग्गज कांग्रेसी नेता शिवानन्द नौटियाल के खिलाफ 1990 के विधान सभा चुनाव में कर्णप्रयाग सीट पर किसी अच्छे प्रत्याशी की तलाश कर रहा था, की नजर उन पर पड़ी। इसके बाद निशंक राजनीति की ही सीढि़याँ चढ़ते रहे। हालाँकि उनका लेखन जारी रहा और कई पुस्तकें प्रकाशित र्हुइं, लेकिन उनका कार्यक्षेत्र पौड़ी से हट कर लखनऊ व देहरादून हो गया। राज्य बनने के बाद वे स्थायी रूप से देहरादून जा बसे।
‘निशंक प्रकाशन’ व ‘सीमान्त वार्ता’ से जुड़े पत्रकार सुरेश चन्दोला ने 1987 में अपने शोध कार्य पर आधारित चार पुस्तकों का प्रकाशन किया। पहली पुस्तक ‘गढ़वाल के प्रमुख स्वतन्त्रता संग्राम सेनानी’ थी। इसमें हरिद्वार को छोड़ गढ़वाल के चार जिलों के स्वतन्त्रता आन्दोलन की पृष्ठभूमि और सेनानियों पर प्रकाश डाला गया। उनकी दूसरी पुस्तक ‘गढ़वाली सैनिकों की आजाद हिन्द फौज में भूमिका’ 1992 में प्रकाशित हुई। बाकी दो पुस्तकें पीएच.डी. मिलने के बाद निकलीं। उनकी तीसरी पुस्तक ‘पेशावर काण्ड’ थी, जिसके अब तक तीन संस्करण निकल चुके हैं। 1994 में उनकी चौथी पुस्तक ‘स्वतन्त्रता संग्राम और गढ़वाल’ निकली, जिसमें पुरानी पुस्तकों की सामग्री को अधिक प्रामाणिकता के साथ लिखा गया। इसके भी तीन संस्करण निकल चुके हैं। ‘क्रियेटिव मीडिया ग्रुप’ से जुड़े डॉ. चन्दोला ने इसके अलावा कछ अन्य पुस्तकों का भी संपादन किया।
पौड़ी के विश्वविद्यालय परिसर के अनेक प्राध्यापकों ने भी पुस्तकें लिखीं। 1985 में इतिहास विभाग के एस.ए.एच. जैदी एवं उनकी पत्नी रेहाना जैदी की पुस्तक ‘गढ़वाल मुगल सम्बन्ध’ निकली। इसके बाद उनकी दूसरी पुस्तक ‘मध्य हिमालय के पर्वतीय राज्य और मुगल शासक’ 10 साल बाद 1995 में सामने आई। भारतीय इतिहास कांग्रेस की सहायता से निकली इस पुस्तक को आलोचना का सामना करना पड़ा, क्योंकि लेखक ने गढ़वाल के राजाओं को मुगलों का मनसबदार बताया था। 1987 में इतिहास के प्रवक्ता सुनील कुमार सक्सेना की लिखी पुस्तक ‘दिल्ली सल्तनत और कटेहर राजपूतों का प्रतिरोध’ निशंक प्रिन्टिंग प्रेस से छपी। हिन्दी विभाग के अध्यक्ष श्यामधर तिवारी की पुस्तक ‘अभिमन्यु अनत: व्यक्तित्व एवं कृतित्व’ व ‘मारीशस में हिन्दी का उद्भव और विकास’ मुख्य रहीं। इसी विभाग में कार्यरत विनय डबराल ‘रजनीश’ ने पौड़ी में 30 साल में जितना लिखा वह मात्रात्मक रूप से सबसे अधिक रहा किन्तु चर्चा में कम ही रहा। विनय डबराल अब तक 25 से अधिक पुस्तकें लिख चुके हैं। उनकी किताबों में ‘पीताम्बर दत्त बड़थ्वाल का जीवन दर्शन और साहित्य साधना’, ‘गढ़वाल की साहित्यिक विभूतियाँ’, ‘गढ़वाली लोक साहित्य’ और ‘लोकोक्तियाँ’ के अतिरिक्त, 11 काव्य संग्रह, 2 उपन्यास, 2 नाटक व 19 एकांकी शामिल हैं। पौड़ी परिसर कालेज के भूगोल विभाग के प्राध्यापक के.सी. पुरोहित की 7 पुस्तकें प्रकाशित हुई हैं। इनमें ‘द हिमालयन हैरिटेज एन्ड इनवार्यनमेन्ट’, स्पेसिओ फंक्शनल एप्रोच फॉर प्लानिंग इन हिल रीजन, हमारा उत्तराखण्ड, सांस्कृतिक भूगोल, वन्डर एन्ड एक्सप्लेनेशन इन जिओग्राफी, पर्यावरण एवं पारिस्थिकी के खण्ड व 1 व 2 भाग आदि मुख्य हैं। ‘हमारा उत्तराखण्ड’ काफी लोकप्रिय रही। इसी विभाग के प्राध्यापक बी.एल. तेली की पुस्तक पर्यावरण विज्ञान निकली। कुछ अन्य प्राध्यापकों द्वारा भी पुस्तकें लिखी गयीं, लेकिन उनका मुख्य उद्देश्य पुस्तकों को जनता तक ले जाने की बजाय महज साक्षात्कार में दिखना ही रहा। इसलिये वे गुमनामी से बाहर न निकल सकीं।
पौडी से श्रद्धम संस्था के द्वारा मालचन्द रमोला द्वारा लिखित ‘गढ़वाली हिन्दी शब्दकोश’ प्रकाशित किया गया, जो काफी चर्चा में रहा। 1998 में नगर में बने क्रियेटिव मीडिया ग्रुप ने लीक से हटकर कुछ किताबों का प्रकाशन किया। इनमें पौड़ी नगर के इतिहास को लेकर 1999 में प्रकाशित पुस्तक ‘सफरनामा’ पहली थी। सन् 2002 में राज्य में पंचायती राज के स्वरूप व स्वावलम्बन को लेकर ‘मंथन’ तथा 2003 में पर्वतीय क्षेत्र में नये काम कर रहे लघु उद्यमियों की सफलता की कहानियों पर आधारित ‘पहल’ पुस्तक का प्रकाशन किया गया। क्रियेटिव मीडिया ग्रुप के संस्थापक सदस्यों में एल.मोहन कोठियाल, सुरेश चन्दोला, मेहरबान पंवार, त्रिभुवन उनियाल आदि थे। इस प्रकाशन ने 2003 में पेशावर काण्ड पर पाकिस्तानी लेखकों की पुस्तकों के आधार पर पूर्व प्रकाशित पुस्तक ‘पेशावर काण्ड’ का संशोधित संस्करण प्रकाशित किया, जिसके अब तक तीन संस्करण आ चुके है।
(जारी)
बहुत ही अच्छी जानकारी से भरपूर लेख है……नैनीताल समाचार में जो भी प्रकाशित होता है अनूठा होता है….बहुत बार सोचा कि टाइम निकल कर लिख सकूँ…पर अभी अगस्त तक काफी बिजी है उसके बाद जरूर लिखना शुरू करूंगा दुबारा से ……….