अनमने ढंग से बसाया अंग्रेजों ने यह शहर
पौड़ी नगर ने अपने 170 साल की आयु में कई उतार चढ़ाव देखे हैं। 1840 में यह जिला मुख्यालय बना तो 1969 में मण्डल मुख्यालय। स्वाधीनता आन्दोलन से लेकर राज्य आन्दोलन तक यहाँ के नगरवासियों की महत्वपूर्ण भूमिका रही। अविभाजित उ.प्र. से लेकर वर्तमान उत्तराखंड तक चार मुख्यमन्त्री पौड़ी ने दिये। कभी यह शिक्षा का एक जाना-माना केन्द्र था। अब यह लगातार पिछड़ता जा रहा है। यह नगर सांस्कृतिक राजधानी के रूप में उभर सकता था, किन्तु सरकार की ओर से कोई प्रयास ही नहीं हुए। नैसर्गिक सौन्दर्य के बावजूद यह पर्यटन स्थल नहीं बन सका। प्रशासनिक केन्द्र के रूप में यह उभर रहा था, लेकिन राज्य बनने के बाद इसका मण्डल मुख्यालय स्वरूप भी समाप्तप्राय है। पौड़ी नगर के हालातों की जानकारी देने के लिये एक श्रृंखला लिखी जा रही है। प्रस्तुत है ‘अथ पौड़ी कथा’ का पहला भाग।
1803 में भारी भूकम्प आने से तहस-नहस होने से पूर्व तक श्रीनगर गढ़राज्य की राजधानी थी। 1804 में गोरखाओं ने गढ़राज्य पर हमला कर दिया। गढ़वाल नरेश प्रद्युमन शाह इसके लिये तैयार न थे। पीछे हटते हुए वे देहरादून में वीरगति को प्राप्त हुए। लेकिन उनके पुत्र सुदर्शन शाह चुप न बैठे और कैसे राज्य वापिस लिया जाये, इस पर हरिद्वार में रणनीति बनाते रहे। अन्त में सन् 1816 में उन्होंने अंग्रेजों की मदद से अपना राज्य प्राप्त किया। लेकिन इस युद्ध पर अंग्रेजों का जो धन खर्च हुआ, उसकी माँग उन्होंने सुदर्शन शाह से की। लेकिन जब गढ़ नरेश यह व्यय न चुका सके तो अंग्रेजों ने गढ़वाल का एक भाग अपने अधीन ले लिया। इसमें वर्तमान के तीन जिले पौड़ी, रुद्रप्रयाग व चमोली शामिल थे। इनको मिला कर गढ़वाल तहसील बनाई गई और उसे अल्मोड़ा जिले से जोड़ दिया गया। सन् 1839 तक श्रीनगर में तहसील मुख्यालय रहा। व्यवस्था के लिहाज से इस साल गढ़वाल को एक अलग जिला बना दिया गया, जो ब्रिटिश गढ़वाल कहलाया। इसके बाद श्रीनगर ज्यादा दिन तक जिला मुख्यालय नहीं रहा। वहाँ बाढ़ के खतरे व प्रतिकूल मौसम के कारण अंग्रेज जिला मुख्यालय श्रीनगर से 12 मील की दूरी पर सुरम्य पर्वतमाला के बीच पौड़ी ले आये। लगभग 1600 मीटर की ऊँचाई पर स्थित यह स्थान ठण्डा व अद्भुत रूप से सुन्दर था।
पौड़ी तब एक गाँव था, जिसकी आबादी आसपास के गाँवों को मिलाकर भी 1,000 से कम ही रही होगी। सन् 1840 में पौड़ी से जिला मुख्यालय चलने लगा, किन्तु यह व्यवस्था अस्थाई थी। अंग्रेज अधिकारी आते, कैम्पों में रह कर काम निबटाते और फिर नैनीताल या अल्मोड़ा चल देते थे। अल्मोड़ा जाने के दो रास्ते थे। पहला कर्णप्रयाग से लोहबा होते निकलता था तो दूसरा पाबौ, मुसागली, कैन्यूर, देघाट होकर जाता था। अंग्रेजों को ज्यादा दिन बाँधने के लिये तब पौड़ी में कुछ नहीं था। गर्मियों में उनका अमला आता, कामकाज निबटाने से लेकर गढ़वाल के खूबसूरत स्थलों की सैर करता और वापिस लौट जाता। शिमला, मसूरी, नैनीताल, डलहौजी, शिलांग ऊटी आदि की खोज के बाद अंग्रेजों ने वहाँ अवस्थापना का काम तत्काल आरम्भ करा दिया था। लेकिन पौड़ी पर उन्होंने बहुत देर बाद ध्यान दिया। कुछ अधिकारी इस पक्ष में ही नहीं थे कि इसे जिला मुख्यालय बनाया जाये। वे इसे लोहबा (गैरसैण) में बनाना चाहते थे। इस अनिर्णय के चलते ही यहाँ पर अवस्थापना का काम नहीं हो पाया। लम्बे समय तक कचहरी का काम पौड़ी गाँव के एक किराये के भवन से चलता रहा। जिले के सर्वोच्च अधिकारी असिस्टेन्ट कलक्टर का आवास भी लोवर बाजार के एक किराये के भवन में बनाया गया।
पौड़ी को जिला मुख्यालय बनाने के अन्तिम निर्णय के बाद ही ब्रिटिशर्स द्वारा स्थायी कचहरी भवन, तहसील व कोषागार आदि भवन बनवाये गये। आज जहाँ रजिस्ट्रार कार्यालय है, वहीं पौड़ी की कलक्ट्रेट थी। समीप ही न्यायालय, तहसील व कोषागार व भू अभिलेख कार्यालय आदि बनाये गये। भवन बनाने का अगला दौर 1900 में चला। तब जिला जेल, रिकार्ड रूम, जिला पंचायत भवन आदि बने। समण जाता है कि जिलाधिकारी को कण्डोलिया स्थित आवास 1910 से पहले बन गया था। सन् 1916 तक जिले का नया कलक्ट्रेट भवन बना। इसके अलावा कुछ अन्य भवन, जिनमें पुराना तहसील भवन, बन्दोबस्त भवन आदि प्रमुख थे, बने।
कुमाऊँ कमिश्नर हेनरी रैमजे ने अमेरिकी मिशनरीज को यहाँ आमन्त्रित किया, जिन्होंने 1860 के बाद अपनी गतिविधियाँ बढ़ाईं। शिक्षा व चिकित्सा के माध्यम से उन्होंने लोगों के मन में जगह बनाई। कुछ लोग उनसे प्रभावित होकर ईसाई भी बने। इन मिशनरीज ने ही यहाँ पर शिक्षा का बीज बोया। इससे लोगों को रोजगार के अवसर मिलने लगे। सन् 1924 में जाकर पौड़ी में एक बड़ा हाईस्कूल खोला गया, जो मिशन का अभूतपूर्व कार्य था। एक भव्य भवन पर शुरू इस मेसमोर हाईस्कूल से पौड़ी को बहुत प्रसिद्धि मिली।
चमोली व रुद्रप्रयाग क्षेत्र से बच्चे यहाँ से शिक्षा लेने के बाद या सरकारी नौकरियों में लगते या फिर उच्च शिक्षा हेतु बाहर जाते। उस समय यह पूरे गढ़वाल में एकमात्र हाईस्कूल था। इससे पौड़ी शिक्षा का एक प्रमुख केन्द्र बन गया। यहाँ के छात्रों ने समाज के हर क्षेत्र में पहचान बनाई। कई लोग उच्च पदों पर रहे। इस बीच मेसमोर स्कूल का उच्चीकरण हुआ, जिससे इन्टर तक की शिक्षा यहीं पर मिलने लगी। 1985 के बाद जिले में सरकारी स्कूलों के खुलने का क्रम तीव्र हुआ तो पौड़ी का महत्व घटने लगा। हालाँकि इसी बीच 1969 में पौड़ी में महाविद्यालय खुल गया।
अंग्रेजों ने अनमने ढंग से ही पौड़ी को जिला मुख्यालय बनाया। अपने स्वभाव के विपरीत उन्होंने नगर के विकास के लिये कोई योजना नहीं बनाई। कोई महत्वपूर्ण संस्थान यहाँ नहीं खोले। 1840 से लेकर 1947 तक यहाँ अनेक अंग्रेज कलक्टर रहे। कुमाऊँ कमिश्नरों के दौरे यहाँ लगातार होते थे। लेकिन किसी ने कोई तहत्वपूर्ण पहल पौड़ी के लिये नहीं की। कुछ लोगों की मान्यता है कि चूँकि इसकी पहुँच कठिन थी, पैदल ही यहाँ आया जा सकता था, इसीलिये अंग्रेज इसका विकास न कर सके। सड़क व आजादी पौड़ी में लगभग एक साथ आई और करीब आती आजादी को देख अंग्रेजों की भारत में कुछ करने की रुचि भी समाप्त हो गयी।
…….जारी है।
Really a great informative article about the history of Pauri, the cultural capital of entire Garhwal! I spent almost 3 years in Pauri, but i was unknown to these interesting facts about this beautiful city! Thanks for sharing this knowledge about the places of Uttarakhand! Keep going like this, there are still many people who are interested in such informative things about our history & culture!