टिहरी बाँध से उपजी समस्याओं का अंत होता नहीं दिखाई दे रहा है। सितम्बर में हुई भारी वर्षा के बाद बाँध की झील का जल स्तर बढ़ा कर समुद्र तल से 835 मीटर ऊँचा कर दिया गया था। जल स्तर बढ़ जाने से प्रतापनगर विधान सभा क्षेत्र के नकोट, मोटना, चांटी, कंगसाली, भैंगा, जनगी आदि लगभग 30 गाँवों में भूस्खलन आरंभ हुए, जिनसे मकानों, कृषि भूमि, खड़ी फसलों, सड़कों, रास्तों आदि की हानि हुई। उत्तराखंड के सिंचाई मंत्री मातबर सिंह कंडारी ने 8 नवंबर को कहा कि टिहरी हाइड्रो डेवलपमेंट कॉरपोरेशन (टीएचडीसी) ने बिना राज्य सरकार की अनुमति लिए बाँध की झील को समुद्र तल से 835 मीटर की ऊँचाई तक भर कर गंभीर अपराध किया है। मंत्री उसके बाद ग्रामीणों के साथ टी.एच.डी.सी. के दफ्तर के पास धरने पर बैठ गए। उन्होंने आरोप लगाया कि पुनर्वास स्थल पर विस्थापितों की सामुदायिक सुविधाओं के लिए टीएचडीसी को 70 करोड़ रुपए देने थे, लेकिन वह धनराशि नहीं दी गई। धरने को सम्बोधित करते हुए उन्होंने कहा कि चिन्यालीसौड़ घाटी में पुल बनाने के लिए प्रदेश सरकार अपने हिस्से का 25 फीसदी धन देने को तैयार है, लेकिन केन्द्र व टीएचडीसी बाकी 75 फीसदी धन नहीं दे रहे हैं, जिससे पुल नहीं बन पा रहा है।
अब राज्य की दोनों मुख्य पार्टियाँ कांग्रेस तथा भाजपा बाँध संचालन रीति के विरुद्ध आंदोलन चला रही हैं। कंडारी के बाद टिहरी से कांग्रेस के विधायक किशोर उपाध्याय अपने पार्टी कार्यकर्ताओं के साथ नवम्बर 12 को बाँध बैरियर के पास धरने पर बैठे। इस समस्या पर थौलधार प्रखंड के सरोट गाँव तथा टिहरी कलक्ट्रेट परिसर में अनिश्चितकालीन अनशन व धरना, प्रदर्शन तथा टीएचडीसी का पुतला फूँकना हुआ। नई टिहरी नगर पालिका के पूर्व उपाध्यक्ष तथा नागरिक मंच के सुंदरलाल उनियाल अपनी 17 सूत्रीय माँगों को लेकर आमरण अनशन पर बैठे। अनशन के पाँचवें दिन प्रशासन ने उन्हें जबरन उठा कर अस्पताल में भर्ती कर दिया। उनकी जगह तब दो अन्य नागरिक मंच के नेता तब अनशन पर बैठ गए। एक अन्य व्यक्ति, सरोठ गाँव के बचन सिंह भी भूख हड़ताल पर बैठे। उनका कहना है कि उनकी 60 प्रतिशत कृषि भूमि बाँध की झील में डूब चुकी है।
दोनों प्रमुख राजनैतिक दलों के नेताओं ने बाँध का जल स्तर बढ़ाए जाने से प्रभावित गाँवों का भ्रमण किया। लोगों ने टिहरी में पूर्णकालिक पुनर्वास निदेशक की तैनाती की माँग की। भाजपा के प्रदेश उपाध्यक्ष लाखी राम जोशी ने कहा कि टिहरी के जिलाधिकारी को पुनर्वास का काम भी दिया गया है, जो वह करने में समर्थ नही हो पा रहे हैं। उनका कहना था कि जिलाधिकारी का तबादला जल्दी-जल्दी हो जाता है और पुनर्वास का काम रह जाता है। इसलिए यह पद अलग-अलग होने चाहिए। मुआवजा भी एक जैसा नहीं मिल रहा है। पिलखी के विस्थापितों को पड़ोसी गाँव की तुलना में बहुत कम मुआवजा मिला।
इस बीच नवंबर 9 के फैसले में सर्वोच्च न्यायालय (सुप्रीम कोर्ट) ने उत्तराखंड सरकार को निर्देश दिया है कि वह टिहरी बाँध के विस्थापितों को भूमि का पूरा मुआवजा छः माह के अंदर अदा करे। न्यायालय ने कहा कि सरकार यह भी देखे कि जहाँ विस्थापितों को बसाया गया है, उस क्षेत्र में पुल और सड़कों का निर्माण अधूरा न रहे। यदि कोई निर्माण छूटा हुआ है तो उसे भी छः माह के अंदर पूरा किया जाये। न्यायालय ने उत्तराखंड सरकार तथा टीएचडीसी से कहा कि इस वर्ष बरसात में बाँध को 830-835 मीटर तक भरने के बाद विस्थापित हुए लोगों की भूमि का सर्वे किया जाय और उन्हें उचित मुआवजा दिया जाये, न्यायाधीश रवींद्रन तथा पटनायक की खंडपीठ को उत्तराखंड की वकील रचना श्रीवास्तव ने बताया कि बाँध को नई क्षमता तक भरने के बाद उसके भूगर्भीय प्रभावों का अध्ययन करने एक कमेटी बनाई है, जिसमें भारतीय भूगर्भ सर्वेक्षण, सर्वे ऑफ इंडिया, टीएचडीसी तथा रुड़की आईआईटी के विशेषज्ञ शामिल किए गए हैं। न्यायालय ने कहा कि वह कमेटी दोबारा से नया सर्वे करेगी और बाँध के प्रभावों पर अपनी रिपोर्ट देगी। एन. डी. जुयाल, किशोर उपाध्याय तथा मानवेन्द्र शाह की विशेष अनुमति याचिकाओं में कहा गया था कि सरकार तथा टीएचडीसी ने बाँध के सभी प्रभावितों, जिनकी पुरानी संख्या लगभग एक लाख थी, को अब तक पूरा मुआवजा नहीं दिया है। साथ ही जहाँ उन्हें बसाया गया है, वहाँ न पीने के पानी की सुविधाएँ हैं न ही पहुँचने के पर्याप्त साधन। इस बरसात में बाँध को नई ऊँचाई तक भर दिया गया, जिससे काफी लोगों को पलायन करना पड़ा है।