26 वर्ष 1 माह 10 दिन बाद सैयद अख्तर रिजवी के प्रमुख उद्घोषक पद से सेवानिवृत्त होने से लग रहा है, मानो आकाशवाणी के अल्मोड़ा केन्द्र का रस ही खत्म हो गया हो। 31 मई को उनका विदाई समारोह यादगार बन गया। आकाशवाणी परिवार के उनके मित्र गला रुँध जाने के कारण अपने को अभिव्यक्त ही नहीं कर सके।
रिजवी साहब की आवाज में ही नहीं, व्यक्तित्व में भी जादू था। इन 26 वर्षों में शायद ही किसी से उनका कभी मनमुटाव रहा हो। कार्यक्रम अधिकारी मनोहर सिंह बृजवाल के अनुसार वे समय के इतने पाबन्द थे कि उनके आने व जाने पर घड़ी की सुई भी मिलाई जा सकती थी। मैं बी.बी.सी. के बाद यदि किसी रेडियो कार्यक्रम को सुनता था वह रिजवी जी के ही होते थे। उनके द्वारा तैयार किये व प्रसारित किये गये कार्यक्रम मनोरंजक के साथ शिक्षाप्रद भी होते थे। जाति, धर्म व क्षेत्र से ऊपर होने का पैगाम उनमें रहता था। लोकप्रिय इतने कि पुनर्प्रसारण के लिये सबसे अधिक अनुरोध पत्र रिजवी जी के कार्यक्रमों के ही आते थे। आकाशवाणी के अधिकांश कार्यक्रम दो वर्ष से अधिक प्रसारित नहीं होते। लेकिन रिजवी साहब का ‘महफिल’ 19 वर्ष, ‘आपके अनुरोध पर’ 17 वर्ष और ‘गुलदस्ता’ 15 वर्ष तक चले। ‘पिटारा’, ‘आपका खत मिला’ भी वर्षों चले। किसी जमाने में रेडियो सीलोन से बिनाका गीतमाला प्रसारित करने वाले अमीन सयानी से अख्तर रिजवी की तुलना करें तो गलत नहीं होगा। दिल्ली जैसे किसी केन्द्र से वे प्रसारित होते देश भर में प्रसिद्ध हो जाते। मगर यह जानते हुए भी कि अल्मोड़ा आकाशवाणी की क्षमता 1 किलोवाट की है और उसका प्रसारण एक पहाड़ी के बाद दूसरी पहाड़ी में नहीं सुनाई देता, वह उसी लगन से अपना कार्यक्रम देते जैसे पूरा देश उन्हें सुन रहा हो।
अख्तर रिजवी मूल रूप से रामपुर के रहने वाले हैं। उनकी पत्नी नाहिद रिजवी भी अल्मोड़ा के ही एक स्कूल में पढ़ाती हैं। 18 वर्ष तक रिजवी साहब ‘कौमी जंग’ अखबार से जुड़े रहे। जब अल्मोड़ा में आकाशवाणी का केन्द्र शुरू हुआ तो उन्हें यहाँ भेजा गया। परन्तु वे यहीं के होकर रह गये। अल्मोड़ा के अनेक स्थायी निवासी अल्मोड़ा से स्थानान्तरण करा कर महानगरों के बड़े केन्द्रों में चले गये। मगर अनेक राजनेताओं से घनिष्ठ सम्बन्ध होने और अनेक बार रामपुर, दिल्ली, लखनऊ स्थानान्तरण का अवसर मिलने के बावजूद अल्मोड़ा के मोह ने आपके पाँव रोक लिये। ‘पहाड़ में कुछ नहीं है’ का बहाना बना कर पलायन कर जाने वालों के लिये उनका जीवन एक सबक है। मुझे लगता है कि असली पहाड़ी तो अख्तर रिजवी जैसे लोग ही हैं।
ओह्ह्ह…बहुत मार्मिक लिखा है सर..रिजवी साहब पे लिखा भी ऐसे ही जा सकता है….उनकी सेवानिवृति की खबर अभी ही पढ़ रही,,,,मैं तो पोस्ट आफिस से पोस्टकार्ड खरीद लायी थी,आपके अनुरोध पर मैं फरमाईश भेजने ले किये….रिजवी साहब के महफ़िल व आपके अनुरोध के इंतजार मैं कब हप्ता बीत जाता थाआभास ही न होता…अल्मोडा कालेज का कोइ भी स्टूडेंट भला अपने जीवन मैं रिजवी साहब को कैसे भुला सकता है….
आप ही के एक कार्यक्रम मैं जिसमें असगर वजाहत जी आये थे, मैं रिजवी जी से पहली बार मिलने का मौका मिला था उस दिन जाना की वह तो सामाजिक सरोकारों वाले व्यक्ति भी हैं……..