प्रवीण भट्ट/जावेद अख्तर
इसे व्यवस्था का दोष कहें या संजय का अपराध। कुछ दिनों पहले तक एक ही छत के नीचे संघर्ष की जिंदगी बसर कर रहा परिवार अब पूरी तरह से बिखर गया है। हालत यह है कि परिवार का इकलौता कमाने वाला संजय जेल की सलाखों के पीछे पहुँच चुका है और उसकि पत्नी अपनी गंभीर बीमारी से जूझते हुए बच्चों का पेट भरने के लिए रात-दिन एक कर रही है। सिस्टम के मारे संजय सिंह का अपराध यह है कि वह मजदूर होते हुए भी यह समझता था कि छोटे परिवार का भरण-पोषण उसके लिए शायद उतना कठिन नहीं होगा। यही सोचकर उसने अपनी और पत्नी रक्षा की नसबंदी कराई। लेकिन पति-पत्नी की इस सोच पर सहसपुर सामुदायिक चिकित्सालय के डाक्टरों ने ग्रहण लगा दिया।
उत्तराखंड की राजधानी देहरादून के सहसपुर विकासखंड के कैचीवाला गाँव के संजय की शादी ग्यारह साल पहले हिमाचल प्रदेश की रक्षा से हुई थी। तीन बच्चे पैदा होने के बाद अगस्त 2004 में रक्षा ने सीएचसी सहसपुर में अपनी नसबंदी कराई। रक्षा कहती है कि नसबंदी के बाद भी उसे गर्भ ठहर गया था। यह बात उन्होंने सामुदायिक केन्द्र के डाक्टरों को बताई तो डाक्टरों ने गर्भ ठहरने के कारणों को जानने और अपनी गलती मानने के बजाय बिना रक्षा को बताए आनन-फानन में उसके चार महीने के भ्रूण का गर्भपात कर दिया। रक्षा का कहना है कि डाक्टर ने उसे चेकअप करने का झांसा देकर अस्पताल में भर्ती किया था और गर्भपात के बारे में उसे बाद में बताया गया। यह बात किसी से न कहने के लिये डॉक्टर ने रक्षा को पाँच हजार रु. देने की बात भी कही थी। यह रकम उसे कभी नहीं मिली।
रक्षा की नसबंदी फेल होने और गर्भपात के बाद रक्षा शारीरिक रूप से अक्षम हो चुकी थी। तब 2009 में संजय ने अपनी नसबंदी कराई। बदकिस्मती से संजय का ऑपरेशन भी फेल हो गया। इसके बाद रक्षा और संजय गंभीर रूप से बीमार रहने लगे। रक्षा को रक्तस्राव और पेट संबंधी गंभीर बीमारी ने घेर लिया। संजय नसबंदी आपरेशन से पहले पथरी का एक आपरेशन करा चुका था। इधर पाइल्स के कारण वह चलने-फिरने में भी असमर्थ हो गया। पत्नी और अपनी बीमारी के इलाज के लिए उसका करीब ढाई-तीन लाख रुपया खर्च हुआ और कर्ज की अदायगी के लिये उसने अपना घर पड़ोस के गाँव के एक व्यक्ति को बेच दिया था। संजय अपने परिवार की इस हालत के लिए ऑपरेशन करने वाले डाक्टरों को भी जिम्मेदार मानता था और मई में उसने देहरादून के गांधी पार्क में धरना कर सरकार का ध्यान इस ओर खींचना चाहा था। तीन दिनों तक सपरिवार गांधी पार्क में डटे रह कर उसने मुआवजे और दोषी डाक्टरों पर कार्यवाही की मांग की। इसके बाद संजय ने पूरे परिवार व गाँव वालों के साथ मिलकर विधानसभा पर भी प्रदर्शन किया। प्रशासन ने शीघ्र मुआवजे का झूठा दिलासा देकर उन्हे शांत कर दिया। नसबंदी आपरेशन फेल होने के बाद सरकारी प्रावधान के मुताबिक इस परिवार को 30,000 रुपये मिलने थे।
हालातों से हार चुके संजय ने 20 जुलाई को सहसपुर सामुदायिक चिकित्सालय में ओ.पी.डी. कर रहे डॉ. आर.पी. खण्डूरी को गलत नसबंदी आपरेशन करने का अपराधी मानते हुए उन पर खुखरी से हमला कर दिया। उसकी नीयत डॉक्टर को जान से मारने की थी, लेकिन वहाँ मौजूद लोगों ने उसकी कोशिश नाकाम कर उसे पकड़ लिया। संजय इस समय देहरादून की जिला कारागार में बंद है जबकि उसकी पत्नी रक्षा अपने चार मासूम बच्चों के साथ गाँव में जिंदगी की जंग लड़ रही है। वह परिवार पालने के लिए पड़ोस के प्राथमिक स्कूल में भोजन माता और राजकीय माध्यमिक विद्यालय में चौकीदारी की नौकरी कर रही है। दोनों कामों से रक्षा को केवल 1700 रुपये ही मिल पाते हैं।
हादसे के बाद प्रदेश भर के डॉक्टरों ने जबर्दस्त हड़ताल की थी। सरकार ने भी डाक्टरों की बात मानते हुए डाक्टरों की सुरक्षा के लिए सिक्योरिटी एक्ट राज्य में लागू कर दिया। लेकिन राज्य सरकार यह सुनिश्चित नहीं कर पाई कि एक के बाद नसबंदी आपरेशन फेल होने के बाद संजय जैसे हालातों में पहुँच चुके परिवारों की सहायता किस प्रकार की जाएगी। एक तथ्य यह है कि 2010 में क्षेत्र के जस्सावाला गाँव के अनवर ने भी सहसपुर में सर्जन डॉ. खण्डूरी से ही नसबंदी करायी थी, जो फेल हो गयी और उसकी पत्नी ने एक बच्ची को जन्म दिया। अनवर की यह छठी बेटी थी। उसे तीस हजार रुपये का मुआवजा भी मिला था, लेकिन ऑपरेशन की लापरवाही को बर्दाश्त न कर पाने से उसने 30 मई को आत्महत्या कर ली।